Strait of Hormuz US Iran Conflict: अमेरिकी सीनेट में ट्रंप को बड़ा झटका, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से 11,000 नाविकों को निकालने का यूएन का महा-अभियान

Published on: 24-06-2026
अमेरिकी सीनेट में ईरान युद्ध प्रस्ताव पर मतदान और हॉर्मुज स्ट्रेट में UN बचाव अभियान

Strait of Hormuz US Iran Conflict (हॉर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका-ईरान संघर्ष) ने आज एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है। एक तरफ जहां अमेरिकी सीनेट (US Senate) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के सैन्य अधिकारों को सीमित करने के लिए एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र (UN) की विशेष संस्था इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ने युद्ध प्रभावित हॉर्मुज जलडमरूमध्य में महीनों से फंसे 11,000 से अधिक असैनिक नाविकों (Civilian Seafarers) को सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने की घोषणा की है। स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता में इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच नए सिरे से भड़की हिंसा के कारण पैदा हुए तनाव के बीच यह वैश्विक संकट और गहरा गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पश्चिम एशिया (West Asia) की भू-राजनीति को हिलाकर रख दिया है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी इसके गहरे असर की आशंका जताई जा रही है।

अमेरिकी सीनेट का बड़ा कदम: ट्रंप प्रशासन के सैन्य अभियान पर लगी सांकेतिक रोक

अमेरिकी सीनेट में ईरान युद्ध शक्तियों पर बहस

वॉशिंगटन से आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिकी संसद के उच्च सदन यानी सीनेट ने मंगलवार को एक बेहद नाटकीय और ऐतिहासिक वोटिंग के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान चलाने के अधिकारों को सीमित करने वाला ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन‘ (War Powers Resolution) पारित कर दिया है। सीनेट में यह प्रस्ताव 50 के मुकाबले 48 वोटों से पास हुआ। यह अमेरिकी इतिहास में पहली बार है जब संसद के दोनों सदनों (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट) ने किसी मौजूदा राष्ट्रपति के चल रहे सैन्य अभियान को रोकने या उस पर अंकुश लगाने के लिए वॉर पावर्स एक्ट के तहत ऐसा प्रस्ताव पारित किया है।

इस ऐतिहासिक वोटिंग के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप की खुद की रिपब्लिकन पार्टी के चार वरिष्ठ सांसदों (सांसद सुसान कोलिन्स, लिसा मुरकोव्स्की, रैंड पॉल और बिल कैसिडी) ने पार्टी लाइन से अलग हटकर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रस्ताव का समर्थन किया। दूसरी तरफ, पेन्सिलवेनिया के डेमोक्रेटिक सांसद जॉन फेटरमैन एकमात्र ऐसे विपक्षी सांसद रहे जिन्होंने इस प्रस्ताव के विरोध में वोट डाला। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी के दो प्रमुख सांसदों (मिच मैककोनेल और डेव मैकॉर्मिक) की बीमारी और अन्य कारणों से सदन में अनुपस्थिति ने इस प्रस्ताव के पास होने का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया। यद्यपि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और इसके लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसे वैश्विक मंच पर राष्ट्रपति ट्रंप की ईरान नीति और उनके आक्रामक रुख के खिलाफ अमेरिकी संसद की एक बेहद मजबूत और सांकेतिक चेतावनी माना जा रहा है।

यह वोट इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?

विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक संसदीय वोट नहीं है बल्कि अमेरिकी विदेश नीति की दिशा पर भी असर डाल सकता है।

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद कई अमेरिकी सांसदों ने सवाल उठाया था कि क्या कांग्रेस को पर्याप्त जानकारी दी गई थी और क्या सैन्य कार्रवाई के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति मौजूद थी।

सीनेट के इस कदम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वाशिंगटन में अब केवल व्हाइट हाउस ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी ईरान से जुड़े फैसलों में अधिक सक्रिय भूमिका चाहती है।

