क्या किसी व्यक्ति की चाल उसकी पहचान बता सकती है? जानिए गेट एनालिसिस का विज्ञान, इसकी सीमाएं और अपराध जांच में इसका बढ़ता उपयोग
पुणे/नई दिल्ली – गेट एनालिसिस (Gait Analysis) पिछले कुछ दिनों में देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। महाराष्ट्र के चर्चित पुणे केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच के दौरान पुलिस द्वारा इस तकनीक का उपयोग किए जाने के बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर गेट एनालिसिस होती क्या है, यह कैसे काम करती है और क्या केवल किसी व्यक्ति की चाल देखकर उसकी पहचान की जा सकती है।
हालांकि गेट एनालिसिस कोई नई तकनीक नहीं है। दुनिया के कई देशों में इसका उपयोग वर्षों से चिकित्सा विज्ञान, खेल विज्ञान, बायोमैकेनिक्स, सुरक्षा अनुसंधान और फॉरेंसिक जांच में किया जाता रहा है। भारत में भी आधुनिक फॉरेंसिक जांच के बढ़ते उपयोग के साथ यह तकनीक धीरे-धीरे अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। जब किसी सीसीटीवी कैमरे में संदिग्ध का चेहरा साफ दिखाई नहीं देता या वह चेहरा ढककर चलता है, तब उसकी चाल, शरीर की गति और चलने के तरीके का वैज्ञानिक विश्लेषण जांच एजेंसियों के लिए एक उपयोगी सुराग बन सकता है।
विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि गेट एनालिसिस अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं होती। इसे केवल एक सहायक फॉरेंसिक तकनीक माना जाता है, जिसका उपयोग अन्य वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों के साथ मिलाकर किया जाता है। किसी भी आपराधिक मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत सभी साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर ही निकलता है।
जब कोई अपराधी आधुनिक तकनीक और चालाकी का इस्तेमाल करके कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश करता है, तो फॉरेंसिक साइंस का एक ऐसा ही आधुनिक हथियार पुलिस की ढाल बनता है जिसे Gait Analysis (चाल विश्लेषण) कहा जाता है। महाराष्ट्र की पुणे ग्रामीण पुलिस ने रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की सनसनीखेज हत्या के मामले में इसी नायाब और वैज्ञानिक तकनीक को अपनाकर पूरे मामले का पर्दाफाश करने का निर्णय लिया है। लोहगढ़ किले (Lohagad Fort) की 300 फीट गहरी खाई में धकेल कर की गई इस निर्मम हत्या में आरोपी ने अपनी पहचान छिपाने की हर मुमकिन कोशिश की थी, लेकिन अब उसकी ‘चाल’ ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई है।
इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में पुलिस ने केतन अग्रवाल की मंगेतर सिया गोयल (20) और उसके प्रेमी चेतन चौधरी (22) को पहले ही सलाखों के पीछे भेज दिया है। अदालत ने दोनों आरोपियों की पुलिस कस्टडी 3 जुलाई 2026 तक बढ़ा दी है। आज यानी 1 जुलाई को पुणे ग्रामीण पुलिस की टीम आरोपी चेतन चौधरी को कड़ी सुरक्षा के बीच लोहगढ़ किले लेकर पहुंची, जहां फाइबर के बने एक विशेष डमी (जिसका वजन मृतक केतन के बराबर था) को खाई में गिराकर पूरे क्राइम सीन को री-क्रिएट किया गया। इसी दौरान पुलिस ने वैज्ञानिक तरीके से आरोपी का ‘गैत टेस्ट’ यानी उसकी चाल का पैटर्न भी रिकॉर्ड किया।
गेट एनालिसिस क्या होती है?
