नई दिल्ली/तेहरान/वाशिंगटन – US-Iran Peace Deal को लेकर इस समय पूरी दुनिया की नजरें वाशिंगटन और तेहरान पर टिकी हुई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सप्ताहांत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भीषण पश्चिम एशिया युद्ध को समाप्त करने के लिए आज यानी रविवार, 14 जून 2026 को एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। ट्रंप के मुताबिक, इस समझौते के तुरंत बाद दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक रास्ता, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz), वैश्विक जहाजों के आवागमन के लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा।

लेकिन इस संभावित महा-समझौते की फिनिश लाइन (आखिरी छोर) पर पहुंचते ही भारी ड्रामा और कूटनीतिक रस्साकशी शुरू हो गई है। ईरान के विदेश मंत्रालय और वहां के रूढ़िवादी व कट्टरपंथी गुटों ने अमेरिकी दावों पर तुरंत ब्रेक लगा दिया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई (Esmaeil Baghaei) ने स्पष्ट किया है कि समझौते के मसौदे पर अंतिम आंतरिक फैसला अभी बाकी है और रविवार को किसी भी हस्ताक्षर की उम्मीद नहीं है, हालांकि उन्होंने आने वाले दिनों में इसके फाइनल होने की संभावना से इनकार भी नहीं किया है। इस कूटनीतिक खींचतान के बीच ईरान के कई शहरों, विशेषकर मश्हद (Mashhad) में शीर्ष कूटनीतिज्ञों के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, जिसने इस पूरी शांति प्रक्रिया को एक बेहद जटिल भू-राजनीतिक थ्रिलर में बदल दिया है।
ट्रंप का ‘सुपर संडे’ दावा और नेतन्याहू पर गुस्सा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस डील को लेकर बेहद आक्रामक और उत्सुक दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि इस ऐतिहासिक US-Iran Peace Deal के तहत ईरान किसी भी तरह से परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं कर सकेगा। ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि जैसे ही ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से अपनी पाबंदियां हटाएगा, अमेरिका तुरंत ईरान पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह खत्म कर देगा।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक नया मोड़ तब आया जब ट्रंप ने हाल ही में एक्सियोस (Axios) को दिए एक इंटरव्यू में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर अपना तीखा गुस्सा निकाला। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप इस बात से बेहद नाराज थे कि इजरायल ने शांति समझौते के ठीक पहले लेबनान की राजधानी बेरूत पर हवाई हमला कर दिया। ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि “बीबी (नेतन्याहू) के पास कोई निर्णय क्षमता (Judgement) नहीं है।” ट्रंप का मानना है कि इस इजरायली हमले ने ऐन वक्त पर उनकी महीनों की मेहनत और मध्यस्थ देश पाकिस्तान की कोशिशों पर पानी फेरने का काम किया है।
ईरान में क्यों भड़की बगावत? मश्हद में ‘अराघची’ के खिलाफ नारे

दूसरी तरफ, तेहरान के भीतर की स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण बनी हुई है। शनिवार को ईरान के पूर्वोत्तर शहर मश्हद में विदेश मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय के बाहर दर्जनों कट्टरपंथियों और महिलाओं ने काले चादर ओढ़कर भारी विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन के कई वीडियो ईरानी समाचार एजेंसी ‘फार्स’ (Fars) ने जारी किए हैं, जिसमें प्रदर्शनकारी ईरान के शीर्ष राजनयिक और विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) को “देशद्रोही” और “घुसपैठिया” कहते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे।
ईरान के भीतर सक्रिय इन कट्टरपंथी समूहों और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) से जुड़े धड़ों का आरोप है कि ईरानी वार्ताकार वाशिंगटन के सामने बहुत ज्यादा झुक गए हैं। उनका कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना नियंत्रण ढीला करना ईरान के सबसे बड़े रक्षात्मक हथियार (Deterrence) को खोने जैसा है। प्रदर्शनकारियों का यह भी साफ कहना है कि जब तक देश के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) इस समझौते को अपनी आधिकारिक मंजूरी नहीं देते, तब तक अमेरिका के साथ किया गया कोई भी समझौता अमान्य माना जाएगा।
‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम’ की मुख्य शर्तें और पेंच
