नई दिल्ली/पोर्ट ब्लेयर – विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day 2026) के मौके पर भारतीय राजनीति में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को लेकर एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। Rahul Gandhi Great Nicobar Project Petition अभियान की आधिकारिक शुरुआत करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की करीब ₹72,000 से ₹92,000 करोड़ की लागत वाली ‘ग्रेट निकोबार मेगा-प्रोजेक्ट’ (Great Nicobar Island Project) को सीधे तौर पर “पारिस्थितिक विनाश” (Ecological Disaster) करार दिया है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) और अपने यूट्यूब चैनल पर एक विस्तृत 16 मिनट का वीडियो जारी किया है, जिसमें वे खुद निकोबार के समुद्र में गहरे पानी के अंदर जाकर कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) का मुआयना करते और स्थानीय निवासियों से बात करते नजर आ रहे हैं। इस अभियान के जरिए उन्होंने देश के युवाओं से अपील की है कि वे इस मेगा प्रोजेक्ट को रोकने के लिए उनकी ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर करें और ‘Greed’ (लालच) के ऊपर ‘Green’ (पर्यावरण) को प्राथमिकता दें।

ग्रेट निकोबार परियोजना एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना के खिलाफ एक सार्वजनिक याचिका अभियान शुरू किया और आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एक ऐसी परियोजना को आगे बढ़ा रही है जो द्वीप की पारिस्थितिकी, समुद्री जैव विविधता और स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। दूसरी ओर केंद्र सरकार और परियोजना समर्थकों का कहना है कि यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक क्षमता और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
यह विवाद केवल एक विकास परियोजना तक सीमित नहीं है। यह भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस का नया अध्याय बन चुका है।
ग्रेट निकोबार परियोजना क्या है?

ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।
सरकार की योजना के अनुसार यहां एक विशाल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक नया टाउनशिप क्षेत्र और ऊर्जा अवसंरचना विकसित की जानी है। परियोजना का अनुमानित आकार लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। विभिन्न सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों में इसकी लागत लगभग ₹80,000 करोड़ से ₹92,000 करोड़ के बीच बताई गई है।
सरकार का तर्क है कि यह परियोजना भारत को क्षेत्रीय समुद्री व्यापार में बड़ी भूमिका दिला सकती है और विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम कर सकती है।
राहुल गांधी का गंभीर आरोप: “रक्षा तो सिर्फ एक बहाना है, असली मकसद कॉर्पोरेट फायदा”

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। राहुल गांधी ने वीडियो में बेहद तीखे शब्दों में कहा:
“मोदी सरकार और भाजपा देश से झूठ बोल रही है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश की रक्षा और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। असलियत यह नहीं है। रक्षा विभाग का नाम सिर्फ एक मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके पीछे का असली सच यह है कि लगभग 1.5 करोड़ पेड़ काटे जाएंगे, प्राचीन कोरल रीफ को सरकारी नक्शों से मिटा दिया जाएगा और वहां के मूल आदिवासियों तथा पूर्व सैनिकों (सैटलर्स) को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाएगा, ताकि प्रधानमंत्री के पसंदीदा एक बड़े उद्योगपति वहां होटल, रिसॉर्ट्स और कसीनो (Casinos) का निर्माण कर रियल एस्टेट का धंधा चमका सकें।”
राहुल गांधी ने अपनी इस यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वे भारत के सबसे दक्षिणी छोर इंदिरा पॉइंट (Indira Point) पर गए थे, जहां सदियों पुराने वर्षावन (Rainforests) मौजूद हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन जंगलों के एक-एक पेड़ की कीमत बाजार में करीब ₹3 लाख है और सरकार इन बहुमूल्य लकड़ियों को चोरी-छिपे बाहर भेजकर अरबों रुपये कमाना चाहती है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर राहुल गांधी का अभियान
5 जून 2026 को राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार में स्कूबा डाइविंग का एक वीडियो जारी किया। वीडियो में उन्होंने द्वीप की प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs), समुद्री जीवन और प्राकृतिक सुंदरता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रस्तावित परियोजना से इस क्षेत्र को गंभीर नुकसान हो सकता है। उन्होंने लोगों से परियोजना के खिलाफ याचिका का समर्थन करने की अपील भी की।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह परियोजना पर्यावरणीय दृष्टि से विनाशकारी हो सकती है और स्थानीय समुदायों के हितों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि परियोजना के कारण बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई हो सकती है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस अभियान का समर्थन किया और लोगों से “Green Over Greed” अभियान से जुड़ने की अपील की।
परियोजना में क्या-क्या शामिल है?