स्विट्जरलैंड शांति वार्ता और ’60 दिनों की समय सीमा’ पर संकट के बादल

यह पूरा राजनीतिक विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) और उनकी टीम स्विट्जरलैंड में ईरान के साथ एक स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए लगातार बातचीत कर रही थी। पिछले हफ्ते ही अमेरिका और ईरान ने युद्ध को रोकने के लिए एक प्रारंभिक सहमति पत्र (MOU) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत दोनों देशों के बीच एक स्थायी और व्यापक शांति समझौते पर पहुंचने के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय की गई थी। इस समझौते के तहत ईरान के बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का एक बड़ा फंड बनाने का भी प्रस्ताव था, जिसका रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसद अंदरूनी तौर पर कड़ा विरोध कर रहे हैं।

इस बीच, लेबनान की सीमा पर इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह आंदोलन के बीच अचानक भड़की भीषण सैन्य झड़पों ने इस नाजुक शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि शांति वार्ता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं का ईमानदारी से पालन करें। इसके साथ ही, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई के बीच ईरान के उन परमाणु ठिकानों के निरीक्षण को लेकर भी जुबानी जंग तेज हो गई है, जिन पर हालिया संघर्ष के दौरान बमबारी की गई थी।

रिपोर्टों के अनुसार, लेबनान में बढ़ती हिंसा और सीमा पर हमलों ने दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया को प्रभावित किया। हालांकि किसी भी पक्ष ने औपचारिक रूप से शांति प्रक्रिया को समाप्त घोषित नहीं किया है।

अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वार्ता को पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है और भविष्य में बातचीत जारी रह सकती है। वहीं ईरानी पक्ष ने भी सुरक्षा परिस्थितियों का हवाला देते हुए कुछ बैठकों में भाग लेने से इनकार किया था।

संयुक्त राष्ट्र का ‘महा-अभियान’: हॉर्मुज से 11,000 नाविकों को निकालने की तैयारी

हॉर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाजों को सुरक्षित मार्ग दिखाते समुद्री अधिकारी

Strait of Hormuz US Iran Conflict के कारण पैदा हुए सबसे बड़े मानवीय संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संस्था (IMO) ने दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग में फंसे लगभग 600 व्यापारिक जहाजों और उन पर मौजूद 11,000 से अधिक निर्दोष नाविकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए एक विस्तृत और व्यापक रेस्क्यू प्लान तैयार किया है। आईएमओ के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज़ ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि इस विशाल रेस्क्यू ऑपरेशन को ओमान, ईरान, संयुक्त राज्य अमेरिका, क्षेत्र के अन्य तटीय देशों और वैश्विक समुद्री उद्योग के साथ मिलकर बेहद सावधानी से चलाया जाएगा।

महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज़ ने बताया कि पिछले महीनों में चले भीषण सैन्य टकराव के दौरान इस क्षेत्र में कम से कम 14 निर्दोष असैनिक नाविकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इस रेस्क्यू ऑपरेशन के तहत ओमान सरकार के सहयोग से हॉर्मुज जलडमरूमध्य के भीतर दो अस्थायी और सुरक्षित समुद्री मार्ग (Temporary Routes) बनाए गए हैं। सभी फंसे हुए जहाजों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर उन्हें सुरक्षित रूट से बाहर निकालने के निर्देश दिए जा रहे हैं। हालांकि, आईएमओ प्रमुख ने अमेरिका और ईरान के बीच पिछले हफ्ते हुए युद्धविराम समझौते का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि यह कदम समुद्री सुरक्षा को बहाल करने में मील का पत्थर साबित होगा।

जलमार्ग पर टैक्स (Toll) का विवाद और समुद्री बारूदी सुरंगों का खतरा

हॉर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलने और जहाजों की सुरक्षित निकासी के बीच एक नया राजनयिक विवाद खड़ा हो गया है। ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों और कार्गो जहाजों पर एक विशेष शुल्क या टैक्स (Toll) लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि हॉर्मुज एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग (International Waterway) है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक दुनिया का कोई भी देश इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का टैक्स या टोल वसूल नहीं कर सकता है। अमेरिका इस तरह के किसी भी प्रयास का पूरी तरह विरोध करेगा।

