कोलकाता/चेन्नई – Political Crisis: देश इस वक्त एक अजीब और गंभीर राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। एक तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी चुनाव हारने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने से मना कर रही हैं, तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन राज्यपाल उन्हें सरकार बनाने की इजाजत नहीं दे रहे। दोनों राज्यों में संविधान, कानून और राजनीति के बीच एक तनाव खड़ा हो गया है जिसे देश के इतिहास में बेहद दुर्लभ माना जा रहा है।
7 मई 2026 को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल खत्म हुआ, तो राज्यपाल आर.एन. रवि ने संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत विधानसभा को भंग कर दिया। यह घोषणा कोलकाता गजट में प्रकाशित एक अधिसूचना के जरिए की गई, जो 7 मई 2026 से तत्काल प्रभाव से लागू हो गई। इसके साथ ही ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री के रूप में सफर औपचारिक रूप से खत्म हो गया। लेकिन इससे पहले जो राजनीतिक नाटक हुआ, वह अपने आप में अभूतपूर्व था।
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम: TMC का ऐतिहासिक पतन
4 मई 2026 को घोषित पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया, जबकि ममता बनर्जी की ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) महज 80 सीटों पर सिमट गई। यह तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। पार्टी जो पिछले चुनाव में 212 सीटें जीती थी, वह इस बार केवल 80 सीटों पर रह गई। BJP की यह जीत बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है। 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में हुए इन चुनावों में मतदाताओं ने 15 साल की तृणमूल सरकार को नकार दिया।
BJP की इस ऐतिहासिक जीत को बंगाल में TMC के 15 साल के शासन का अंत माना जा रहा है। राज्य में स्कूल भर्ती घोटाला, कानून-व्यवस्था को लेकर आरोप और शासन की विफलताओं को इस हार की बड़ी वजह माना जा रहा है।
ममता बनर्जी का विद्रोह: “साजिश हुई है, मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”

चुनाव परिणाम आते ही ममता बनर्जी ने जो रुख अपनाया, उसने पूरे देश को चौंका दिया। उन्होंने कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा — “इस्तीफे का कोई सवाल नहीं, हम जनादेश से नहीं बल्कि साजिश से हारे हैं।”
उन्होंने कहा कि वे इस्तीफा नहीं देंगी क्योंकि उनका मानना है कि वोटों की जबरदस्ती लूट की गई और पूरी चुनाव प्रक्रिया में धांधली हुई। उन्होंने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि इसने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक “काला अध्याय” जोड़ा है।
6 मई को अपने कालीघाट आवास पर पार्टी के नवनिर्वाचित विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक में ममता बनर्जी ने कहा — “उन्हें राष्ट्रपति शासन लगाना हो तो लगाएं। उन्हें हमें बर्खास्त करना हो तो करें। यह सब इतिहास में काले दिन के रूप में दर्ज होगा।”
उनके भतीजे और TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने भी इस रुख का समर्थन किया। अभिषेक ने पार्टी नेताओं से कहा — “सत्ता में बने रहना हमारे विरोध का प्रतीक है।”
संविधान क्या कहता है? — अनुच्छेद 164 की बहस

ममता के इस्तीफे से इनकार ने संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच एक तीखी बहस छेड़ दी। संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री “राज्यपाल की प्रसाद-पर्यंत” अपना पद धारण करता है। अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल को मुख्यमंत्री नियुक्त करने का अधिकार तो है ही, साथ ही बहुमत खो देने या इस्तीफे से इनकार की स्थिति में उन्हें हटाने का अधिकार भी है।
कानून की नजर में जो नेता बहुमत खो देता है, वह शासन का “नैतिक और कानूनी अधिकार” भी खो देता है।
अगर कोई मुख्यमंत्री चुनावी हार को नजरअंदाज करते हुए पद पर बना रहे, तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद को भंग करने और मुख्यमंत्री की सेवाएं तत्काल समाप्त करने का आदेश दे सकते हैं। यदि स्थिति और बिगड़े, तो राज्यपाल केंद्र सरकार को पत्र लिखकर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश भी कर सकते हैं।
हालांकि लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने PTI से कहा — “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे इस्तीफा देती हैं या नहीं। संविधान कहता है कि कोई भी सरकार पांच साल बाद नहीं चल सकती।”
राज्यपाल का फैसला: विधानसभा भंग, ममता का कार्यकाल खत्म

ममता बनर्जी का अभूतपूर्व टकराव गुरुवार को उस वक्त खत्म हुआ जब राज्यपाल आर.एन. रवि ने 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग कर दिया। संवैधानिक विशेषज्ञों ने पहले ही बता दिया था कि 7 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही ममता बनर्जी औपचारिक रूप से इस्तीफा दिए बिना भी पद से मुक्त हो जाएंगी।
