नई दिल्ली – India-Iran ऊर्जा संकट 2026 का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों के दैनिक खर्च तक साफ दिखाई देने लगा है। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध हालात के कारण वैश्विक कच्चे तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से एशियाई देशों की चिंता बढ़ गई है। भारत, जो अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस से पूरा करता है, इस संकट को लेकर लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters की हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारत समेत कई देश ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार सुरक्षा को लेकर आपात रणनीति पर काम कर रहे हैं। भारत सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां और वित्तीय संस्थान लगातार समीक्षा बैठकों में जुटे हैं ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके।
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान युद्ध के सीधे असर के कारण भारत-ईरान ऊर्जा संकट 2026 गहराता जा रहा है। इस संकट ने न केवल वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में आग लगाई है, बल्कि भारत के घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और आवश्यक उर्वरकों (फर्टिलाइजर्स) की आपूर्ति को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता के कारण भारत समेत कई एशियाई अर्थव्यवस्थाएं लगातार ऊर्जा कीमतों पर नजर बनाए हुए हैं, जबकि दुनिया के करीब 27 विकासशील देश इस आर्थिक झटके से बचने के लिए वैश्विक संस्थाओं से आपातकालीन वित्तीय सहायता के विकल्प तलाश रहे हैं।
मध्य-पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी सैन्य टकराव के कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह से चरमरा गई है। रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), पर खतरा बढ़ने से जहाजों का आवागमन प्रभावित हुआ है। इसके सीधे असर से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर को छू रही हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसके कारण वैश्विक कीमतों में होने वाली मामूली बढ़ोतरी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के बजटीय संतुलन को बिगाड़ देती है। भारतीय तेल कंपनियों को अब कच्चे तेल के आयात के लिए प्रति बैरल अधिक डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी दबाव में आ गया है।
मई 2026 के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध और समुद्री मार्गों पर खतरे के कारण कुछ समय के लिए तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। बाद में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता की खबरों से थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन बाजार अब भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है।
भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ा भी बदलाव सीधे घरेलू बाजार को प्रभावित करता है।
तेल विपणन कंपनियों ने मई महीने में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी की है। Reuters और अन्य विश्वसनीय रिपोर्टों के मुताबिक नई दिल्ली सहित कई शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में प्रति लीटर लगभग एक रुपये तक की वृद्धि हुई है। सरकारी कंपनियों का कहना है कि ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है।
घरेलू बाजार पर असर: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी

वैश्विक संकट का सीधा असर भारत के आम नागरिकों की जेब पर पड़ना शुरू हो गया है। देश के प्रमुख महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तेल विपणन कंपनियों ने आज पेट्रोल की कीमतों में औसतन 87 पैसे और डीजल में 91 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया है। पिछले 10 दिनों के भीतर यह तीसरी बड़ी बढ़ोतरी है। ईंधन के दाम बढ़ने से माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स कॉस्ट) महंगी हो गई है, जिससे आने वाले दिनों में फल, सब्जियां और रोजमर्रा के जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ने की पूरी आशंका जताई जा रही है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता दबाव
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की नीति पर काम कर रही है। रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अफ्रीकी देशों से तेल खरीद बढ़ाने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद मध्य-पूर्व की स्थिरता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हालिया तनाव के दौरान कई जहाजों की जांच, देरी और मार्ग परिवर्तन की खबरें सामने आई हैं। Reuters की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जिससे परिवहन लागत बढ़ी है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो भारत के लिए तेल आयात बिल और अधिक बढ़ सकता है। इससे चालू खाते का घाटा, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि सरकार की ओर से फिलहाल स्थिति को नियंत्रित और निगरानी में बताया जा रहा है।
गैस और उर्वरक (फर्टिलाइजर) आपूर्ति पर मंडराता खतरा
भारत केवल कच्चे तेल के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र के लिए सबसे जरूरी यूरिया और अन्य उर्वरकों के कच्चे माल के लिए भी काफी हद तक मध्य-पूर्वी देशों पर निर्भर है। ईरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में जारी युद्ध की स्थिति के कारण उर्वरकों की खेप भारत पहुंचने में देरी हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह आपूर्ति बाधा लंबे समय तक खिंचती है, तो देश में खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। सरकार स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वैकल्पिक देशों जैसे रूस और अफ्रीकी देशों से उर्वरक आयात करने की संभावनाओं पर विचार कर रही है ताकि घरेलू किसानों को किसी भी तरह की किल्लत का सामना न करना पड़े।
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरक उत्पादन में प्राकृतिक गैस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि गैस महंगी होती है तो उर्वरक उत्पादन लागत भी बढ़ती है। इससे कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है। भारत सरकार फिलहाल सब्सिडी और आपूर्ति प्रबंधन के जरिए कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है।
