US Pacific Command: अमेरिका ने सैन्य कमान से क्यों हटाया ‘Indo’ शब्द और भारत के लिए इसके क्या हैं मायने?

Published on: 17-06-2026
US Pacific Command और Indo-Pacific Command नाम परिवर्तन को दर्शाता ग्राफिक

नई दिल्ली – वैश्विक कूटनीति और सैन्य रणनीतियों के गलियारे से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। अमेरिका ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में काम करने वाली अपनी सबसे बड़ी और सबसे पुरानी सैन्य कमान के नाम में एक बड़ा बदलाव किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि अब ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमान‘ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर दोबारा पुराना नाम यानी US Pacific Command (USPACOM) कर दिया गया है। करीब आठ साल पहले, साल 2018 में अमेरिकी प्रशासन ने भारत के बढ़ते वैश्विक कद और हिंद महासागर (Indian Ocean) के रणनीतिक महत्व को देखते हुए इस कमान के नाम में ‘इंडो’ (Indo) शब्द जोड़ा था। अब ठीक आठ साल बाद अचानक इस शब्द को हटाकर पुराने नाम को बहाल करना वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है।

यह ऐतिहासिक फैसला ऐसे समय पर लिया गया है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन (G7 Summit) के इतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बैठक करने वाले हैं। इस फैसले के बाद भारत के राजनीतिक विश्लेषकों और रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या अमेरिका और भारत के रिश्तों में कोई अंदरूनी खटास आई है, या फिर यह अमेरिका की किसी नई वैश्विक रणनीति का हिस्सा है? इस विशेष रिपोर्ट में हम इस पूरे घटनाक्रम का गहराई से विश्लेषण करेंगे और समझेंगे कि इस बदलाव के पीछे की असली वजह क्या है और भारत के राष्ट्रीय हितों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

क्या है यूएस पैसिफिक कमान और इसका गौरवशाली इतिहास?

हवाई स्थित US Pacific Command मुख्यालय (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

अमेरिका की सैन्य व्यवस्था में अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए विशेष कमांड काम करती हैं। इन्हीं में से एक है US Pacific Command जो अमेरिकी सेना की सबसे पुरानी और भौगोलिक रूप से सबसे बड़ी एकीकृत लड़ाकू कमान (Unified Combatant Command) है। इसकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 1 जनवरी 1947 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन द्वारा की गई थी। इसका मुख्यालय हवाई (Hawaii) के कैंप एच.एम. स्मिथ में स्थित है।

यह कमान दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से यानी पृथ्वी की सतह के लगभग 52 प्रतिशत भाग की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इस क्षेत्र में प्रशांत महासागर, हिंद महासागर का एक बड़ा हिस्सा, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्से शामिल हैं। इस कमान के तहत लगभग 3,75,000 सैन्य और नागरिक कर्मी काम करते हैं। इसका मुख्य काम इस पूरे समुद्री और हवाई क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करना, किसी भी संभावित सैन्य हमले को रोकना और अपने मित्र देशों के साथ मिलकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है। जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे प्रमुख देश ऐतिहासिक रूप से इसके सुरक्षा तंत्र का हिस्सा रहे हैं।

क्या है यूएस पैसिफिक कमान और इसका गौरवशाली इतिहास?

भारत और अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

अमेरिका की सैन्य व्यवस्था में अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए विशेष कमांड काम करती हैं। इन्हीं में से एक है US Pacific Command जो अमेरिकी सेना की सबसे पुरानी और भौगोलिक रूप से सबसे बड़ी एकीकृत लड़ाकू कमान (Unified Combatant Command) है। इसकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 1 जनवरी 1947 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन द्वारा की गई थी। इसका मुख्यालय हवाई (Hawaii) के कैंप एच.एम. स्मिथ में स्थित है।

यह कमान दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से यानी पृथ्वी की सतह के लगभग 52 प्रतिशत भाग की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। इस क्षेत्र में प्रशांत महासागर, हिंद महासागर का एक बड़ा हिस्सा, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्से शामिल हैं। इस कमान के तहत लगभग 3,75,000 सैन्य और नागरिक कर्मी काम करते हैं। इसका मुख्य काम इस पूरे समुद्री और हवाई क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करना, किसी भी संभावित सैन्य हमले को रोकना और अपने मित्र देशों के साथ मिलकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है। जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे प्रमुख देश ऐतिहासिक रूप से इसके सुरक्षा तंत्र का हिस्सा रहे हैं।

साल 2018 में क्यों जोड़ा गया था ‘Indo’ शब्द?