परियोजना के आधिकारिक दस्तावेजों और NGT के रिकॉर्ड के अनुसार इसमें निम्न प्रमुख घटक शामिल हैं:
- अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल
- ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
- टाउनशिप विकास
- गैस और सौर ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र
- सड़क और सहायक अवसंरचना
परियोजना का उद्देश्य निकोबार को एक बड़े समुद्री और लॉजिस्टिक हब के रूप में विकसित करना है।
INS Baaz के विस्तार पर विपक्ष का पूरा समर्थन, फिर विवाद क्यों?
राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी देश की संप्रभुता और सैन्य सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहती। उन्होंने रक्षा नीति पर सरकार को घेरते हुए एक बड़ा विकल्प सामने रखा।
राहुल गांधी ने कहा:
“अगर सरकार का तर्क सिर्फ सैन्य सुरक्षा का है, तो नौसेना का एयर स्टेशन ‘आईएनएस बाज’ (INS Baaz) वहां पहले से ही मौजूद है। नौसेना पिछले पांच साल से इसके विस्तार की मांग कर रही है, लेकिन सरकार ने उसे नजरअंदाज कर दिया। हम सरकार से कहते हैं कि आप आईएनएस बाज को जितना चाहें उतना बड़ा बनाएं, उसे आधुनिक हथियारों से लैस करें, कांग्रेस इसमें 100% सरकार के साथ खड़ी है। आईएनएस बाज के विस्तार के लिए किसी भी वर्षावन को काटने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पास पहले से ही काफी खाली जमीन उपलब्ध है।”
विपक्ष के नेता ने सरकार द्वारा प्रस्तावित इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) पर भी सवाल उठाए और कहा कि जब भारत के मुख्य भूभाग पर केरल में पहले से ही विझिंजम बंदरगाह बनकर तैयार हो रहा है, तो निकोबार के प्राचीन पर्यावरण को नष्ट करके दूसरा बड़ा पोर्ट बनाने का कोई तार्किक आधार नहीं है।
प्रियंका गांधी और जयराम रमेश ने संभाला मोर्चा, प्रोजेक्ट को बताया ‘इकोलॉजिकल टाइम बम’
Rahul Gandhi Great Nicobar Project Petition को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का पूरा समर्थन मिला है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी राहुल गांधी के इस पिटीशन सर्टिफिकेट को साझा करते हुए देश की जनता से इससे जुड़ने का आह्वान किया। प्रियंका गांधी ने कहा कि निकोबार के जंगलों का विनाश हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार में धकेल देगा, और इसकी कीमत देश को चुकानी पड़ेगी।
वहीं, पूर्व पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर प्रशासनिक धोखाधड़ी का आरोप लगाया। जयराम रमेश ने X पर लिखा:
“ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पूरी तरह से एक पारिस्थितिक आपदा (Ecological Disaster) है। इसके लिए पर्यावरण और वन मंजूरी बहुत ही फर्जी और बोगस आधार पर दी गई है। अब इस विनाश को छिपाने के लिए काल्पनिक रणनीतिक और सैन्य कारणों का आविष्कार किया जा रहा है, जबकि देश की रक्षा के लिए हमारे पास दूसरे बेहतर और सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं।”
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकार को घेरा और दावा किया कि पिछले 11 वर्षों में देश के भीतर लगभग 1.92 लाख हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी कार्यों के लिए डायवर्ट किया गया है और 1.6 करोड़ से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक महत्व
सरकार और परियोजना समर्थकों का कहना है कि ग्रेट निकोबार का महत्व केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है।
यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी समुद्री उपस्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
NGT ने भी अपने फरवरी 2026 के आदेश में परियोजना के “रणनीतिक महत्व” का उल्लेख किया था और कहा था कि पर्यावरणीय चिंताओं के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों को भी ध्यान में रखना होगा।
पर्यावरणीय चिंताएं क्या हैं?
