WMO Climate Warning: 2026 से 2030 के बीच टूटेगा गर्मी का महा-रिकॉर्ड, 1.5°C की दहलीज पार होने की 91% आशंका

Published on: 28-05-2026
धरती के बढ़ते तापमान और जलवायु संकट को दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर

विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा जारी WMO Climate Warning ने पूरी दुनिया के सामने एक बार फिर से पर्यावरण और जीवन के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र की इस विशेष मौसम एजेंसी ने अपनी ताजा ‘ग्लोबल एनुअल टू डिकेडल क्लाइमेट अपडेट’ रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले और डराने वाले आंकड़े पेश किए हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2026 से लेकर 2030 के बीच की पांच साल की यह अवधि मानव इतिहास की अब तक की सबसे गर्म अवधि साबित हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस बात की 86 फीसदी आशंका है कि इन पांच वर्षों में से कोई एक वर्ष मौसम का सारा पुराना रिकॉर्ड तोड़ देगा और साल 2024 को पीछे छोड़कर अब तक का सबसे गर्म साल बन जाएगा। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने 91 प्रतिशत की भारी संभावना जताई है कि इन पांच वर्षों के दौरान दुनिया का औसत तापमान कम से कम एक बार औद्योगिक क्रांति से पहले के तापमान के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चला जाएगा।

यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है जब भारत सहित पूरा दक्षिण एशिया इस समय भीषण और रिकॉर्डतोड़ गर्मी की चपेट में है। देश के कई राज्यों में तापमान इस समय 48 डिग्री सेल्सियस के करीब बना हुआ है, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल एक सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस बड़े वैश्विक संकट का हिस्सा है जिसकी चेतावनी दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार दे रहे हैं।

2026 के अंत में अल नीनो (El Niño) की वापसी बढ़ाएगी मुश्किलें

यूके मेट ऑफिस द्वारा तैयार की गई इस विस्तृत रिपोर्ट के मुख्य लेखक डॉ. लियोन हरमनसन ने बताया कि मौसम के इस जानलेवा रूप के पीछे केवल इंसानी गतिविधियां ही नहीं, बल्कि कुछ प्राकृतिक कारण भी जिम्मेदार हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा:

“हमारे वैज्ञानिक मॉडलों के अनुसार, साल 2026 के अंत में प्रशांत महासागर में ‘अल नीनो’ (El Niño) की स्थिति दोबारा बनने का अनुमान है। अल नीनो समुद्र के पानी को गर्म करता है, जिससे वैश्विक तापमान में भारी बढ़ोतरी होती है। इस वजह से पूरी संभावना है कि इसके ठीक अगले साल यानी 2027 में दुनिया गर्मी का एक नया और खौफनाक महा-रिकॉर्ड देखेगी।”

आमतौर पर अल नीनो का सीधा असर भारत के मानसून पर भी पड़ता है। जब-जब प्रशांत महासागर में अल नीनो सक्रिय होता है, तब-तब भारत में मानसून कमजोर पड़ता है और देश को सूखे व भीषण गर्मी (हीटवेव) का सामना करना पड़ता है।

आर्कटिक क्षेत्र में तीन गुना तेजी से बढ़ रही है गर्मी

आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों से तेजी से गर्म हो रहा है (AI Image)

WMO की रिपोर्ट में एक और बेहद डराने वाली बात सामने आई है। पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर स्थित आर्कटिक क्षेत्र में गर्मी बढ़ने की रफ्तार दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा तेज पाई गई है।

आने वाले पांच वर्षों के दौरान सर्दियों के महीनों (नवंबर से मार्च) में आर्कटिक का औसत तापमान सामान्य से लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने का अनुमान लगाया गया है। तापमान में हो रही इस रिकॉर्ड बढ़ोतरी के कारण बेरिंग सागर और ओखोत्स्क सागर जैसे इलाकों में जमी हुई समुद्री बर्फ (Sea Ice) बहुत तेजी से गायब हो रही है, जिससे वैश्विक समुद्र स्तर के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

1.5°C सीमा क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है

साल 2015 में हुए Paris Climate Agreement में दुनिया के देशों ने यह लक्ष्य तय किया था कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C के भीतर रखने की कोशिश की जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि तापमान इस सीमा से लगातार ऊपर जाता है तो दुनिया को गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

IPCC यानी Intergovernmental Panel on Climate Change ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 1.5°C के बाद हीटवेव, समुद्री स्तर में वृद्धि, ग्लेशियर पिघलना और कृषि संकट जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ सकती हैं।

हालांकि WMO ने स्पष्ट किया है कि किसी एक वर्ष में 1.5°C सीमा पार होने का मतलब यह नहीं है कि Paris Agreement पूरी तरह विफल हो गया है। समझौते में लंबी अवधि के औसत तापमान की बात की गई थी। लेकिन बार-बार इस सीमा के पास पहुंचना यह दिखाता है कि दुनिया तेजी से खतरनाक जलवायु क्षेत्र में प्रवेश कर रही है।

भारत पर क्या होगा इसका सीधा असर?