2018 में ‘Indo’ जोड़ने का फैसला (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

साल 2018 में जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब उनके तत्कालीन रक्षा सचिव जिम मैटिस ने एक भव्य समारोह में इस कमान का नाम बदलकर ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमान’ करने का एलान किया था। उस समय अमेरिकी रक्षा मंत्रालय का मानना था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच की सुरक्षा कड़ियां आपस में पूरी तरह जुड़ चुकी हैं। इस नामकरण को वैश्विक स्तर पर भारत के लिए एक बहुत बड़े कूटनीतिक सम्मान के रूप में देखा गया था।

वाशिंगटन के नीति नियंताओं ने तब माना था कि चीन के बढ़ते आर्थिक और सैन्य प्रभाव को अकेले प्रशांत महासागर में नहीं रोका जा सकता। इसके लिए हिंद महासागर में भारत जैसी एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति का साथ होना बेहद जरूरी है। इस बदलाव के बाद ही ‘क्वाड’ (Quad – भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह) को भारी मजबूती मिली थी। भारतीय राजनयिकों और सैन्य विश्लेषकों ने इसे इस बात का प्रमाण माना था कि अमेरिका अब भारत को एशिया की सुरक्षा का एक मुख्य स्तंभ स्वीकार कर चुका है। इसी नामकरण के बाद भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग, संयुक्त युद्धाभ्यास, और खुफिया जानकारी साझा करने की रफ्तार में अभूतपूर्व तेजी आई थी।

अचानक नाम बदलने के पीछे अमेरिकी सरकार ने क्या तर्क दिया?

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि कमान का नाम बदलकर दोबारा US Pacific Command करना इसके ऐतिहासिक गौरव और संस्थागत विरासत को सम्मान देने की एक प्रक्रिया है। पेंटागन के मुताबिक, इस कमान ने सात दशकों से अधिक समय तक ‘यूएस पैसिफिक कमान’ के बैनर तले काम किया है और इस नाम को वापस लाने से पैसिफिक क्षेत्र में सेवा करने वाले सैनिकों के भीतर एक सामूहिक भावना और गौरव का संचार होगा।

इसके साथ ही, अमेरिकी प्रशासन ने भारत और अन्य मित्र देशों की चिंताओं को शांत करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी जारी किया है। पेंटागन ने जोर देकर कहा है कि नाम बदलने से इस कमान के काम करने के तरीके, इसकी जिम्मेदारियों या इसके भौगोलिक दायरे में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आएगा। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार:

“यूएस पैसिफिक कमान का विशाल कार्यक्षेत्र अमेरिका के पश्चिमी तट के पानी से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ है और यह भविष्य में भी बिल्कुल वैसा ही रहेगा। हमारे क्षेत्रीय सहयोगियों और साझेदारों के साथ मिलकर इस पूरे क्षेत्र को स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित बनाए रखने की हमारी प्रतिबद्धता और हमारा मूल मिशन पूरी तरह से अपरिवर्तित है।”

कूटनीतिक गलियारों में चर्चा: क्या भारत-अमेरिका संबंधों में आई है कोई दरार?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की द्विपक्षीय वार्ता

भले ही अमेरिका इसे केवल एक प्रशासनिक और ऐतिहासिक विरासत को बहाल करने का फैसला बता रहा हो, लेकिन दुनिया भर के राजनीतिक और रक्षा विशेषज्ञ इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीति में कोई भी फैसला बिना किसी ठोस राजनीतिक संकेत के नहीं लिया जाता। हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में कुछ मुद्दों को लेकर तनाव देखा गया है, जिसे इस फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है:

