Petrol-Diesel की कीमत पर बड़ा गणित: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल हुआ सस्ता, फिर भी भारतीय जनता को क्यों नहीं मिल रही राहत?

Published on: 19-06-2026
तेल के बैरल, पेट्रोल पंप और बढ़ती ईंधन कीमतों का प्रतीकात्मक दृश्य

Petrol-Diesel की कीमत आज आम भारतीय नागरिक के बजट का सबसे बड़ा और संवेदनशील हिस्सा बन चुकी है। पिछले कुछ हफ्तों में वैश्विक बाजार के समीकरण तेजी से बदले हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शुरुआती राजनयिक घटनाक्रमों और मध्य पूर्व में तनाव में कुछ नरमी आने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी ब्रेंट क्रूड की कीमतें घटकर 83 से 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं। वैश्विक तेल बाजार में आई इस गिरावट के बाद देश के आम मध्यमवर्गीय परिवारों, नौकरीपेशा लोगों और छोटे व्यापारियों को उम्मीद थी कि भारत में भी ईंधन के दामों में बड़ी कटौती होगी। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। देश के प्रमुख महानगरों में आज भी पेट्रोल 100 रुपये से लेकर 115 रुपये प्रति लीटर के पार बिक रहा है, जबकि डीजल भी कई राज्यों में सेंचुरी लगाने के बेहद करीब या उसके पार बना हुआ है। इस स्थिति ने एक बड़ा बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि जब दुनिया में कच्चा तेल सस्ता हो रहा है, तो भारत के आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर क्यों नहीं दिख रहा और जनता को इस भारी-भरकम महंगाई से असल राहत कब नसीब होगी।

अगर हम देश के अलग-अलग हिस्सों में आज की कीमतों पर नजर डालें, तो स्थिति की गंभीरता साफ समझ आती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई है। वहीं, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में जनता को सबसे ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है, जहां पेट्रोल 111.21 रुपये और डीजल 97.83 रुपये प्रति लीटर के ऊंचे स्तर पर टिका हुआ है। दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों जैसे हैदराबाद में पेट्रोल 115.73 रुपये और बेंगलुरु में 110.89 रुपये प्रति लीटर पर बिक रहा है, जबकि कोलकाता में यह आंकड़ा 113.47 रुपये प्रति लीटर है। अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आ रहे उतार-चढ़ाव का फायदा घरेलू रिटेल उपभोक्ताओं तक न पहुंचने के पीछे तेल विपणन कंपनियों (OMCs) का पुराना घाटा और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लगाया जाने वाला भारी-भरकम टैक्स का ढांचा है। जब तक इस टैक्स व्यवस्था और कंपनियों के मार्जिन के गणित को पूरी तरह नहीं बदला जाता, तब तक आम जनता को पेट्रोल पंपों पर कोई बड़ी या टिकाऊ राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम दिखाई देती है।

कच्चे तेल की मौजूदा वैश्विक स्थिति और कीमतों का गणित

वैश्विक तेल बाजार में कच्चे तेल के बैरल (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में काफी उठापटक देखने को मिली है। कुछ समय पहले जब पश्चिम एशिया के रणनीतिक जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हारमुज’ में मालवाहक जहाजों की सुरक्षा को लेकर संकट गहराया था, तब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछलकर दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार की इस तेजी का सीधा दबाव हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। हालांकि, कूटनीतिक मोर्चे पर हुई नई वार्ताओं और तनाव को कम करने के प्रयासों के बाद ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में लगभग 5 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई और यह नरम होकर 83.42 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। इसी तरह अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी घटकर 81.12 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।

वैश्विक बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतों में इतनी बड़ी गिरावट आती है, तो रिफाइनिंग कंपनियों के लिए कच्चे माल की लागत (Landed Cost) काफी कम हो जाती है। एक बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की मौजूदा विनिमय दर को ध्यान में रखते हुए अगर हम हिसाब लगाएं, तो रिफाइनरियों को मिलने वाले कच्चे तेल की प्रति लीटर मूल लागत काफी कम बैठती है। इसके बावजूद जब यह तेल शोधन प्रक्रियाओं (Refining) से गुजरकर और परिवहन लागत (Freight) जुड़कर डीलर तक पहुंचता है, तो इसकी कीमत में टैक्स का एक ऐसा चक्रव्यूह जुड़ जाता है जिससे इसकी अंतिम कीमत दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है।