भारत के कई राज्यों में रिकॉर्ड गर्मी दर्ज की गई (AI image)

भारत जैसे विकासशील और घनी आबादी वाले देश के लिए यह जलवायु रिपोर्ट किसी बड़ी खतरे की घंटी से कम नहीं है। भारत अपनी खेती और पानी की जरूरतों के लिए पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण देश में मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल रहा है:

  1. जानलेवा हीटवेव की अवधि में बढ़ोतरी: उत्तर और मध्य भारत के राज्यों जैसे दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गर्मियों के दिन लंबे और ज्यादा गर्म होते जा रहे हैं, जहां पारा लगातार 48 डिग्री सेल्सियस को छू रहा है।
  2. खेती और खाद्यान्न सुरक्षा पर संकट: बेमौसम बारिश, अत्यधिक सूखा और भीषण गर्मी के कारण फसलों के उत्पादन पर बुरा असर पड़ रहा है, जिससे आने वाले समय में महंगाई और अनाज का संकट बढ़ सकता है।
  3. पानी की भारी किल्लत: नदियों के जलस्तर में कमी और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण देश के बड़े शहरों में पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है।

वैज्ञानिकों ने क्या कहा

UK Met Office की शोध वैज्ञानिक Melissa Seabrook ने Reuters से बातचीत में कहा कि पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है और इसके स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में रिकॉर्ड गर्मी सामान्य घटना बन सकती है।

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख Simon Stiell ने भी कहा कि दुनिया के पास समय बहुत कम बचा है। उनके अनुसार स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

WMO ने यह भी कहा कि हर अतिरिक्त तापमान वृद्धि के साथ जलवायु संकट के प्रभाव अधिक खतरनाक होते जाएंगे। इसमें सूखा, भारी बारिश, जंगल की आग, समुद्र का बढ़ता स्तर और खाद्य सुरक्षा पर असर शामिल है।

El Niño और बढ़ती गर्मी का संबंध

रिपोर्ट में El Niño की वापसी को भी आने वाले वर्षों में बढ़ती गर्मी का एक बड़ा कारण बताया गया है। El Niño प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो वैश्विक तापमान को अस्थायी रूप से और बढ़ा देती है।

WMO के अनुसार 2027 और 2028 में El Niño प्रभाव मजबूत हो सकता है, जिससे दुनिया को और अधिक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ जीवाश्म ईंधन से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैसें जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह हैं। कोयला, पेट्रोलियम और गैस के बढ़ते उपयोग ने पृथ्वी के वातावरण में गर्मी को फंसा दिया है।

आर्कटिक क्षेत्र सबसे तेजी से गर्म हो रहा

रिपोर्ट में सबसे गंभीर चेतावनी आर्कटिक क्षेत्र को लेकर दी गई है। WMO के अनुसार उत्तरी ध्रुव के आसपास का क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में तीन गुना से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।

2026 से 2030 के बीच आर्कटिक तापमान सामान्य औसत से लगभग 2.8°C तक अधिक हो सकता है। इसके कारण समुद्री बर्फ तेजी से पिघल सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्कटिक में बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा, जिसका असर भारत सहित कई तटीय देशों पर पड़ सकता है। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और कई छोटे तटीय शहरों के लिए भविष्य में खतरा बढ़ सकता है।

हीटवेव में वृद्धि, मानसून में अनिश्चितता

गर्मी की अवधि लंबी और अधिक खतरनाक हो सकती है। गरीब और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और कुछ क्षेत्रों में सूखा देखने को मिल सकता है।

कृषि संकट और जल संकट

धान, गेहूं और दालों जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। कई शहरों और गांवों में पीने के पानी का संकट और बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य खतरे

हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं।

दुनिया में पहले से दिख रहे प्रभाव

WMO और अन्य जलवायु एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब साफ दिखाई दे रहे हैं।

  • यूरोप में रिकॉर्ड हीटवेव देखी जा रही है।
  • कनाडा और अमेरिका में जंगल की आग बढ़ी है।
  • अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखा गंभीर हुआ है।
  • दक्षिण अमेरिका के अमेजन क्षेत्र में बारिश कम हो रही है।
  • समुद्र का तापमान लगातार बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यदि दुनिया ने कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया तो भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और बढ़ सकती है।