  • व्यापारिक नीतियां और टैरिफ: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के महीनों में भारत की व्यापारिक नीतियों पर खुलकर असंतोष जताया है और भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क (Tariffs) लगाने की बात कही है। अमेरिका का मानना है कि भारत की आर्थिक नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पूरा फायदा नहीं दे रही हैं।
  • वीजा और आव्रजन (Immigration) नीतियां: अमेरिका की नई सख्त आव्रजन नीतियों के कारण वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों और आईटी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवर कामगारों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत का दौर चल रहा है।
  • ओमान तट के पास की घटना: पिछले दिनों ओमान के तट के पास एक व्यापारिक जहाज ‘एमटी सेटेबेलो’ पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नाविकों की दुखद मौत हो गई थी। इस घटना के बाद भारतीय सुरक्षा हलकों में काफी नाराजगी देखी गई थी और दोनों देशों के सैन्य सहयोग पर भी कुछ सवाल उठे थे।
  • चीन के साथ अमेरिका का नया संतुलन: कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का यह भी अनुमान है कि अमेरिका इस समय चीन के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों में एक नया संतुलन (Rebalancing) बनाने की कोशिश कर रहा है। नाम से ‘इंडो’ शब्द हटाना चीन को यह संदेश देने की कोशिश हो सकती है कि अमेरिका एशिया में किसी एक देश को विशेष तवज्जो देकर चीन की घेराबंदी नहीं कर रहा है। चीन हमेशा से ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्द का विरोध करता आया है और इसे ‘एशिया-पैसिफिक’ कहना पसंद करता है।

भारतीय विशेषज्ञों की राय: क्या यह भारत के लिए कोई बड़ा झटका है?

इस पूरे मामले पर भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश और कई वरिष्ठ पूर्व राजदूतों ने अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत के लिए एक सबक की तरह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों और नारों पर ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए।

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने इस फैसले पर चिंता जताते हुए कहा कि वाशिंगटन की नीतियां कई बार बहुत ही अप्रत्याशित होती हैं। साल 2018 में जब ‘इंडो-पैसिफिक’ नाम रखा गया था, तो वह अमेरिका की अपनी जरूरत थी ताकि वह भारत को अपने सुरक्षा चक्र में शामिल कर सके। भारतीय कूटनीति हमेशा से इस नाम को लेकर थोड़ी सतर्क थी क्योंकि भारत के हित केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हमारा प्राथमिक हित पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

वहीं, गेटवे हाउस के वरिष्ठ फेलो और पूर्व राजदूत राजीव भाटिया का मानना है कि कोविड-19 महामारी के बाद से ‘इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा वैश्विक स्तर पर थोड़ी सुस्त पड़ी है। अमेरिका के इस कदम से भारत को यह बिल्कुल साफ समझ लेना चाहिए कि सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के मामले में हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। हालांकि, कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इसे भारत के लिए बहुत बड़ा झटका नहीं माना जाना चाहिए। यह एक व्यावहारिक सुधार (Healthy Correction) भी हो सकता है, जो भारत को यह मूल्यांकन करने का मौका देगा कि अमेरिका के साथ हमारे हित कहां पर सच में मेल खाते हैं और कहां पर हमारे रास्ते अलग हैं।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक साझेदारी पिछले कई सालों से मजबूत हुई है। दोनों देश Quad (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे मंचों पर काम करते हैं। 2018 का नाम बदलाव इस साझेदारी का हिस्सा था।

अब नाम वापस Pacific होने से कुछ भारतीय विश्लेषक और नेता सवाल उठा रहे हैं। Congress सांसद Shashi Tharoor ने X (Twitter) पर लिखा, “Quad की ताबूत में एक और कील?” कुछ रिपोर्ट्स में गलत भारत मानचित्र (Pakistan-administered Kashmir को Pakistan दिखाने) का भी जिक्र है, जो अलग मुद्दा है।