टैक्स का चक्रव्यूह: बेस प्राइस से रिटेल रेट तक का सफर

टैक्स और ईंधन मूल्य संरचना का इन्फोग्राफिक

भारत में ईंधन की कीमतें कैसे तय होती हैं, इसे समझे बिना हम इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते कि कच्चा तेल सस्ता होने पर भी आम आदमी को राहत क्यों नहीं मिलती। जब तेल कंपनियां कच्चे तेल को साफ करके पेट्रोल पंप के डीलरों को बेचती हैं, तो उसे ‘प्राइस चार्ज्ड टू डीलर्स’ या बेस प्राइस कहा जाता है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में पेट्रोल का बेस प्राइस और रिफाइनिंग व ट्रांसपोर्टेशन का खर्च मिलाकर यह कीमत लगभग 76 से 79 रुपये प्रति लीटर के बीच बैठती है। लेकिन जैसे ही यह तेल आम उपभोक्ता की गाड़ी की टंकी में जाने के लिए तैयार होता है, वैसे ही केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) और संबंधित राज्य सरकार का वैट (Value Added Tax) इस पर लागू हो जाता है।

ClearTax की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पेट्रोल की अंतिम खुदरा कीमत का लगभग 50 से 55 फीसदी हिस्सा केवल टैक्स और डीलर कमीशन के रूप में वसूला जाता है, जबकि डीजल के मामले में यह आंकड़ा 45 से 50 फीसदी के बीच रहता है। केंद्र सरकार द्वारा ली जाने वाली एक्साइज ड्यूटी में एक बड़ा हिस्सा उपकर (Cess) और सरचार्ज का होता है, जो सीधा केंद्रीय कोष में जाता है और राज्यों के साथ साझा नहीं होता। इसके बाद हर राज्य सरकार अपने नियमों के अनुसार 15 फीसदी से लेकर 30 फीसदी तक वैट या सेल्स टैक्स वसूलती है। यही वजह है कि दिल्ली की तुलना में मुंबई, जयपुर या हैदराबाद में ईंधन की कीमतें काफी ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां की राज्य सरकारें अधिक दर से टैक्स लगाती हैं। इस भारी-भरकम टैक्स ढांचे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के 5-10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता होने का लाभ भी घरेलू बाजार में केवल चंद पैसों की कटौती के रूप में ही सिमट कर रह जाता है।

तेल कंपनियों (OMCs) का मुनाफा और पुराना घाटा

तेल उत्पादक देशों की बैठक का प्रतीकात्मक दृश्य (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

आम जनता के बीच अक्सर यह गुस्सा देखा जाता है कि जब वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो तेल कंपनियां तुरंत हर दिन कीमतें बढ़ाना शुरू कर देती हैं, लेकिन जब कीमतें घटती हैं, तो वे हफ्तों तक दामों को जस का तस बनाए रखती हैं। इसके पीछे तेल विपणन कंपनियों (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम) का अपना एक अलग वित्तीय तर्क होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल बहुत महंगा था और देश में आम चुनावों या राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण खुदरा कीमतें नहीं बढ़ाई गई थीं, तब इन सरकारी तेल कंपनियों को प्रति लीटर बिक्री पर भारी नुकसान (Under-recoveries) उठाना पड़ा था।

कंपनियों का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड सस्ता होता है, तो वे उस स्थिति का उपयोग अपने पुराने संचित घाटे की भरपाई करने और अपने बैलेंस शीट को मजबूत बनाने के लिए करती हैं। इसके अलावा, तेल कंपनियों को भविष्य में आने वाले किसी भी अचानक कूटनीतिक संकट या युद्ध जैसी स्थिति से निपटने के लिए एक बड़ा वित्तीय बफर (सुरक्षा कोष) बनाकर रखना पड़ता है। हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि कंपनियां अब अपने पुराने घाटे से पूरी तरह उबर चुकी हैं और रिकॉर्ड तिमाही मुनाफा कमा रही हैं। ऐसे में मुनाफे का एक हिस्सा खुदरा कीमतों में कटौती करके सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाना चाहिए, ताकि बाजार में चौतरफा बढ़ती महंगाई से त्रस्त जनता को कुछ राहत मिल सके।