इसके अलावा, समुद्री विशेषज्ञों और कैप्टन कीस बकेन्स जैसी वैश्विक हस्तियों ने चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा गारंटी मिलने के बाद भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है। संघर्ष के दौरान जलडमरूमध्य में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगें (Sea Mines) अभी भी असैनिक जहाजों के लिए एक बहुत बड़ा सुरक्षा जोखिम बनी हुई हैं। हालांकि, ओमान द्वारा दिए गए विशेष सुरक्षा आश्वासनों के बाद कुछ बड़े कच्चे तेल के जहाजों ने सावधानीपूर्वक इस मार्ग का रुख करना शुरू कर दिया है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को दोबारा शुरू किया जा सके।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल संकट: क्यों महत्वपूर्ण है हॉर्मुज का यह मार्ग?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दुनिया की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण ‘आर्थिक लाइफलाइन’ माना जाता है। वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल कच्चे तेल (Crude Oil) के परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा (20% से अधिक) इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस साल 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव की शुरुआत होने के बाद ईरानी सेना ने इस जलमार्ग को प्रभावी रूप से ब्लॉक कर दिया था। इस नाकेबंदी के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और वैश्विक बाजार में प्रति बैरल तेल की कीमत 114 डॉलर के पार पहुंच गई थी।

तेल की कीमतों में आई इस अभूतपूर्व तेजी के कारण भारत जैसे विकासशील देशों को बड़े पैमाने पर आर्थिक दिक्कतों और घरेलू महंगाई का सामना करना पड़ा है। इसके साथ ही, इस जलमार्ग के बंद होने से खेती के लिए बेहद जरूरी उर्वरकों (Fertilizers) और अन्य आवश्यक वस्तुओं की वैश्विक चेन पूरी तरह ठप हो गई थी। अब जबकि संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों से इस मार्ग से जहाजों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई है, तो केवल सोमवार को ही रिकॉर्ड 36 कमोडिटी जहाजों को इस मार्ग से सुरक्षित निकाला गया है, जो युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है।

प्रमुख वैश्विक नेताओं और नीति निर्माताओं के आधिकारिक बयान

“समय-समय पर सीनेट के अधिकांश रिपब्लिकन सांसदों ने अमेरिकी जनता के हितों के बजाय राष्ट्रपति ट्रंप और उनके युद्ध का साथ दिया। देश के नागरिकों को ईरान में ट्रंप की इस ऐतिहासिक भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इसे इतिहास की किताबों में अमेरिका के अब तक के सबसे खराब विदेश नीति संबंधी कदमों में से एक के रूप में दर्ज किया जाएगा।” — चक शूमर, अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता

“यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर किसी भी प्रकार का टैक्स, टोल या मनमाना शुल्क नहीं लगा सकता है। अमेरिका इस क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।” — मार्को रुबियो, अमेरिकी विदेश मंत्री

“महीनों तक हजारों निर्दोष नाविकों द्वारा झेली गई पीड़ा और इसके गंभीर वैश्विक आर्थिक प्रभावों के बाद, मैं संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते का पूरे दिल से स्वागत करता हूं। यह समुद्री सुरक्षा को बहाल करने और नागरिक जहाजों पर होने वाले अस्वीकार्य हमलों को समाप्त करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और ठोस कदम है।” — आर्सेनियो डोमिंगुएज़, महासचिव, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (UN)

भारत पर इस वैश्विक संकट का सीधा असर: एक विश्लेषण

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत के पश्चिमी बंदरगाहों तक पहुंचता है। Strait of Hormuz US Iran Conflict के कारण जब तेल की कीमतें 114 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं, तो भारत के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और चालू खाता घाटे (CAD) पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके अलावा, भारत को अपने कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी खादों और उर्वरकों के आयात में भी भारी देरी का सामना करना पड़ा, जिससे देश के ग्रामीण इलाकों में कृषि लागत बढ़ गई।