सरल भाषा में समझें तो Gait का अर्थ है किसी व्यक्ति के चलने का स्वाभाविक तरीका या चाल। जब वैज्ञानिक या फॉरेंसिक विशेषज्ञ किसी व्यक्ति के चलने के तरीके का तकनीकी अध्ययन करते हैं, तो उसे गेट एनालिसिस कहा जाता है।
हर व्यक्ति की चाल कई छोटी-छोटी विशेषताओं से मिलकर बनती है। कोई व्यक्ति लंबे कदम रखता है, कोई छोटे। किसी के हाथ चलते समय अधिक हिलते हैं तो किसी के कम। किसी का शरीर थोड़ा आगे की ओर झुका रहता है तो किसी का सीधा। कुछ लोगों के कंधे चलते समय असमान दिखाई देते हैं, जबकि कुछ लोग एक पैर पर दूसरे की तुलना में अधिक दबाव डालते हैं। इन सभी विशेषताओं का संयुक्त विश्लेषण गेट एनालिसिस का आधार होता है।
फॉरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि चाल किसी व्यक्ति की एक प्रकार की व्यवहारिक बायोमेट्रिक पहचान (Behavioural Biometric) मानी जाती है। हालांकि यह फिंगरप्रिंट या डीएनए जितनी स्थायी और विशिष्ट नहीं होती, लेकिन कई परिस्थितियों में पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
क्या हर व्यक्ति की चाल अलग होती है?

मानव शरीर की बनावट, हड्डियों की संरचना, मांसपेशियों की ताकत, उम्र, वजन, लंबाई, स्वास्थ्य और जीवनशैली हर व्यक्ति में अलग होती है। यही कारण है कि दो व्यक्तियों की चाल पूरी तरह एक जैसी होना सामान्यतः संभव नहीं माना जाता।
किसी व्यक्ति की चाल पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। यदि किसी को घुटने की पुरानी चोट है, रीढ़ की समस्या है, पैर में फ्रैक्चर हो चुका है या वह लंबे समय से किसी विशेष प्रकार के जूते पहनता है, तो उसकी चाल में बदलाव दिखाई दे सकता है। इसी तरह उम्र बढ़ने के साथ भी चलने का तरीका बदल सकता है।
यही कारण है कि गेट एनालिसिस केवल एक वीडियो देखकर नहीं की जाती, बल्कि विशेषज्ञ कई कोणों से उपलब्ध वीडियो, शरीर की गति और अन्य परिस्थितियों का भी अध्ययन करते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो Gait Analysis किसी इंसान के चलने, दौड़ने या उठने-बैठने जैसी शारीरिक गतिविधियों के अनूठे पैटर्न का वैज्ञानिक अध्ययन है। जिस तरह दुनिया में किन्हीं भी दो लोगों के फिंगरप्रिंट (उंगलियों के निशान) या डीएनए (DNA) एक जैसे नहीं हो सकते, ठीक उसी तरह हर इंसान के चलने का अंदाज, उसके कदमों की दूरी, हड्डियों की बनावट और शरीर का संतुलन भी बिल्कुल अलग और अनोखा होता है।
फॉरेंसिक साइंस में इस तकनीक का उपयोग तब संजीवनी बूटी की तरह किया जाता है जब किसी अपराधी ने सीसीटीवी कैमरे की नजर से बचने के लिए हेलमेट, नकाब, मास्क या हुडी पहनकर अपना चेहरा पूरी तरह छिपा लिया हो। इस तकनीक के तहत वैज्ञानिक मुख्य रूप से निम्नलिखित शारीरिक पहलुओं का बहुत बारीक विश्लेषण करते हैं
गेट एनालिसिस के पीछे का विज्ञान

गेट एनालिसिस का संबंध बायोमैकेनिक्स (Biomechanics) से है। यह विज्ञान मानव शरीर की गति, संतुलन और मांसपेशियों की कार्यप्रणाली का अध्ययन करता है।
जब कोई व्यक्ति चलता है, तो उसके शरीर में एक साथ कई प्रक्रियाएं होती हैं। मस्तिष्क शरीर को संकेत भेजता है, मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जोड़ (Joints) संतुलन बनाए रखते हैं और पैरों की गति शरीर के भार को आगे बढ़ाती है।
विशेषज्ञ इस पूरी प्रक्रिया को कई तकनीकी मानकों के आधार पर मापते हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- कदमों की लंबाई (Stride Length)
- प्रत्येक कदम के बीच की दूरी (Step Length)
- चलने की गति (Walking Speed)
- पैरों का जमीन से संपर्क (Foot Contact)
- शरीर का संतुलन (Body Balance)
- घुटनों का झुकाव (Knee Angle)
- कूल्हों की गति (Hip Motion)
- हाथों की स्वाभाविक गतिविधि (Arm Swing)
- कंधों की स्थिति (Shoulder Movement)
- सिर और गर्दन की गति
इन सभी बिंदुओं का संयुक्त अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि व्यक्ति की चाल सामान्य है या उसमें कोई विशिष्ट पैटर्न मौजूद है।
गेट एनालिसिस कैसे की जाती है?