इस पूरे शांति समझौते को ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम’ के नाम से जाना जा रहा है, क्योंकि इसमें पाकिस्तान ने एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। सूत्रों के मुताबिक, समझौते के दो मुख्य चरण हैं:
- चरण 1: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह मुक्त किया जाएगा। अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा और ईरान के अंतरराष्ट्रीय बैंकों में जमे हुए अरबों डॉलर के फंड/एसेट्स को तुरंत अनफ्रीज (जारी) किया जाएगा।
- चरण 2: इसके बाद 60 दिनों की एक विशेष वार्ता अवधि शुरू होगी, जिसके तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नियंत्रित या नष्ट करने पर बात होगी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) को बी-2 बॉम्बर्स की निगरानी में सुरक्षित बाहर निकालकर नष्ट किया जाएगा।
ईरान का रुख इस समय यह है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले विदेशी जहाजों से ‘सर्विस चार्ज’ वसूलने के अपने अधिकार को नहीं छोड़ेगा और वह क्षेत्र से सभी विदेशी या अमेरिकी सैन्य अड्डों को हटाने की मांग पर अड़ा हुआ है।
भारत के लिए क्यों बेहद अहम है यह डील?
भारत के लिए यह US-Iran Peace Deal सीधे तौर पर उसकी आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हुई है। पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय से बंद या बाधित था, जिसके चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए इस रास्ते के दोबारा खुलने से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें काफी कम हो सकती हैं।
इसके अलावा, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) इस समय अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाइयों में मारे गए तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिकी प्रशासन के सामने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। अगर यह शांति समझौता आज या अगले कुछ दिनों में हो जाता है, तो ओमान की खाड़ी और होर्मुज क्षेत्र में फंसे सैकड़ों भारतीय कमर्शियल क्रू और नाविक सुरक्षित रूप से वतन लौट सकेंगे।
असली लड़ाई अब तेहरान के भीतर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अब सबसे बड़ी चुनौती वाशिंगटन और तेहरान के बीच नहीं बल्कि तेहरान के भीतर दिखाई दे रही है। ईरान में कट्टरपंथी राजनीतिक समूहों, कुछ सांसदों और प्रभावशाली विचारधारात्मक संगठनों ने प्रस्तावित समझौते पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। उनका तर्क है कि ईरान ने वर्षों से जिन रणनीतिक साधनों को अपने प्रभाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया, यह समझौता उन्हें कमजोर कर सकता है।
विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर बहस तेज है। विरोधी समूहों का कहना है कि यदि ईरान बिना पर्याप्त राजनीतिक और आर्थिक गारंटी के मार्ग खोल देता है तो वह अपना एक महत्वपूर्ण दबाव बिंदु खो देगा।
इजराइल और लेबनान का नया मोर्चा
जब शांति समझौते की चर्चा तेज हो रही थी, उसी समय लेबनान में नए सैन्य घटनाक्रम सामने आए। इजराइल द्वारा बेरूत के दक्षिणी हिस्सों में की गई कार्रवाई और उसके बाद क्षेत्रीय प्रतिक्रियाओं ने वार्ता प्रक्रिया को और जटिल बना दिया। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ऐसी कार्रवाई समझौते की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकती है। वहीं ईरान समर्थक समूहों ने भी इस घटनाक्रम को गंभीरता से लिया।
इससे स्पष्ट है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत केवल द्विपक्षीय मामला नहीं रह गई है। इसके साथ इजराइल, लेबनान, कतर, पाकिस्तान और खाड़ी क्षेत्र की व्यापक सुरक्षा स्थिति भी जुड़ी हुई है।
समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा
विश्लेषकों का मानना है कि समझौते की सबसे बड़ी बाधा अब तकनीकी नहीं बल्कि राजनीतिक है। दोनों पक्ष किसी प्रारंभिक ढांचे पर सहमत होते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन घरेलू राजनीतिक स्वीकृति हासिल करना आसान नहीं होगा। अमेरिका में भी इस समझौते को लेकर बहस जारी है, जबकि ईरान में कट्टरपंथी और व्यावहारिक गुटों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
इसी वजह से ट्रंप की आशावादी घोषणाओं और तेहरान की सतर्क भाषा के बीच अंतर दिखाई देता है।
क्या वास्तव में समझौते के करीब पहुंच चुके हैं दोनों देश?