बढ़ती ईंधन कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक पर असर

भारत के पेट्रोल पंप पर ईंधन भराते वाहन (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

ईंधन की कीमतों का सीधा संबंध देश की रिटेल महंगाई दर (CPI) से होता है। पेट्रोल और डीजल केवल निजी गाड़ियां चलाने वाले अमीरों या मध्यम वर्ग को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि इनका सबसे बड़ा असर देश की पूरी सप्लाई चेन और माल ढुलाई व्यवस्था पर पड़ता है। भारत में अधिकांश फल, सब्जियां, अनाज और औद्योगिक कच्चा माल एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रकों और कमर्शियल वाहनों के जरिए ही भेजा जाता है। जब डीजल की कीमतें 95 से 100 रुपये के बीच बनी रहती हैं, तो ट्रांसपोर्टरों की परिचालन लागत बढ़ जाती है, जिसे वे सीधे माल भाड़े में जोड़ देते हैं।

भाड़ा बढ़ने का सीधा नतीजा यह होता है कि स्थानीय मंडियों में आने वाले आलू, प्याज, टमाटर से लेकर दालों और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं के दाम आम उपभोक्ताओं के लिए महंगे हो जाते हैं। इसके अलावा, खेती-किसानी के काम में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर और सिंचाई पंप भी पूरी तरह डीजल पर निर्भर करते हैं, जिससे किसानों की लागत बढ़ जाती है। सीधे शब्दों में कहें तो पेट्रोल डीजल की कीमत में होने वाली हर छोटी बढ़ोतरी आम भारतीय थाली के बजट को बिगाड़ देती है और रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी महंगाई को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

आधिकारिक बयान और विशेषज्ञों की राय

“अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, घरेलू स्तर पर खुदरा कीमतों को घटाने का फैसला पूरी तरह से तेल विपणन कंपनियों के कमर्शियल आकलन और सरकारों की राजकोषीय स्थिति पर निर्भर करता है। हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में बाजार स्थिर होने पर इसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा।” — केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी

“जब तक पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में नहीं लाया जाता या केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अपने टैक्स मार्जिन में कम से कम 10 से 15 रुपये की स्थायी कटौती नहीं करतीं, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड के 80 डॉलर से नीचे जाने पर भी भारतीय जनता को कोई बड़ी और वास्तविक राहत मिलना असंभव है।” — प्रसिद्ध ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक

जनता को असल राहत कब और कैसे मिल सकती है?

इस जटिल समस्या का समाधान केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। आम जनता को राहत देने के लिए घरेलू स्तर पर तीन बड़े नीतिगत कदम उठाने की सख्त जरूरत है:

  • टैक्स ढांचे में तत्काल कटौती: केंद्र सरकार अपनी एक्साइज ड्यूटी को तर्कसंगत बनाए और राज्य सरकारें भी चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर वैट की दरों में कुछ ढील दें। यदि दोनों पक्ष मिलकर टैक्स कम करें, तो कीमतें तुरंत 10 से 12 रुपये प्रति लीटर तक नीचे आ सकती हैं।
  • GST के दायरे में लाना: देश में लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि ईंधन को भी जीएसटी के तहत लाया जाए। यदि पेट्रोल-डीजल पर अधिकतम 28 फीसदी का जीएसटी स्लैब भी लगाया जाए, तो भी देश भर में पेट्रोल की कीमतें घटकर 75 से 80 रुपये के बीच आ जाएंगी। हालांकि, राजस्व के नुकसान के डर से केंद्र और राज्य दोनों ही इस पर आम सहमति बनाने से कतराते रहे हैं।
  • वैकल्पिक ईंधन और इथेनॉल ब्लेंडिंग: सरकार वर्तमान में पेट्रोल में 20 फीसदी तक इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य (Ethanol Blending) पर तेजी से काम कर रही है। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। आने वाले समय में कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता जितनी कम होगी, वैश्विक झटकों से हमारा घरेलू बाजार उतना ही सुरक्षित रहेगा।

टैक्स का चक्रव्यूह: केंद्र का सेस और राज्यों का वैट (VAT)

सबसे बड़ी समस्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजस्व बटवारे की जंग है। भारत में बिकने वाले एक लीटर पेट्रोल या डीजल की मूल कीमत (Base Price) वास्तव में काफी कम होती है। लेकिन जब यह उपभोक्ता तक पहुंचता है, तो इस पर 50 फीसदी से ज्यादा सिर्फ टैक्स लगा होता है।