आधुनिक फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में गेट एनालिसिस एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत की जाती है।
सबसे पहले उपलब्ध वीडियो फुटेज को उच्च गुणवत्ता में एकत्र किया जाता है। यदि सीसीटीवी कैमरे अलग-अलग स्थानों पर लगे हों, तो विभिन्न कोणों से रिकॉर्ड हुए वीडियो का भी विश्लेषण किया जाता है।
इसके बाद विशेषज्ञ वीडियो को फ्रेम-दर-फ्रेम देखते हैं। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की सहायता से शरीर के विभिन्न हिस्सों की गति को ट्रैक किया जाता है। कई प्रयोगशालाएं अब कंप्यूटर विज़न (Computer Vision) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीकों का भी उपयोग कर रही हैं, जिससे शरीर की गति का डिजिटल मॉडल तैयार किया जा सकता है।
यदि जांच के दौरान किसी संदिग्ध की पहचान हो जाती है, तो नियंत्रित परिस्थितियों में उसकी चाल की रिकॉर्डिंग भी की जा सकती है। कई मामलों में उसे उसी प्रकार के कपड़े, जूते या सामान के साथ चलने के लिए कहा जाता है, जैसा वह घटना के समय पहने हुए दिखाई देता है। इसके बाद दोनों रिकॉर्डिंग का वैज्ञानिक तरीके से तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।
किन क्षेत्रों में उपयोग होती है गेट एनालिसिस?
अधिकांश लोग इसे केवल अपराध जांच से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है।
चिकित्सा विज्ञान में यह तकनीक घुटनों, कूल्हों, रीढ़ और पैरों से संबंधित बीमारियों के उपचार में उपयोग की जाती है। डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की चाल का विश्लेषण करके उपचार की दिशा तय करते हैं।
खेल विज्ञान में एथलीटों और खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए उनकी दौड़ और चाल का अध्ययन किया जाता है। इससे चोट की संभावना कम करने और प्रदर्शन सुधारने में मदद मिलती है।
रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी मानव चाल का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जाता है। वैज्ञानिक मानव जैसी चाल वाले रोबोट विकसित करने के लिए इस तकनीक का उपयोग करते हैं।
कुछ देशों में सुरक्षा एजेंसियां इसे बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली के एक अतिरिक्त साधन के रूप में भी इस्तेमाल करती हैं, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहां चेहरा स्पष्ट दिखाई नहीं देता।
क्या केवल चाल देखकर किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है?