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और ईरान के बीच कई बार ऐसे क्षण आए जब लगा कि दोनों देश किसी बड़े समझौते के करीब हैं, लेकिन अंतिम समय में वार्ता टूट गई। यही कारण है कि इस बार भी बाजार और कूटनीतिक हलकों में सावधानी दिखाई दे रही है। हालांकि इस बार की स्थिति कुछ अलग मानी जा रही है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चले सैन्य तनाव ने सभी पक्षों पर दबाव बढ़ाया है। ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता, समुद्री व्यापार पर असर, क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं और वैश्विक आर्थिक जोखिम ऐसे कारक हैं जिन्होंने समझौते की आवश्यकता को पहले से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार बातचीत केवल युद्धविराम तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आर्थिक प्रतिबंधों में संभावित राहत और भविष्य के परमाणु ढांचे पर बातचीत शामिल है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इसे केवल एक शांति समझौता नहीं बल्कि पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया मान रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन के लिए यह समझौता कितना महत्वपूर्ण?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि सैन्य टकराव को लंबा खींचने के बजाय बातचीत के जरिए क्षेत्र में स्थिरता लाना अधिक प्रभावी रणनीति है। व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों का मानना है कि यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित रूप से खुलता है और समुद्री व्यापार सामान्य होता है तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। इससे अमेरिका सहित कई देशों में ईंधन कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
इसी वजह से ट्रंप लगातार सार्वजनिक रूप से आशावादी बयान दे रहे हैं। हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक अंतिम हस्ताक्षर की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
ईरान के लिए समझौता क्यों आसान नहीं?
ईरान की स्थिति अमेरिका से कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। एक तरफ ईरानी अर्थव्यवस्था वर्षों से प्रतिबंधों के दबाव में है। तेल निर्यात, बैंकिंग प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय निवेश पर पड़े प्रभाव ने आर्थिक चुनौतियां बढ़ाई हैं। दूसरी तरफ ईरान के भीतर ऐसे राजनीतिक और वैचारिक समूह भी मौजूद हैं जो अमेरिका के साथ किसी बड़े समझौते को संदेह की नजर से देखते हैं। इन समूहों का कहना है कि अतीत में हुए कई समझौतों से ईरान को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। इसलिए इस बार किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर से पहले मजबूत गारंटी की मांग की जा रही है।
यही वजह है कि ईरानी वार्ताकारों पर दोहरा दबाव है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य समझौता भी करना है और घरेलू राजनीतिक विरोध को भी संभालना है।
वैश्विक तेल बाजार क्यों देख रहा है हर बयान?