कृषि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऊर्जा संकट लंबे समय तक जारी रहा तो खेती की लागत भी बढ़ सकती है। डीजल, सिंचाई और परिवहन महंगा होने से किसानों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
चाबहार पोर्ट और रणनीतिक व्यापारिक रूट का भविष्य

भारत के लिए ईरान केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं है, बल्कि वह मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंचने का एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक रास्ता भी है। भारत द्वारा विकसित किया जा रहा ईरान का चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) इस समय भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के घेरे में आ गया है। इस रूट के जरिए होने वाला व्यापारिक लेन-देन पूरी तरह से धीमा पड़ गया है। बीमा कंपनियों ने इस क्षेत्र से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों का प्रीमियम अत्यधिक बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय निर्यातकों की लागत दोगुनी हो गई है। चाय, बासमती चावल, दवाइयां और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात पर इसका सबसे बुरा असर देखा जा रहा है।
भारतीय रुपये और शेयर बाजार पर असर
मध्य-पूर्व तनाव का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी देखा गया है। तेल कीमतों में बढ़ोतरी के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है। Reuters की रिपोर्टों के अनुसार हाल के हफ्तों में विदेशी निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया है।
विश्लेषकों का कहना है कि ऊंचे तेल आयात बिल से भारत का विदेशी मुद्रा खर्च बढ़ता है। इससे रुपये की विनिमय दर प्रभावित हो सकती है। यदि तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो महंगाई दर में बढ़ोतरी की आशंका रहती है।
शेयर बाजार में भी तेल, एविएशन, केमिकल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। वहीं घरेलू ऊर्जा कंपनियों और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।
वैश्विक प्रतिक्रिया और आर्थिक सहायता की तलाश

अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, विश्व बैंक के आंतरिक दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि दुनिया के करीब 27 देश इस समय मध्य-पूर्व संकट से उत्पन्न हुए आर्थिक झटके से निपटने के लिए आपातकालीन फंड (Crisis Funding) की मांग कर रहे हैं। युद्ध के कारण टूटी सप्लाई चेन और आसमान छूती ऊर्जा दरों ने कई कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को दिवालियापन की कगार पर खड़ा कर दिया है।
इस बीच, कूटनीतिक स्तर पर भी शांति बहाली के प्रयास तेज हो गए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत का दौरा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है, जिसमें मध्य-पूर्व संकट और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर गहन चर्चा हुई है। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल आसिम मुनीर भी तेहरान पहुंचे हैं ताकि संकट को और अधिक बढ़ने से रोका जा सके।
विशेषज्ञों का मत: “मौजूदा भू-राजनीतिक संकट केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ी परीक्षा है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक तेल भंडारों (Strategic Petroleum Reserves) का समझदारी से उपयोग करना होगा और अन्य देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों पर तेजी से काम करना होगा।”
भारत सरकार की तैयारी और रणनीति
केंद्र सरकार लगातार ऊर्जा आपूर्ति और बाजार हालात की समीक्षा कर रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और सार्वजनिक तेल कंपनियों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि देश में फिलहाल पर्याप्त तेल भंडार मौजूद है और आपूर्ति बाधित नहीं हुई है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। सरकार का उद्देश्य यह है कि किसी वैश्विक संकट की स्थिति में कुछ समय तक घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सके।
ऊर्जा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार भारत वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और अतिरिक्त आयात स्रोतों पर भी काम कर रहा है। अमेरिका और अन्य देशों से ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की चर्चा भी तेज हुई है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है।
रूस और अमेरिका की भूमिका
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा था। अब ईरान संकट के बीच भारत फिर से ऊर्जा स्रोतों के संतुलन पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचना चाहता है।
अमेरिका भी भारत को ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालिया कूटनीतिक बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा प्रमुख मुद्दों में शामिल रही। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी LNG और कच्चे तेल की खरीद बढ़ाए।
हालांकि ऊर्जा बाजार में कीमत, परिवहन लागत और दीर्घकालिक अनुबंध जैसी कई व्यावहारिक चुनौतियां भी मौजूद हैं। भारत फिलहाल संतुलित रणनीति के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।
व्यापार और शिपिंग क्षेत्र की चिंता
मध्य-पूर्व संकट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री शिपिंग भी प्रभावित हो रही है। कई जहाज कंपनियों ने बीमा प्रीमियम बढ़ा दिए हैं। कुछ शिपिंग रूट्स पर अतिरिक्त सुरक्षा शुल्क लगाया गया है।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का बड़ा आयात और निर्यात समुद्री मार्गों पर निर्भर करता है। यदि शिपिंग लागत बढ़ती है तो इसका असर घरेलू उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
Reuters की एक रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ जहाजों को होर्मुज क्षेत्र में विशेष जांच और सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। इससे समय और लागत दोनों बढ़े हैं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है