यहाँ विचारनीय पहलू यह है कि केंद्र सरकार बुनियादी एक्साइज ड्यूटी को कम करके उसकी जगह ‘सेस’ (Cess) और सरचार्ज बढ़ा देती है। नियमों के मुताबिक, सेस से कमाया गया पैसा केंद्र सरकार को राज्यों के साथ साझा नहीं करना पड़ता। इससे राज्यों को अपने हिस्से का राजस्व कम मिलता है, जिसके जवाब में राज्य सरकारें अपने क्षेत्रों में भारी वैट (VAT) लगा देती हैं। इस राजकोषीय खींचतान के बीच आम जनता पिस रही है, क्योंकि कोई भी पक्ष अपने टैक्स राजस्व को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

अर्थव्यवस्था और आम थाली पर इम्पैक्ट

जब कच्चा तेल सस्ता पेट्रोल डीजल महंगा वाली स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सबसे घातक असर देश की महंगाई दर (Inflation) पर पड़ता है। भारत में 80% से अधिक माल ढुलाई ट्रकों और कमर्शियल वाहनों के जरिए होती है जो डीजल से चलते हैं। डीजल के दाम ऊंचे रहने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट (ढुलाई खर्च) बढ़ जाता है।

इसका सीधा क्रिटिकल इम्पैक्ट यह होता है कि मंडियों में आने वाली हरी सब्जियां, फल, दालें, दूध और रोजमर्रा की जरूरत का हर सामान महंगा हो जाता है। इसके अलावा, भारत का ग्रामीण क्षेत्र और कृषि व्यवस्था पूरी तरह डीजल इंजनों पर निर्भर है। महंगे ईंधन के कारण किसानों की खेती की लागत बढ़ जाती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ती है। यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक संकट है जो देश के आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर रहा है।

क्या ईंधन को जीएसटी (GST) के दायरे में लाना ही एकमात्र समाधान है?

नीतिगत स्तर पर अगर हम इसको देखें, तो अक्सर यह सुझाव दिया जाता है कि पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाया जाए। अगर ईंधन को जीएसटी के उच्चतम 28% स्लैब में भी रखा जाए, तो भी देश भर में पेट्रोल की कीमत घटकर 75 से 80 रुपये के बीच आ जाएगी।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ा केंच यह है कि केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें इस पर कभी सहमत नहीं होंगी। पेट्रोल और डीजल सरकारों के लिए ‘कैश काउ’ (तुरंत नकद राजस्व देने वाला जरिया) हैं। जीएसटी में आने के बाद सरकारों के हाथ से अपनी मर्जी से टैक्स बढ़ाने का अधिकार छिन जाएगा। इसलिए, राजनैतिक बयानों में तो जीएसटी की बात की जाती है, लेकिन हकीकत में कोई भी सरकार अपनी इस फिक्स्ड कमाई को छोड़ना नहीं चाहती।

राहत की राह पर अनिश्चितता के बादल

समुद्री मार्ग से तेल परिवहन करते टैंकर (प्रतीकात्मक AI-निर्मित चित्र)

कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का सस्ता होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छा अवसर जरूर लेकर आया है, लेकिन तेल कंपनियों की मुनाफाखोरी और सरकारों की टैक्स पर अत्यधिक निर्भरता के चलते यह लाभ आम आदमी की जेब तक नहीं पहुंच पा रहा है। जनता आज भी इसी उम्मीद में पेट्रोल पंपों के चक्कर काट रही है कि कभी तो कूटनीतिक स्थिरता और सरकारी संवेदनशीलता के चलते उन्हें सस्ते ईंधन का वास्तविक अधिकार मिलेगा। आने वाले महीनों में यदि क्रूड ऑयल की कीमतें इसी तरह स्थिर रहती हैं, तो तेल कंपनियों पर कीमतें घटाने का दबाव और बढ़ेगा, जिसके बाद ही देश में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की कोई वास्तविक उम्मीद की जा सकती है।

नीतिगत संवेदनशीलता की जरूरत

इस पूरे कूटनीतिक और आर्थिक विश्लेषण का अंतिम सत्य यही है कि जब तक सरकारें और तेल कंपनियां अपने तात्कालिक वित्तीय लाभ से ऊपर उठकर आम जनता के हितों को प्राथमिकता नहीं देंगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के $50 पर आने के बाद भी भारतीयों को महंगा तेल ही खरीदना पड़ेगा। सरकार को तेल कंपनियों के मूल्य निर्धारण तंत्र (Pricing Mechanism) में अधिक पारदर्शिता लानी होगी ताकि वैश्विक मंदी का सीधा और वास्तविक लाभ देश के अंतिम नागरिक की जेब तक पहुंच सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तो भारत में पेट्रोल डीजल की कीमत तुरंत क्यों नहीं घटती?