इस प्रश्न का उत्तर सीधा “हाँ” या “नहीं” में देना संभव नहीं है।
फॉरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि गेट एनालिसिस किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे अकेले निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता।
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर अपनी चाल बदलने की कोशिश करे, भारी सामान लेकर चले, अलग प्रकार के जूते पहने हो, चोट लगी हो या सड़क की सतह अलग हो, तो उसकी चाल में बदलाव आ सकता है। इसी कारण गेट एनालिसिस के निष्कर्षों की पुष्टि अन्य साक्ष्यों से करना आवश्यक होता है।
यही वजह है कि जांच एजेंसियां डीएनए, फिंगरप्रिंट, मोबाइल फोन लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ गेट एनालिसिस का मिलान करती हैं।
भारत में गेट एनालिसिस का बढ़ता महत्व
भारत में पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक जांच पर लगातार जोर बढ़ा है। राज्यों की फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं को आधुनिक उपकरणों से लैस किया जा रहा है। सीसीटीवी कैमरों का विस्तार, हाई-रिजॉल्यूशन वीडियो रिकॉर्डिंग और एआई आधारित वीडियो विश्लेषण के कारण अब पहले की तुलना में अधिक सटीक जांच संभव हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में गेट एनालिसिस, फेस रिकग्निशन, डिजिटल फॉरेंसिक, थ्री-डी क्राइम सीन रिकंस्ट्रक्शन और एआई आधारित जांच तकनीकों का उपयोग भारतीय जांच एजेंसियों में और बढ़ सकता है। हालांकि प्रत्येक तकनीक का उपयोग कानून और न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में ही किया जाता है और किसी भी निष्कर्ष के लिए स्वतंत्र साक्ष्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
पुणे केतन अग्रवाल हत्याकांड में गेट एनालिसिस का इस्तेमाल क्यों किया गया?
महाराष्ट्र के चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच के दौरान गेट एनालिसिस (Gait Analysis) का उपयोग किए जाने के बाद यह तकनीक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई। पुणे ग्रामीण पुलिस के अनुसार जांच के दौरान घटनास्थल और आसपास के क्षेत्रों से कई सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य एकत्र किए गए। इनमें कुछ वीडियो ऐसे थे जिनमें एक संदिग्ध व्यक्ति दिखाई दे रहा था, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह स्पष्ट नहीं था क्योंकि उसने अपना चेहरा ढक रखा था। ऐसी स्थिति में केवल चेहरे के आधार पर पहचान करना आसान नहीं था। इसी कारण जांच एजेंसियों ने संदिग्ध की चाल और शारीरिक गतिविधियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का निर्णय लिया।
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने केवल वीडियो देखने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि घटनास्थल पर पूरे घटनाक्रम का दोबारा पुनर्निर्माण (Crime Scene Reconstruction) भी किया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह समझना था कि घटना किस प्रकार हुई होगी, संबंधित व्यक्तियों की गतिविधियां कैसी रही होंगी और उपलब्ध वीडियो फुटेज से उनका कितना मेल बैठता है। पुलिस ने सार्वजनिक रूप से बताया कि जांच के दौरान गेट एनालिसिस को अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ मिलाकर देखा जा रहा है, न कि इसे अकेले निर्णायक प्रमाण माना जा रहा है।
यह पूरी दर्दनाक घटना बीती 18 जून 2026 की है, जब पुणे के रहने वाले 25 वर्षीय होनहार बिल्डर केतन अग्रवाल की लोहगढ़ किले से गिरकर मौत हो गई थी। शुरुआत में इसे पैर फिसलने से हुआ एक साधारण हादसा माना जा रहा था, लेकिन गहराई से जांच करने पर पुलिस को केतन की मंगेतर सिया गोयल पर शक हुआ। सिया और केतन की सगाई इसी साल फरवरी में हुई थी और नवंबर 2026 में उनकी शादी होने वाली थी। जांच में सामने आया कि सिया इस शादी से खुश नहीं थी और अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर उसने केतन को रास्ते से हटाने की खौफनाक साजिश रची।