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) लगातार इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। हॉर्मुज में फंसे 11,000 नाविकों में सैकड़ों की संख्या में भारतीय क्रू मेंबर्स और मर्चेंट नेवी के अधिकारी भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र और ओमान के नेतृत्व में शुरू हो रहे इस महा-रेस्क्यू ऑपरेशन से न केवल उन भारतीय परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी जिनके परिजन वहां फंसे हुए हैं, बल्कि भारतीय तेल कंपनियों को भी आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट और स्थिरता आने की उम्मीद है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) कहां स्थित है और यह वैश्विक व्यापार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक बेहद संकरा और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग है। इसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान व संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित हैं। यह दुनिया का सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20-21% हिस्सा गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर पूरी दुनिया (विशेषकर भारत, चीन, जापान और यूरोप) तक पहुंचता है। इसलिए, यहां होने वाले किसी भी संघर्ष का सीधा असर दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और शेयर बाजारों पर पड़ता है।

प्रश्न 2: अमेरिकी सीनेट द्वारा पारित ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ क्या है और इसका राष्ट्रपति ट्रंप पर क्या असर होगा?

उत्तर: अमेरिकी संविधान के अनुसार, आधिकारिक तौर पर युद्ध की घोषणा करने का अधिकार केवल अमेरिकी संसद (Congress) के पास है। लेकिन पिछले 75 वर्षों में कई राष्ट्रपतियों ने इस शक्ति का उपयोग संसद की अनुमति के बिना सैन्य अभियान चलाने में किया है। 1973 के ‘वॉर पावर्स एक्ट’ के तहत संसद को यह अधिकार है कि वह राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों पर अंकुश लगा सके। हाल ही में सीनेट में पास हुआ 50-48 का प्रस्ताव इसी कानून के तहत लाया गया है, जो राष्ट्रपति ट्रंप को बिना संसद की मंजूरी के ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध या लंबी सैन्य कार्रवाई जारी रखने से रोकता है। हालांकि यह प्रस्ताव मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है और इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत नहीं होती, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति को अब अपनी सैन्य नीतियों के लिए संसद से भारी बजट (जैसे कि पेंटागन द्वारा मांगी गई 80 अरब डॉलर की आपातकालीन राशि) पास कराने में गंभीर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा।

प्रश्न 3: संयुक्त राष्ट्र (UN) के रेस्क्यू ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य क्या है और इसमें क्या चुनौतियां हैं?

उत्तर: संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) द्वारा शुरू किए गए रेस्क्यू ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य हॉर्मुज जलमार्ग में पिछले कई महीनों से फंसे लगभग 600 नागरिक व्यापारिक जहाजों और उन पर सवार 11,000 से अधिक नाविकों को सुरक्षित बाहर निकालना है। इस अभियान में सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्र में संघर्ष के दौरान बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगें (Sea Mines) हैं, जो किसी भी बड़े जहाज को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके अलावा, ईरान द्वारा इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाने की जिद और अमेरिका व उसके सहयोगियों द्वारा इसका कड़ा विरोध किए जाने के कारण पैदा हुआ राजनयिक गतिरोध भी इस रेस्क्यू ऑपरेशन के सुरक्षित संचालन में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।

प्रश्न 4: स्विट्जरलैंड शांति वार्ता अचानक क्यों प्रभावित हुई और इसका इजरायल-लेबनान से क्या संबंध है?

उत्तर: अमेरिका (उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में) और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में एक गोपनीय और उच्च स्तरीय शांति वार्ता चल रही थी, जिसके तहत दोनों देश एक स्थायी युद्धविराम समझौते (MOU) पर सहमत हो गए थे। लेकिन इसी दौरान दक्षिणी लेबनान की सीमा पर इजरायल और ईरान समर्थित उग्रवादी संगठन हिजबुल्लाह के बीच अचानक भारी गोलाबारी और सैन्य संघर्ष शुरू हो गया। चूंकि ईरान हिजबुल्लाह का मुख्य राजनीतिक और सैन्य समर्थक है, इसलिए इस क्षेत्रीय हिंसा का सीधा असर अमेरिका-ईरान वार्ता पर पड़ा। इसके कारण दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई एक बार फिर गहरी हो गई और नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी शांति प्रक्रिया पर संकट के बादल मंडराने लगे।

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