तेल बाजार इस समय किसी भी आधिकारिक बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया दे रहा है। कारण स्पष्ट है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यदि यहां जोखिम बढ़ता है तो बाजार में आपूर्ति संबंधी चिंता पैदा होती है। यदि तनाव कम होता है तो निवेशक राहत की उम्मीद करते हैं।
पिछले कुछ दिनों में ट्रंप और ईरानी अधिकारियों के बयानों के बाद ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव देखा गया। निवेशकों की नजर अब केवल घोषणा पर नहीं बल्कि उसके व्यावहारिक परिणामों पर है।
क्षेत्रीय देशों की भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया में कई क्षेत्रीय देशों ने मध्यस्थ या संवाद-सुविधाकर्ता की भूमिका निभाई है। कतर लंबे समय से पश्चिम एशिया की कई कूटनीतिक पहलों में सक्रिय रहा है। पाकिस्तान ने भी हाल के दिनों में संवाद को आगे बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन किया है। इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों की भी इस प्रक्रिया में रुचि है क्योंकि क्षेत्रीय स्थिरता सीधे उनकी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि समझौता आगे बढ़ता है तो आने वाले महीनों में क्षेत्रीय सहयोग के नए प्रारूप भी देखने को मिल सकते हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि समझौते की वास्तविक समय-सीमा क्या होगी। ट्रंप का दावा है कि समझौता बेहद करीब है। ईरान का कहना है कि बातचीत जारी है लेकिन रविवार को हस्ताक्षर नहीं होंगे। इन दोनों बयानों को साथ रखकर देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि वार्ता पूरी तरह टूटी नहीं है, बल्कि अंतिम राजनीतिक सहमति का इंतजार कर रही है। कूटनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार आने वाले कुछ दिन निर्णायक साबित हो सकते हैं। यदि दोनों पक्ष अंतिम मतभेद दूर कर लेते हैं तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। यदि घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ता है तो प्रक्रिया में और देरी भी संभव है। लेकिन वर्तमान स्थिति में उपलब्ध आधिकारिक जानकारी यही संकेत देती है कि बातचीत जारी है और समझौते की संभावना अभी भी बनी हुई है।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौता केवल दो देशों के संबंधों का मामला नहीं है। इसका संबंध वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, पश्चिम एशिया की स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़ा हुआ है।डोनाल्ड ट्रंप की आशावादी घोषणाओं और तेहरान की सतर्क प्रतिक्रियाओं के बीच दुनिया एक ऐसे समझौते का इंतजार कर रही है जो क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकता है। लेकिन अंतिम बाधा अब कूटनीतिक मेज पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्वीकृति के क्षेत्र में दिखाई दे रही है। मशहद सहित ईरान के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन, कट्टरपंथी समूहों की आलोचना और समझौते की शर्तों पर जारी बहस यह दिखाती है कि वार्ता केवल अंतरराष्ट्रीय नहीं बल्कि घरेलू राजनीतिक परीक्षा भी बन चुकी है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि शांति समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। लेकिन अंतिम हस्ताक्षर कब होंगे, यह प्रश्न अभी भी खुला हुआ है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: US-Iran Peace Deal क्या है और यह क्यों हो रही है?
उत्तर: यह अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए तैयार किया गया एक शांति समझौता है, जिसे पाकिस्तान की मध्यस्थता के कारण ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम’ भी कहा जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में सीजफायर लागू करना और परमाणु हथियारों की होड़ को रोकना है।
प्रश्न 2: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) का वैश्विक व्यापार में क्या महत्व है?
उत्तर: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन समुद्री मार्ग है। दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) कच्चा तेल इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति ठप हो जाती है।
प्रश्न 3: ईरान के भीतर इस समझौते का विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर: ईरान के कट्टरपंथी और दक्षिणपंथी गुटों का मानना है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका की शर्तों के आगे घुटने टेक दिए हैं। वे होर्मुज जलमार्ग पर ईरान का नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं और सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की अंतिम मंजूरी के बिना किसी भी डील के खिलाफ हैं।
प्रश्न 4: इस शांति समझौते से भारत को क्या लाभ होगा?
उत्तर: इस समझौते से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भारी गिरावट आएगी, जिससे भारत में महंगाई कम होगी। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे भारतीय नाविकों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित घर वापसी का रास्ता साफ होगा।
प्रश्न 5: ईरान में विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
उत्तर:: कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूहों का मानना है कि प्रस्तावित समझौता ईरान की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। इसी कारण कुछ स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