राज्यपाल के विधानसभा भंग करने के आदेश से 15वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा का औपचारिक अंत हो गया और BJP के लिए राज्य में पहली बार सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया।
TMC का अगला कदम: सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान
हार मानने के बजाय ममता बनर्जी ने कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना। TMC सुप्रीम कोर्ट में 2026 के जनादेश को चुनौती देगी। ममता बनर्जी ने कहा कि वे और उनकी वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य व्यक्तिगत रूप से अदालत में इस मामले को लड़ेंगी। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन को मजबूत करना और 2029 के चुनावों की तैयारी भी उनके एजेंडे में है।
TMC का कहना है कि पार्टी राजनीतिक रूप से इस “इंजीनियर्ड जनादेश” का विरोध करती रहेगी।
तमिलनाडु का संकट: विजय सबसे बड़ी पार्टी, फिर भी सरकार नहीं
पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु में भी एक अलग तरह का संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। यहाँ मामला उलट है — एक नई पार्टी सबसे बड़ी बनकर उभरी है लेकिन राज्यपाल उसे सरकार बनाने की अनुमति नहीं दे रहे।
23 अप्रैल 2026 को हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलागा वेत्री कलगम (TVK) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसने 59 साल से चले आ रहे द्रविड़ पार्टियों — DMK और AIADMK — के वर्चस्व को तोड़ा।
TVK ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीतीं, लेकिन यह बहुमत के लिए जरूरी 118 के आंकड़े से 10 सीट कम है। इसके बाद TVK ने Congress के 5 विधायकों का समर्थन हासिल किया, जो पहले DMK के नेतृत्व वाले SPA गठबंधन में थे।
5 मई को M.K. स्टालिन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 6 मई को विजय ने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया।
राज्यपाल की आपत्ति: “बहुमत साबित नहीं”

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.वी. अर्लेकर ने TVK प्रमुख विजय की सरकार बनाने की मांग ठुकरा दी। उन्होंने कहा कि पार्टी विधानसभा में बहुमत का समर्थन साबित नहीं कर पाई।
सूत्रों के अनुसार TVK के पास “आधिकारिक आंकड़े” अभी भी पर्याप्त नहीं हैं और राज्यपाल संख्या को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। विजय के एक सीट से इस्तीफे के बाद TVK की प्रभावी ताकत 107 हो जाती है। Congress के 5 विधायकों का समर्थन मिलाकर भी यह 112 बनती है, जो 118 के बहुमत से कम है।
यह विजय का दूसरा प्रयास था। इससे पहले भी उनकी बोली बहुमत की संख्या को लेकर चिंताओं की वजह से रुकी हुई थी। राजनीतिक अनिश्चितता और गहरी हो गई जब खबर आई कि DMK और AIADMK मिलकर TVK को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश कर सकते हैं।
Congress का विरोध और कमल हासन की आवाज
तमिलनाडु Congress कमेटी के अध्यक्ष के. सेल्वापेरुन्थगई ने 8 मई 2026 को सुबह 11 बजे सभी जिला मुख्यालयों में BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और राज्यपाल के खिलाफ विशाल विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। उनका कहना था कि 2026 के तमिलनाडु चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी TVK को सरकार बनाने से रोकना संविधान के खिलाफ है।
मक्कल नीधि मैयम (MNM) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद कमल हासन ने भी कहा कि TVK को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करना लोगों के जनादेश का “अनादर” होगा।
दोनों संकटों की तुलना: एक सिक्के के दो पहलू
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के ये दोनों संकट अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों में एक बात समान है — राज्यपाल की भूमिका और जनादेश को लेकर विवाद। बंगाल में एक हारी हुई पार्टी का नेता पद छोड़ने से इनकार कर रहा है, जबकि तमिलनाडु में एक जीती हुई पार्टी का नेता सरकार बनाने का इंतजार कर रहा है। दोनों मामलों में राज्यपाल की भूमिका केंद्र में है और दोनों जगह विपक्ष राज्यपाल पर केंद्र सरकार का हाथ होने का आरोप लगा रहा है।
संबंधित बयान / उद्धरण
ममता बनर्जी (5 मई 2026, प्रेस कॉन्फ्रेंस): “इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। हम साजिश से हारे हैं, जनादेश से नहीं।”
संबित पात्रा, BJP प्रवक्ता: “यह BJP पर नहीं, यह लोकतंत्र और संविधान पर हमला है।”
अभिषेक बनर्जी, TMC नेता: “सत्ता में बने रहना हमारे विरोध का प्रतीक है।”
पी.डी.टी. आचार्य, लोकसभा के पूर्व महासचिव: “इस्तीफे से कोई फर्क नहीं पड़ता। संविधान कहता है कि पांच साल बाद कोई सरकार नहीं चल सकती।”
कमल हासन, MNM अध्यक्ष: “TVK को आमंत्रित न करना लोगों के जनादेश का अनादर होगा।”
FAQ‘s
Q1. क्या ममता बनर्जी चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री रह सकती थीं?