परियोजना के आलोचकों का कहना है कि ग्रेट निकोबार भारत के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक है।
यह क्षेत्र:
- घने उष्णकटिबंधीय वर्षावनों का घर है
- दुर्लभ वन्यजीवों का आवास है
- प्रवाल भित्तियों से घिरा हुआ है
- लेदरबैक समुद्री कछुओं के महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में शामिल है
कई पर्यावरणविदों और नागरिक संगठनों ने आशंका व्यक्त की है कि बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों से इन पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान हो सकता है।
आदिवासी समुदायों का मुद्दा
ग्रेट निकोबार द्वीप में विशेष रूप से संरक्षित आदिवासी समुदाय रहते हैं, जिनमें शोम्पेन और निकोबारी समुदाय प्रमुख हैं।
परियोजना के आलोचकों ने कहा है कि इन समुदायों के अधिकारों और पारंपरिक जीवन शैली पर प्रभाव का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया। कुछ याचिकाओं में यह मुद्दा भी उठाया गया कि वन अधिकारों और स्थानीय परामर्श की प्रक्रिया को लेकर सवाल हैं।
हालांकि सरकारी पक्ष का कहना है कि परियोजना में आदिवासी हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान किए गए हैं।
सरकारी पक्ष: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की हरी झंडी और पर्यावरण संतुलन का दावा
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार, नीति आयोग और अंडमान-निकोबार प्रशासन ने विपक्ष के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारत को वैश्विक व्यापार के नक्शे पर एक नई ऊंचाई देगा क्योंकि ग्रेट निकोबार द्वीप अंतरराष्ट्रीय पूर्व-पश्चिम समुद्री व्यापार मार्ग (East-West Shipping Route) से महज 40 समुद्री मील की दूरी पर है।
सरकारी अधिकारियों ने निम्नलिखित मुख्य बिंदु सामने रखे हैं:
- पेड़ों की संख्या का सच: सरकार का दावा है कि विपक्ष द्वारा बताया गया 1.5 करोड़ पेड़ों का आंकड़ा पूरी तरह भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। वास्तविक रूप से बहुत कम पेड़ों पर इसका असर पड़ेगा और उसकी भरपाई के लिए देश के मुख्य भूभाग (जैसे मध्य प्रदेश या अन्य राज्यों में) बड़े पैमाने पर ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) किया जा रहा है।
- कोरल रीफ का ट्रांसलोकेशन: कोरल (मूंगा चट्टानों) के नष्ट होने के दावे पर पर्यावरण मंत्रालय के विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक के जरिए कोरल को सुरक्षित रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित (Translocation) किया जाएगा, जिससे समुद्री जैव विविधता को कोई नुकसान नहीं होगा।
- शोमपेन और निकोबारी आदिवासियों का संरक्षण: सरकार ने आश्वस्त किया है कि इस 166 वर्ग किलोमीटर के प्रोजेक्ट क्षेत्र के कारण वहां की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) जैसे शोमपेन और निकोबारी लोगों का कोई विस्थापन नहीं किया जा रहा है और उनके अधिकारों व उनकी बस्तियों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
- न्यायिक मंजूरी: अधिकारियों ने याद दिलाया कि फरवरी 2026 में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को दी गई पर्यावरण और तटीय नियामक क्षेत्र (CRZ) मंजूरियों की समीक्षा करने के बाद इसे कानूनी और सही पाते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दी थी।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने पहले भी कहा है कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए कई सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं।
इनमें शामिल हैं:
- प्रवाल भित्तियों के संरक्षण और स्थानांतरण की योजना
- तटीय क्षेत्रों की निगरानी
- वन्यजीव संरक्षण उपाय
- पर्यावरणीय शर्तों का पालन
सरकार का कहना है कि परियोजना विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।
कांग्रेस और सरकार के बीच राजनीतिक टकराव
ग्रेट निकोबार परियोजना अब राजनीतिक मुद्दा भी बन चुकी है।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार पर्यावरणीय चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही। वहीं भाजपा ने कांग्रेस पर विकास परियोजनाओं का विरोध करने का आरोप लगाया है और NGT के फैसले को परियोजना की वैधता का समर्थन बताया है।
विकास बनाम पर्यावरण की बहस
ग्रेट निकोबार परियोजना उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें यह प्रश्न उठता है कि भारत जैसे विकासशील देश को बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए।
एक पक्ष का मानना है कि रणनीतिक और आर्थिक विकास के लिए ऐसे निवेश आवश्यक हैं।
दूसरा पक्ष कहता है कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी को होने वाला नुकसान अपूरणीय हो सकता है।
ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। एक ओर केंद्र सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण मानती है। दूसरी ओर राहुल गांधी, कांग्रेस और कई पर्यावरण समूह इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीर प्रश्न उठा रहे हैं।
फिलहाल कानूनी स्तर पर NGT परियोजना को मंजूरी दे चुका है, लेकिन सार्वजनिक और राजनीतिक बहस जारी है। आने वाले वर्षों में परियोजना का वास्तविक प्रभाव और पर्यावरणीय शर्तों का पालन इस बहस की दिशा तय करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Detailed FAQs)
प्रश्न 1: Rahul Gandhi Great Nicobar Project Petition क्या है और विपक्ष इसका विरोध क्यों कर रहा है?