क्या 2°C तक पहुंचने का भी खतरा है

WMO रिपोर्ट के अनुसार अगले पांच वर्षों में किसी एक वर्ष के लिए तापमान 2°C तक पहुंचने की संभावना अभी बहुत कम यानी 1 प्रतिशत से भी कम है। लेकिन वैज्ञानिक इसे भी चिंाजनक संकेत मान रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई तो 2030 के बाद दुनिया 2°C के और करीब पहुंच सकती है।

दुनिया क्या कर रही है

जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी का तापमान (AI Image)

कई देश अब Renewable Energy यानी सौर और पवन ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रीन हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश बढ़ा है।

भारत ने भी 2070 तक Net Zero लक्ष्य घोषित किया है। सरकार सोलर मिशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं काफी नहीं होंगी। उद्योगों, शहरों और आम लोगों को भी अपनी जीवनशैली में बदलाव करना होगा।

क्या अभी भी स्थिति संभल सकती है

जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी भी स्थिति पूरी तरह हाथ से बाहर नहीं गई है। यदि दुनिया अगले कुछ वर्षों में बड़े स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करे तो तापमान वृद्धि को सीमित किया जा सकता है।

इसके लिए निम्न कदम जरूरी माने जा रहे हैं:

  • कोयले और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना
  • नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना
  • जंगलों की कटाई रोकना
  • सार्वजनिक परिवहन बढ़ाना
  • ऊर्जा बचत और स्वच्छ तकनीक अपनाना

WMO की नई रिपोर्ट दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 1.5°C सीमा के करीब पहुंचती पृथ्वी यह संकेत दे रही है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है।

आने वाले पांच वर्ष दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यदि इस दौरान बड़े स्तर पर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को अधिक गर्म, अधिक अस्थिर और अधिक खतरनाक दुनिया का सामना करना पड़ सकता है।

दुनिया के वैज्ञानिक लगातार कह रहे हैं कि समय तेजी से निकल रहा है। अब यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि और मानव जीवन का भी सवाल बन चुका है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रश्न 1: WMO क्या है?

WMO यानी World Meteorological Organization संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो मौसम, जलवायु और जल संसाधनों से जुड़ी वैश्विक निगरानी और रिपोर्ट जारी करती है।

प्रश्न 2: डब्लूएमओ (WMO) की रिपोर्ट में किस मुख्य खतरे को लेकर चेतावनी दी गई है?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि साल 2026 से 2030 के बीच वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर रहेगा। इस बात की 91% संभावना है कि तापमान अस्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस की सुरक्षित सीमा को पार कर जाएगा और 86% चांस है कि इन पांच सालों में से कोई एक साल इतिहास का सबसे गर्म साल बन जाएगा।

प्रश्न 3: 1.5°C सीमा का क्या मतलब है?

यह औद्योगिक क्रांति से पहले के औसत तापमान की तुलना में पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की सीमा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इससे ऊपर लगातार तापमान बढ़ने पर जलवायु संकट अधिक खतरनाक हो सकता है।

प्रश्न 4: क्या 1.5°C की सीमा पार होने का मतलब है कि पैरिस समझौता पूरी तरह विफल हो गया है?

नहीं, डब्लूएमओ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी एक या दो साल में तापमान 1.5°C से ऊपर जाता है, तो उसे ‘अस्थायी उल्लंघन’ माना जाता है। पैरिस समझौते की विफलता तब मानी जाएगी जब दीर्घकालिक रूप से (लगातार 20 से 30 वर्षों तक) औसत तापमान इस सीमा से ऊपर बना रहे। हालांकि, यह अस्थायी उल्लंघन इस बात का संकेत है कि हम खतरे के बहुत करीब पहुंच चुके हैं।

प्रश्न 5: अल नीनो (El Niño) क्या है और यह 2026-2030 के बीच गर्मी को कैसे बढ़ाएगा?

अल नीनो एक प्राकृतिक समुद्री घटना है जिसमें प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, 2026 के अंत में अल नीनो के दोबारा सक्रिय होने की उम्मीद है, जिसके कारण साल 2027 में दुनिया भर में गर्मी के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट सकते हैं।

प्रश्न 6: इस बढ़ते तापमान का भारत के आम नागरिकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

भारत में इसके कारण गर्मियों के मौसम में जानलेवा लू (Heatwave) का प्रकोप बढ़ेगा, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ेंगी। इसके अलावा मानसून के अनिश्चित होने से फसलों को नुकसान होगा, पानी की भारी कमी होगी और बिजली की मांग बढ़ने से बिजली संकट भी गहरा सकता है।

प्रश्न 7: क्या दुनिया अभी भी जलवायु संकट को नियंत्रित कर सकती है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुरंत बड़े स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाया जाए और स्वच्छ ऊर्जा अपनाई जाए तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।

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