उत्तर: भारत में तेल कंपनियां दैनिक आधार पर समीक्षा तो करती हैं, लेकिन खुदरा कीमतें तय करते समय वे अपने पिछले संचित घाटों, रिफाइनिंग मार्जिन और भविष्य के बाजार जोखिमों को भी ध्यान में रखती हैं। इसके अलावा, अंतिम कीमत का 50% से अधिक हिस्सा फिक्स टैक्स (एक्साइज और वैट) का होता है, जिसमें क्रूड सस्ता होने पर भी कोई बदलाव नहीं होता। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार की गिरावट का सीधा और तुरंत लाभ आम उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाता।

प्रश्न 2: पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारें कितना टैक्स वसूलती हैं?

उत्तर: केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) लगाती है, जिसमें बेसिक ड्यूटी के साथ-साथ सड़क, बुनियादी ढांचा और कृषि उपकर (Cess) शामिल होते हैं। इसके ऊपर अलग-अलग राज्य सरकारें अपनी जरूरत के हिसाब से 15% से 30% तक वैट (VAT) या सेल्स टैक्स लगाती हैं। कुल मिलाकर, उपभोक्ता द्वारा दिए जाने वाले हर 100 रुपये में से लगभग 50 से 55 रुपये सरकारों के खाते में टैक्स के रूप में जाते हैं।

प्रश्न 3: भारत के अलग-अलग राज्यों और शहरों में पेट्रोल-डीजल के रेट में इतना अंतर क्यों होता है?

उत्तर: देश के अलग-अलग राज्यों में ईंधन की कीमतों में अंतर होने का मुख्य कारण वहां की राज्य सरकारों द्वारा तय की गई वैट (VAT) की दरें हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में वैट की दरें अधिक हैं, इसलिए वहां मुंबई और जयपुर में पेट्रोल महंगा मिलता है, जबकि दिल्ली या अंडमान निकोबार जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में टैक्स की दरें तुलनात्मक रूप से कम होने के कारण ईंधन थोड़ा सस्ता होता है। इसके अलावा रिफाइनरी से शहर की दूरी और परिवहन खर्च (Freight charges) भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 4: क्या पेट्रोल और डीजल को जीएसटी (GST) के दायरे में लाने से कीमतें कम हो सकती हैं?

उत्तर: हां, यदि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है, तो इन पर लगने वाले अलग-अलग केंद्रीय और राज्य टैक्स खत्म हो जाएंगे। अगर इन पर जीएसटी का सबसे ऊंचा स्लैब यानी 28% भी लगाया जाए, तो भी देश भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें मौजूदा रेट से कम से कम 20 से 25 रुपये प्रति लीटर तक सस्ती हो सकती हैं। हालांकि, इसके लिए जीएसटी काउंसिल में केंद्र और सभी राज्यों के बीच आम सहमति बनना जरूरी है, जो राजस्व के नुकसान के डर से अभी तक नहीं हो पाया है।

प्रश्न 5: सरकार पेट्रोल में इथेनॉल क्यों मिला रही है और इससे आम जनता को क्या फायदा होगा?

उत्तर: सरकार कच्चे तेल के आयात पर अपनी निर्भरता और विदेशी मुद्रा खर्च को कम करने के लिए पेट्रोल में 20% तक इथेनॉल मिलाने (Ethanol Blending) को बढ़ावा दे रही है। इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने और अधिशेष अनाज से बनता है जो भारत में ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इससे न केवल पर्यावरण में प्रदूषण कम होता है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से ईंधन उत्पादन की लागत भी कम होती है, जिससे भविष्य में आम जनता को स्थिर और सस्ती कीमतों का लाभ मिल सकता है।

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