उत्तर: यह लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा शुरू किया गया एक ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान है, जिसे 5 जून 2026 (विश्व पर्यावरण दिवस) को लॉन्च किया गया है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार की ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार मेगा-परियोजना से भारत के सबसे प्राचीन वर्षावनों के करीब 1.5 करोड़ पेड़ काट दिए जाएंगे, समुद्र के नीचे की दुर्लभ मूंगा चट्टानें नष्ट हो जाएंगी और वहां के आदिवासियों व पूर्व सैनिकों को बेघर होना पड़ेगा। राहुल गांधी का दावा है कि विकास और रक्षा के नाम पर यह सब केवल एक बड़े उद्योगपति को कसीनो और रियल एस्टेट का धंधा शुरू करवाने के लिए किया जा रहा है।
प्रश्न 2: सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘ग्रेट निकोबार मेगा-प्रोजेक्ट’ असल में क्या है?
उत्तर: यह केंद्र सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी ढांचागत और रणनीतिक परियोजना है, जो कुल 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी। इसके तहत चार प्रमुख चीजें बनाई जानी हैं:
- एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT बंदरगाह)।
- एक आधुनिक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट।
- एक 450 MVA का गैस और सौर ऊर्जा आधारित हाइब्रिड पावर प्लांट।
- पर्यटकों के लिए एक विशाल और आधुनिक टाउनशिप (पर्यटन हब)।सरकार का मानना है कि यह प्रोजेक्ट हिंद महासागर में भारत की व्यापारिक और रक्षात्मक स्थिति को बहुत मजबूत कर देगा।
प्रश्न 3: राहुल गांधी ने रक्षा (Defence) और आईएनएस बाज (INS Baaz) को लेकर क्या विकल्प सुझाया है?
त्तर: राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का कहना है कि वे देश की सुरक्षा के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने सरकार को विकल्प दिया है कि निकोबार द्वीप समूह में भारतीय नौसेना का जो ‘आईएनएस बाज’ एयर स्टेशन स्थित है, उसका जितना चाहे विस्तार किया जाए। चूंकि आईएनएस बाज के आसपास पहले से ही काफी खाली जमीन मौजूद है, इसलिए सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए लाखों हेक्टेयर घने वर्षावनों को काटने की कोई जरूरत नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार सेना के पीछे छिपकर कॉर्पोरेट मित्रों को फायदा पहुंचाना चाहती है।
प्रश्न 4: पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर सरकार और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का क्या स्टैंड है?
उत्तर: सरकार और पर्यावरण मंत्रालय के विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट को पर्यावरण नियमों को ध्यान में रखकर ही तैयार किया गया है। फरवरी 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी इस प्रोजेक्ट की सभी पर्यावरण और वन मंजूरियों को वैध माना था। सरकार के अनुसार, जितने पेड़ काटे जाएंगे, उनके बदले दूसरे राज्यों में नए जंगल लगाए जा रहे हैं (प्रतिपूरक वनीकरण) और कोरल रीफ को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से समुद्र के दूसरे हिस्से में ट्रांसलोकेट किया जाएगा। साथ ही आदिवासियों के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होगा।
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