साजिश के तहत 18 जून को केतन को पहाड़ों पर घूमने और ट्रेकिंग के बहाने लोहगढ़ किले की चोटी पर बुलाया गया। पुलिस जांच के अनुसार, वहां पर सिया के एक इशारे पर चेतन ने केतन को पीछे से जोरदार धक्का देकर 300 फीट नीचे गहरी खाई में गिरा दिया। पुलिस को घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी (CCTV) कैमरों में एक संदिग्ध युवक दिखाई दिया, जिसने अपनी पहचान छिपाने के लिए हुडी (टॉपी वाली टी-शर्ट) पहन रखी थी और अपना चेहरा पूरी तरह ढक रखा था। चूंकि चेहरे से पहचान करना नामुमकिन था, इसलिए महाराष्ट्र पुलिस ने इस कानूनी चुनौती से निपटने के लिए Gait Analysis को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है ताकि आरोपी का दोष कोर्ट में अकाट्य तरीके से साबित किया जा सके।
लोहगढ़ किले पर क्राइम सीन री-क्रिएशन: डमी और हुडी का खेल
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने लोहगढ़ किले को आम पर्यटकों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया था। आज, 1 जुलाई को एडिशनल एसपी शुभम कुमार के नेतृत्व में पुलिस की भारी-भरकम टीम आरोपी चेतन चौधरी को लेकर उस सटीक स्थान पर पहुंची जहां से केतन को गिराया गया था।
पुलिस ने जांच को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाने के लिए चेतन को ठीक वैसी ही हुडी पहनाई जैसी उसने वारदात के दिन पहनी थी और उसे सीसीटीवी कैमरे के सामने उसी रास्ते और उसी ढलान पर दोबारा चलाया गया। इस प्रक्रिया से कैमरे के एंगल, रोशनी की स्थिति और पहाड़ी रास्ते के प्रभाव को बिल्कुल हूबहू री-क्रिएट किया गया। इसके बाद, विशेषज्ञों की टीम दोनों वीडियो के सिलुइट (परछाईं और शारीरिक बनावट के ढांचे) का मिलान करेगी। इसके अलावा, पुलिस ने केतन के वजन के बराबर एक फाइबर डमी को पहाड़ी से नीचे फेंककर यह भी जांचा कि गिरने के दौरान शरीर को किस तरह की चोटें आ सकती हैं।
क्राइम सीन रीक्रिएशन में डमी का उपयोग क्यों किया गया?

जांच के दौरान पुलिस ने मृतक के शरीर के वजन के बराबर वजन वाला एक डमी (Dummy) तैयार कराया। इसका उद्देश्य घटनास्थल पर संभावित घटनाक्रम को वास्तविक परिस्थितियों के अधिक निकट जाकर समझना था।
फॉरेंसिक जांच में यह एक सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया मानी जाती है। यदि किसी घटना में शरीर को उठाने, खींचने, ले जाने या किसी स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का दावा किया जाता है, तो उसी वजन वाले डमी का उपयोग करके यह देखा जाता है कि संबंधित गतिविधि व्यवहारिक रूप से संभव थी या नहीं।
पुलिस ने इस अभ्यास के दौरान संबंधित व्यक्तियों की चाल, गति, शरीर के संतुलन और गतिविधियों का भी रिकॉर्ड तैयार किया। बाद में इनकी तुलना घटनास्थल से मिले वीडियो और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड से की गई।
विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार का पुनर्निर्माण जांच एजेंसियों को घटनाक्रम की वैज्ञानिक समझ विकसित करने में मदद करता है। हालांकि इसका अंतिम उद्देश्य केवल जांच को आगे बढ़ाना होता है। न्यायालय में इसका मूल्यांकन अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ किया जाता है।
गेट एनालिसिस में किन बातों का मिलान किया जाता है?
जब किसी संदिग्ध की चाल का विश्लेषण किया जाता है, तो विशेषज्ञ केवल यह नहीं देखते कि वह कैसे चल रहा है। वे शरीर की अनेक गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन करते हैं।
विश्लेषण के दौरान मुख्य रूप से निम्न बिंदुओं पर ध्यान दिया जाता है—
- कदमों की लंबाई और चौड़ाई
- चलने की गति
- शरीर का संतुलन
- हाथों की स्वाभाविक गतिविधि
- कंधों का झुकाव
- सिर की स्थिति
- पैरों का जमीन पर पड़ने का तरीका
- शरीर का भार एक पैर से दूसरे पैर पर स्थानांतरित होने का पैटर्न
यदि संदिग्ध के कई वीडियो उपलब्ध हों, तो अलग-अलग समय के वीडियो का भी आपस में मिलान किया जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि चाल का पैटर्न लगातार एक जैसा है या परिस्थितियों के अनुसार बदल रहा है।
क्या गेट एनालिसिस अकेले किसी व्यक्ति को दोषी साबित कर सकती है?
इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है।
फॉरेंसिक विज्ञान में गेट एनालिसिस को सहायक वैज्ञानिक तकनीक (Corroborative Evidence) माना जाता है। इसका उद्देश्य जांच को दिशा देना और अन्य साक्ष्यों की पुष्टि करना होता है।
यदि किसी व्यक्ति की चाल वीडियो में दिखाई दे रही चाल से मिलती-जुलती है, तो यह जांच का एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। लेकिन केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत में किसी भी आपराधिक मामले का निर्णय कई प्रकार के साक्ष्यों के संयुक्त मूल्यांकन पर आधारित होता है। इनमें फॉरेंसिक रिपोर्ट, डीएनए, फिंगरप्रिंट, डिजिटल साक्ष्य, मोबाइल लोकेशन, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्य शामिल हो सकते हैं।
इसी कारण विशेषज्ञ हमेशा सलाह देते हैं कि गेट एनालिसिस को स्वतंत्र प्रमाण नहीं बल्कि वैज्ञानिक जांच के एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
डिलीटेड डेटा और गायब पासपोर्ट की तलाश में जुटी पुलिस
फॉरेंसिक चाल विश्लेषण के अलावा, मामले में कई और चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। सरकारी वकील राजश्री विरकुड ने अदालत को बताया कि आरोपियों ने वारदात को अंजाम देने के बाद अपने मोबाइल फोन से कई महत्वपूर्ण डिजिटल डेटा और व्हाट्सएप चैट्स को डिलीट कर दिया था। साइबर सेल इस डेटा को रिकवर करने की कोशिश कर रही है।
इसके साथ ही, यह भी सामने आया है कि सिया गोयल केतन के साथ प्री-वेडिंग शूट के लिए बाली (इंडोनेशिया) नहीं जाना चाहती थी। उसने केतन का पासपोर्ट उसके बैग से निकालकर रायगढ़ जिले के खालापूर फूड मॉल के पास कहीं फेंक दिया था, जिसे बरामद करने के लिए पुलिस लगातार कस्टडी में पूछताछ कर रही है। मामले की गंभीरता को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने इस केस को फास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast-Track Court) में चलाने की मंजूरी दे दी है और देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम को स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर (विशेष सरकारी वकील) नियुक्त किया गया है।
क्या भारतीय अदालतों में गेट एनालिसिस स्वीकार की जाती है?
भारत में गेट एनालिसिस पर अभी न्यायिक स्तर पर बहुत सीमित उदाहरण उपलब्ध हैं। अदालतें किसी भी वैज्ञानिक तकनीक का मूल्यांकन मामले के तथ्यों, विशेषज्ञों की राय और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर करती हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गेट एनालिसिस किसी मान्यता प्राप्त फॉरेंसिक प्रक्रिया के तहत की गई हो और उसका समर्थन अन्य स्वतंत्र साक्ष्य भी करते हों, तो उसे जांच में सहायक सामग्री के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल चाल के आधार पर दोषी ठहराना न्यायिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं माना जाता।
यही कारण है कि जांच एजेंसियां हमेशा गेट एनालिसिस के साथ अन्य वैज्ञानिक और डिजिटल प्रमाण भी एकत्र करती हैं।
पुणे पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मामले पर आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया, “आरोपी चेतन चौधरी ने सीसीटीवी से बचने के लिए हुडी का इस्तेमाल किया था ताकि चेहरा न दिखे। हम फॉरेंसिक लैब के विशेषज्ञों की मदद से मूल सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे व्यक्ति की चाल की तुलना आज रिकॉर्ड की गई चेतन की लाइव चाल से कर रहे हैं। इस समानता को जांचने के लिए हम आधुनिक कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स का भी उपयोग कर रहे हैं।”
दुनिया के कई देशों में पहले से हो रहा है उपयोग
ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कुछ यूरोपीय देशों में सुरक्षा एजेंसियां और फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं वर्षों से गेट एनालिसिस का उपयोग कर रही हैं। विशेष रूप से उन मामलों में जहां सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध हो लेकिन चेहरा स्पष्ट न दिखाई दे, वहां यह तकनीक अतिरिक्त सहायता प्रदान करती है।
हालांकि इन देशों में भी इसे अकेले निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जाता। विशेषज्ञ रिपोर्ट को अन्य उपलब्ध प्रमाणों के साथ जोड़कर ही जांच आगे बढ़ाई जाती है।
क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गेट एनालिसिस को और बेहतर बना रही है?