लेकिन आधिकारिक तौर पर भारत सरकार की ओर से अभी कोई बड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नाम बदलाव operational स्तर पर कोई फर्क नहीं डालेगा। भारत की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है, जो Indo-Pacific में अपनी भूमिका को मजबूत कर रही है। PM Narendra Modi की G7 Summit में Trump के साथ मुलाकात में भी व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जो साझेदारी को आगे बढ़ाने का संकेत है।

क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर

Indo-Pacific क्षेत्र दुनिया की आधी से ज्यादा अर्थव्यवस्था, व्यापार और ऊर्जा मार्गों को कवर करता है। भारत के लिए भारतीय महासागर बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से तेल आयात होता है। अमेरिका का कमांड नाम बदलाव क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को देखते हुए भी देखा जा रहा है, लेकिन अमेरिका ने स्पष्ट किया कि मिशन में कोई बदलाव नहीं है।

भारत अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। Indian Navy सक्रिय है और Quad के जरिए सहयोग बढ़ा रहा है। नाम बदलाव के बावजूद, दोनों देशों के बीच संयुक्त अभ्यास, सूचना साझा करना और रक्षा सौदे जारी रह सकते हैं।

Quad और बड़े मंचों का भविष्य

Quad Indo-Pacific सुरक्षा पर केंद्रित है। नाम बदलाव से कुछ सवाल उठे हैं, लेकिन Quad के कामकाज में अभी कोई आधिकारिक बदलाव नहीं बताया गया। G7 Summit 2026 में PM Modi की भागीदारी और Trump से मुलाकात व्यापार और सुरक्षा पर फोकस दिखाती है।

भारत की विदेश नीति

भारत हमेशा से बहुपक्षीय संबंध रखता है। Indo-Pacific में भारत की अपनी Indo-Pacific Oceans Initiative है। नाम बदलाव के बावजूद, भारत क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अपनी भूमिका निभाएगा।

लेख से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्र.1 अमेरिका ने अपनी सैन्य कमान का नाम ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमान’ से बदलकर दोबारा US Pacific Command क्यों किया?

उत्तर: अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह फैसला इस कमान की ऐतिहासिक विरासत और जड़ों को सम्मान देने के लिए लिया गया है। इस सैन्य कमान की स्थापना 1947 में इसी नाम से हुई थी और इसने 70 से अधिक वर्षों तक इसी नाम के तहत काम किया है। हालांकि, कूटनीतिक जानकार इसे अमेरिका की बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं और भारत-अमेरिका के बीच हालिया व्यापारिक तनावों से भी जोड़कर देख रहे हैं।

प्र.2 क्या नाम बदलने से इस कमान के काम करने के तरीके या भारत की सुरक्षा पर कोई असर पड़ेगा?

उत्तर: नहीं, अमेरिकी सेना ने स्पष्ट किया है कि नाम बदलने से कमान के परिचालन (Operational) तौर-तरीकों या उसकी जिम्मेदारियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। इस कमान का भौगोलिक दायरा पहले की तरह ही अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक रहेगा और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर इसके मिशन में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

प्र.3 साल 2018 में कमान के नाम में ‘Indo’ शब्द क्यों जोड़ा गया था?

उत्तर: साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस ने हिंद महासागर और प्रशांत महासागर की सुरक्षा के आपसी जुड़ाव को स्वीकार करते हुए यह नाम बदला था। इसका मुख्य उद्देश्य चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करना और दोनों देशों के रक्षा सहयोग को बढ़ावा देना था।

प्र.4 इस फैसले का ‘क्वाड’ (Quad) संगठन पर क्या असर हो सकता है?

उत्तर: हालांकि अमेरिका ने कहा है कि वह अपने सहयोगियों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ‘इंडो’ शब्द को हटाना यह दर्शाता है कि अमेरिका अब इस क्षेत्र में बहुपक्षीय संगठनों (जैसे क्वाड) के प्रतीकों को लेकर थोड़ा उदासीन हो रहा है। भारत के लिए यह अपनी सुरक्षा रणनीतियों को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने का एक संकेत है।

प्र.5 क्या यह चीन के साथ सॉफ्ट स्टांस का संकेत है?

उत्तर: अमेरिका ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में free and open Indo-Pacific commitment वही है। कोई speculative link नहीं।

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