नहीं। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री राज्यपाल की प्रसाद-पर्यंत पद पर रहता है। जब कोई नेता चुनाव हार जाता है और नई विधानसभा गठित होती है, तो पुरानी सरकार स्वतः “कार्यवाहक” बन जाती है और जब तक नई सरकार शपथ नहीं लेती, वह केवल सीमित अधिकारों के साथ काम कर सकती है। 7 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म होते ही ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री के रूप में कोई कानूनी आधार नहीं बचा था।
Q2. अनुच्छेद 164(1) क्या है और इसका इस मामले में क्या महत्व है?
अनुच्छेद 164(1) के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है। इसी अनुच्छेद में यह भी उल्लेख है कि मंत्रिपरिषद राज्यपाल की “प्रसाद-पर्यंत” पद धारण करती है। इसका अर्थ यह है कि अगर किसी CM ने बहुमत खो दिया हो या चुनाव हार गया हो और वह इस्तीफा न दे, तो राज्यपाल उसे पद से हटा सकता है।
Q3. राज्यपाल के पास चुनाव हारे CM को हटाने के क्या विकल्प थे?
संविधान के तहत राज्यपाल के पास कई विकल्प थे — पहला, CM को मंत्रिपरिषद भंग करने और इस्तीफे का निर्देश देना; दूसरा, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर उसे भंग करना (जो हुआ); तीसरा, नई विधानसभा बुलाकर बहुमत परीक्षण; और अगर सभी रास्ते बंद हों तो केंद्र सरकार को अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना।
Q4. TMC का सुप्रीम कोर्ट जाना कितना प्रभावी होगा?
TMC चुनाव परिणामों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है, लेकिन यह प्रक्रिया लंबी है। सुप्रीम कोर्ट चुनाव परिणामों में हस्तक्षेप तभी करता है जब गंभीर अनियमितताओं के पुख्ता सबूत हों। केवल आरोपों के आधार पर नई सरकार के गठन को नहीं रोका जा सकता।
Q5. तमिलनाडु में विजय की TVK को सरकार बनाने से क्यों रोका जा रहा है?
TVK सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसके पास 108 सीटें हैं जबकि बहुमत के लिए 118 चाहिए। Congress के 5 समर्थक विधायकों को मिलाने पर भी संख्या 113 बनती है जो बहुमत से कम है। राज्यपाल का कहना है कि जब तक TVK स्पष्ट बहुमत साबित नहीं कर देती, सरकार बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
Q6. क्या DMK और AIADMK मिलकर TVK को रोक सकते हैं?
सैद्धांतिक रूप से हाँ। अगर DMK (59 सीटें) और AIADMK (47 सीटें) मिल जाएं तो उनके पास 106 सीटें होती हैं जो अकेले बहुमत नहीं देतीं, लेकिन अगर वे किसी और का समर्थन करें तो गणित बदल सकता है। हालांकि इन दोनों पुरानी प्रतिद्वंद्वी पार्टियों का एक साथ आना राजनीतिक रूप से बेहद मुश्किल है।
Q7. इन दोनों संकटों से आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
जब तक नई सरकार शपथ नहीं लेती, राज्य में “कार्यवाहक” प्रशासन होता है जो बड़े नीतिगत फैसले नहीं ले सकता। इससे विकास कार्य, नीतिगत निर्णय और प्रशासनिक कार्यों में देरी होती है। राजनीतिक अस्थिरता से निवेश और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है।