हाल के वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग और कंप्यूटर विज़न तकनीकों के विकास ने गेट एनालिसिस को अधिक उन्नत बनाया है।
अब विशेष सॉफ्टवेयर वीडियो के प्रत्येक फ्रेम का विश्लेषण करके शरीर के प्रमुख बिंदुओं की डिजिटल मैपिंग तैयार कर सकते हैं। इससे शरीर की गति, चाल और संतुलन का तुलनात्मक अध्ययन पहले की तुलना में अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।
फिर भी विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि अंतिम निष्कर्ष मानव विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध सभी साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद ही निकाला जाता है। केवल सॉफ्टवेयर के विश्लेषण के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
फॉरेंसिक विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक अपराध जांच में डिजिटल साक्ष्यों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ने और वीडियो रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता बेहतर होने से गेट एनालिसिस जैसी तकनीकों का उपयोग भी बढ़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर वीडियो विश्लेषण की अपनी सीमाएं होती हैं। कैमरे का कोण, प्रकाश व्यवस्था, वीडियो की गुणवत्ता, व्यक्ति द्वारा पहने गए कपड़े, जूते, सामान का वजन और चलने की सतह—ये सभी कारक परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसी भी जांच में वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालते समय इन सभी पहलुओं का ध्यान रखना आवश्यक होता है।
पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड ने गेट एनालिसिस को आम चर्चा का विषय बना दिया है। इस मामले ने यह भी दिखाया है कि भारत में अपराध जांच अब धीरे-धीरे आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों की ओर बढ़ रही है।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि गेट एनालिसिस कोई जादुई तकनीक नहीं है और न ही यह अपने आप किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष साबित कर सकती है। इसकी वास्तविक उपयोगिता तब होती है जब इसे डीएनए, डिजिटल फॉरेंसिक, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल डेटा और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ जोड़कर देखा जाए।
जांच एजेंसियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण सहायक उपकरण है, जबकि अंतिम निर्णय हमेशा न्यायालय द्वारा प्रस्तुत सभी साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर ही किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
गेट एनालिसिस (Gait Analysis) क्या है?
गेट एनालिसिस किसी व्यक्ति के चलने के प्राकृतिक तरीके (Walking Pattern) का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसमें शरीर की गति, कदमों की लंबाई, हाथों की गतिविधि, शरीर का संतुलन और अन्य बायोमैकेनिकल पहलुओं का विश्लेषण किया जाता है। इसका उपयोग चिकित्सा, खेल विज्ञान और फॉरेंसिक जांच में किया जाता है। किसी व्यक्ति के चलने के तरीके का वैज्ञानिक और डिजिटल अध्ययन है। जैसे हर व्यक्ति के उंगलियों के निशान (Fingerprints) अलग होते हैं, वैसे ही उसके चलने की गति, पैरों की दूरी, और रीढ़ की हड्डी का झुकाव भी अनोखा होता है। कैमरे में चेहरा न दिखने पर भी इस तकनीक से अपराधी को उसकी चाल से पहचाना जा सकता है।
क्या हर व्यक्ति की चाल अलग होती है?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश लोगों की चाल में कुछ न कुछ विशिष्ट विशेषताएं होती हैं। शरीर की बनावट, ऊंचाई, वजन, उम्र, स्वास्थ्य, मांसपेशियों की स्थिति और चलने की आदतें चाल को प्रभावित करती हैं। हालांकि दो व्यक्तियों की चाल में समानताएं भी हो सकती हैं, इसलिए केवल चाल के आधार पर अंतिम पहचान नहीं की जाती।
क्या केवल गेट एनालिसिस के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सकता है?