ऊर्जा संकट का सबसे बड़ा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगा होने से परिवहन खर्च बढ़ता है। इसका असर खाद्य वस्तुओं, रोजमर्रा के सामान और लॉजिस्टिक्स लागत पर दिखाई देता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो महंगाई दर में बढ़ोतरी संभव है। हालांकि सरकार फिलहाल कीमतों को नियंत्रित रखने और आपूर्ति सामान्य बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत की स्थिति कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर मानी जा रही है क्योंकि देश ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता और रणनीतिक भंडारण पर काम किया है। लेकिन लंबे संकट की स्थिति में चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
वैश्विक बाजारों में चिंता
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA ने भी हालिया रिपोर्ट में वैश्विक आपूर्ति दबाव को लेकर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि यदि युद्ध और समुद्री बाधाएं जारी रहती हैं तो वैश्विक तेल आपूर्ति मांग से नीचे जा सकती है।
विश्व बैंक और कई वित्तीय संस्थानों ने भी ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के असर को लेकर चेतावनी दी है। विकासशील देशों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ऊर्जा आयात बिल बढ़ने से आर्थिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
एशियाई देशों में भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातक देशों की विशेष चिंता बनी हुई है। यही कारण है कि कई देश वैकल्पिक ऊर्जा समझौतों और आपूर्ति सुरक्षा पर काम कर रहे हैं।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सामने फिलहाल दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखना और दूसरी चुनौती लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू ऊर्जा उत्पादन पर अधिक जोर देने का अवसर भी बन सकता है। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की चर्चा फिर तेज हो गई है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि निकट भविष्य में भारत पूरी तरह आयातित तेल पर निर्भरता खत्म नहीं कर सकता। इसलिए वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिरता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
सरकार का आधिकारिक रुख
भारत सरकार ने अब तक किसी प्रकार की घबराहट से बचने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि देश में तेल और गैस की पर्याप्त उपलब्धता है और आवश्यक आपूर्ति जारी रहेगी। सरकार लगातार अंतरराष्ट्रीय हालात पर नजर बनाए हुए है।
पेट्रोलियम मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों ने संकेत दिया है कि बाजार स्थिरता बनाए रखने के लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि फिलहाल किसी बड़े आपात कदम की घोषणा नहीं की गई है।
भारत के लिए आगे की राह
भारत-ईरान ऊर्जा संकट 2026 ने देश को एक बार फिर अपनी ऊर्जा नीतियों की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि भारत सरकार स्थिति को संभालने के लिए लगातार कूटनीतिक और आर्थिक प्रयास कर रही है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला यह तनाव भारतीय रुपये और विकास दर (GDP Growth) दोनों को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को न केवल अपने आयात के स्रोतों में विविधता लानी होगी, बल्कि अक्षय ऊर्जा (रिनेवेबल एनर्जी) और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को अपनाने की गति को भी और तेज करना होगा ताकि भविष्य में ऐसे वैश्विक झटकों से घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण बात अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति होगी। यदि तनाव कम होता है तो तेल कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक बाजार में फिर उथल-पुथल देखी जा सकती है।
भारत फिलहाल संतुलित कूटनीति, वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू बाजार प्रबंधन के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश कर रहा है। आने वाले सप्ताह ऊर्जा बाजार और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
महत्वपूर्ण बयान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया संदेश
ऊर्जा बचत और आर्थिक संतुलन को लेकर सरकार ने जिम्मेदार खपत पर जोर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हर संभव कदम उठा रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा नीति में नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू उत्पादन और रणनीतिक भंडारण को और मजबूत करना होगा।
वैश्विक एजेंसियों का संकेत
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यदि मध्य-पूर्व तनाव लंबे समय तक बना रहा तो वैश्विक महंगाई और आपूर्ति संकट की स्थिति फिर गहरा सकती है।
FAQs
प्र.1. भारत-ईरान ऊर्जा संकट 2026 का आम आदमी पर क्या असर होगा?
उत्तर: इस संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ गए हैं, जिससे भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें महंगी हो रही हैं। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप बाजार में फल, सब्जियां, राशन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा।
प्र.2. क्या इस संकट से भारत में कृषि क्षेत्र या खाद्यान्न उत्पादन पर कोई प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: हां, भारत यूरिया और अन्य खादों के निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल का आयात मध्य-पूर्वी देशों से करता है। युद्ध के कारण इस आपूर्ति में बाधा आ रही है। अगर यह संकट लंबा चलता है, तो खादों की कमी या उनकी कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर फसलों की बुवाई और किसानों की लागत पर पड़ेगा।
प्र.3. भारत इस ऊर्जा संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहा है?
उत्तर: भारत सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। भारत अपने कच्चे तेल के आयात के लिए रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों जैसे वैकल्पिक बाजारों से संपर्क बढ़ा रहा है। इसके साथ ही, देश के रणनीतिक तेल भंडारों (Strategic Petroleum Reserves) का उपयोग करने और घरेलू स्तर पर हरित ऊर्जा (Green Energy) को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
प्र.4. चाबहार पोर्ट का विवाद या संकट से क्या संबंध है?
उत्तर: चाबहार बंदरगाह ईरान में स्थित है और इसे भारत द्वारा विकसित किया गया है ताकि मध्य एशिया तक सीधे व्यापारिक पहुंच बनाई जा सके। ईरान और आसपास के क्षेत्रों में युद्ध के माहौल के कारण इस समुद्री मार्ग पर जहाजों का आना-जाना जोखिम भरा हो गया है, जिससे भारत का निर्यात और व्यापारिक गतिविधियां धीमी हो गई हैं।