नहीं। गेट एनालिसिस को फॉरेंसिक जांच में एक सहायक (Corroborative) तकनीक माना जाता है। किसी भी आपराधिक मामले में अदालत डीएनए, फिंगरप्रिंट, डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ इसका मूल्यांकन करती है।
केतन अग्रवाल मर्डर केस में पुणे पुलिस को इस तकनीक की जरूरत क्यों पड़ी?
मुख्य आरोपी चेतन चौधरी ने वारदात के समय हुडी पहनकर अपना चेहरा पूरी तरह छुपा लिया था। सीसीटीवी फुटेज में चेहरा साफ न होने के कारण पुलिस उसकी पहचान अकाट्य तरीके से साबित करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में उसकी चाल के पैटर्न का मिलान मूल फुटेज से कर रही है।
लोहगढ़ किले पर 1 जुलाई को पुलिस ने फाइबर डमी का उपयोग क्यों किया?
पुलिस ने मृतक केतन अग्रवाल के शरीर के वजन और कद के बराबर एक फाइबर डमी बनाई थी। इसे पहाड़ी की चोटी से नीचे फेंककर गिरने की गति, दिशा और खाई की गहराई का सटीक वैज्ञानिक विश्लेषण (Crime Scene Reconstruction) किया गया ताकि आरोपियों के बयानों की सत्यता जांची जा सके।
क्या भारत में गेट एनालिसिस नई तकनीक है?
गेट एनालिसिस स्वयं नई तकनीक नहीं है, लेकिन भारतीय आपराधिक जांच में इसका उपयोग अभी सीमित है। आधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक और सीसीटीवी विश्लेषण के विस्तार के साथ इसका उपयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
गेट एनालिसिस किन क्षेत्रों में उपयोग होती है?
इसका उपयोग फॉरेंसिक जांच के अलावा चिकित्सा विज्ञान, फिजियोथेरेपी, खेल विज्ञान, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बायोमैकेनिक्स और सुरक्षा अनुसंधान में भी किया जाता है।
क्या गेट एनालिसिस पूरी तरह सटीक होती है?
नहीं। किसी व्यक्ति की चाल कपड़ों, जूतों, चोट, उम्र, वजन, सड़क की स्थिति या जानबूझकर बदली गई चाल के कारण प्रभावित हो सकती है। इसलिए विशेषज्ञ इसे अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ मिलाकर ही देखते हैं।
क्या भारत के नए कानूनों और अदालतों में इस चाल विश्लेषण को वैध सबूत माना जाता है?
हां, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के तहत डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों को अदालत में स्वीकार किया जाता है। इसे एक मजबूत ‘कोरोबोरेटिव एविडेंस’ (पुख्ता करने वाला पूरक साक्ष्य) माना जाता है, जो बाकी अन्य सबूतों के साथ मिलकर केस को बेहद मजबूत बनाता है।
गेट एनालिसिस आधुनिक फॉरेंसिक विज्ञान की एक महत्वपूर्ण तकनीक है, लेकिन इसे अंतिम और स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जाता। पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड में इसका उपयोग इस बात का संकेत है कि भारत की जांच एजेंसियां अब डिजिटल और वैज्ञानिक जांच पद्धतियों को अधिक महत्व दे रही हैं। हालांकि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी निष्कर्ष का आधार हमेशा सभी उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन ही होता है।
