नई दिल्ली – आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) के मौके पर पत्रकारिता जगत के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) यानी रिपोर्टर्स सान्स फ्रोंटियर्स ने अपना वार्षिक विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index 2026) जारी किया है, जिसमें भारत 180 देशों और क्षेत्रों में से 157वें स्थान पर है। पिछले साल यानी 2025 में भारत 151वें स्थान पर था, मतलब इस बार भारत छह पायदान और नीचे खिसक गया है। भारत को इस सूचकांक में “बेहद गंभीर” (Very Serious) श्रेणी में रखा गया है।
इसी बीच राजधानी नई दिल्ली में इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC) ने विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में एक पैनल चर्चा आयोजित की, जिसमें पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया को मिलने वाली संस्थागत सुरक्षा पर बात हुई। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इस रैंकिंग को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया।
RSF का सूचकांक क्या है और इसे कैसे तैयार किया जाता है?
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स 2002 से हर साल यह सूचकांक प्रकाशित करती है। इसमें 180 देशों और क्षेत्रों में पत्रकारिता की स्वतंत्रता का आकलन पाँच मुख्य आधारों पर किया जाता है — राजनीतिक परिवेश, कानूनी परिवेश, आर्थिक परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और पत्रकारों की सुरक्षा। इन पाँचों पहलुओं के अंकों के आधार पर किसी देश की कुल रैंकिंग तय होती है। कम स्कोर का मतलब है ज़्यादा परेशानी। इस साल की रिपोर्ट इसलिए भी खास है क्योंकि RSF ने कहा है कि पिछले 25 वर्षों में पहली बार दुनिया के आधे से ज़्यादा देश “कठिन” या “बेहद गंभीर” श्रेणी में आ गए हैं। RSF के अनुसार इस बार वैश्विक औसत स्कोर 25 साल में सबसे कम रहा है।
भारत की रैंकिंग: साल दर साल गिरावट

भारत की रैंकिंग बीते कई सालों से लगातार नीचे जा रही है। 2023 में भारत 161वें, 2024 में 159वें और 2025 में 151वें स्थान पर था। इस बार 2026 में देश 157वें पायदान पर आ गया है। यानी सिर्फ एक साल में छह स्थान की और गिरावट आई है। भारत का कुल स्कोर भी 2025 के 32.96 से घटकर 2026 में 31.96 रह गया है। RSF की देश-विशेष रिपोर्ट में भारत के मीडिया परिवेश को “अनाधिकारिक आपातकाल की स्थिति” में बताया गया है।
इस रैंकिंग में भारत अपने लगभग सभी पड़ोसी देशों से पीछे है। नेपाल 87वें, मालदीव 108वें, श्रीलंका 134वें, भूटान 150वें, बांग्लादेश 152वें और पाकिस्तान 153वें स्थान पर है। यानी वो पाकिस्तान जिसे लेकर हम अक्सर तुलना करते हैं, वो भी प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भारत से आगे है। चीन 178वें स्थान पर है जो निश्चित रूप से भारत से नीचे है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत फिलहाल उस फिलिस्तीन (156वें) से भी एक पायदान नीचे है जहाँ पिछले दो साल से जंग चल रही है।
RSF ने क्या कहा — भारत पर मुख्य आरोप
RSF की इस रिपोर्ट में भारत के बारे में कई गंभीर बातें कही गई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है, मीडिया का स्वामित्व कुछ ही बड़े घरानों के हाथों में सिमट गया है और अधिकांश चैनल सरकार के अनुकूल रुख अपनाने लगे हैं। RSF ने लिखा है कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस स्वतंत्रता संकट में है।”
रिपोर्ट में “गोदी मीडिया” शब्द का ज़िक्र किया गया है — यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और “गोद” यानी चापलूसी को मिलाकर बनाया गया व्यंग्यात्मक शब्द है। RSF के अनुसार दबाव और प्रभाव के ज़रिए भारत के बहुलतावादी मीडिया की पुरानी छवि पर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते और केवल उन्हीं पत्रकारों को इंटरव्यू देते हैं जो उनके प्रति सकारात्मक रहते हैं।
आर्थिक पहलू से देखें तो भारत के अधिकांश मीडिया संस्थान विज्ञापन राजस्व पर टिके हैं और सरकार इस क्षेत्र में सबसे बड़ी विज्ञापनदाता है। इसी कारण केंद्र व राज्य सरकारें मीडिया पर अपनी बात मनवाने की स्थिति में रहती हैं। रिपोर्ट में मुकेश अंबानी के रिलायंस इंडस्ट्रीज़ समूह का उल्लेख है जिसके पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट बताए गए हैं। इसके अलावा 2022 के अंत में गौतम अडानी द्वारा NDTV का अधिग्रहण भी रिपोर्ट में उदाहरण के तौर पर दर्ज है।
कानून का हथियार की तरह इस्तेमाल — पत्रकारों पर मुकदमे
RSF की रिपोर्ट में सबसे ज़्यादा गिरावट कानूनी संकेतक (Legal Indicator) में देखी गई है। 180 में से 110 देशों में कानूनी स्थिति बिगड़ी है और भारत का नाम उन देशों में प्रमुखता से शामिल है जहाँ यह गिरावट सबसे ज़्यादा है। RSF ने कहा है कि “पत्रकारिता का अपराधीकरण एक वैश्विक घटना बनती जा रही है।”
भारत में राजद्रोह कानून, मानहानि, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधान और UAPA जैसे कानूनों का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक आज़ाद पत्रकारों और यूट्यूबर्स को भी तेज़ी से निशाना बनाया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी आज के दिन ट्वीट करते हुए कहा कि 2014 से 2020 के बीच 135 से ज़्यादा पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया या पूछताछ के लिए बुलाया गया और 2014 से 2023 के बीच 36 पत्रकार जेल में बंद रहे। उन्होंने यह भी कहा कि “संघ परिवार ने न्यूज़रूम को चुप कराने के लिए कानूनी ढांचे का इस्तेमाल किया है।”
खरगे ने जवाहरलाल नेहरू को उद्धृत करते हुए कहा, “प्रेस की स्वतंत्रता केवल एक नारा नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक आवश्यक हिस्सा है।”
IWPC का पैनल — महिला पत्रकारों की आवाज़
नई दिल्ली स्थित 5, विंडसर प्लेस में इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC) का दफ्तर है। IWPC 1994 में स्थापित महिला पत्रकारों का एक सम्मानित संगठन है। हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर IWPC एक पैनल चर्चा आयोजित करती है जिसमें वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और मीडिया विशेषज्ञ हिस्सा लेते हैं।
इस बार भी IWPC ने आज एक पैनल का आयोजन किया जिसमें पत्रकारों की सुरक्षा के लिए संस्थागत उपायों पर चर्चा हुई। RSF की रिपोर्ट में भी यह बात दर्ज है कि महिला पत्रकारों को खास तौर पर निशाना बनाया जाता है — उन्हें ऑनलाइन धमकियाँ दी जाती हैं, उनका पता उजागर किया जाता है (doxxing) और हिंसा की धमकियाँ भी दी जाती हैं। ऐसे में IWPC का यह पैनल और भी प्रासंगिक हो जाता है।
IWPC ने पहले भी विभिन्न अवसरों पर ऐसे बयान जारी किए हैं जिनमें भारत की गिरती रैंकिंग पर चिंता जताई गई है और पत्रकारों के खिलाफ कठोर कानूनों का विरोध किया गया है।
विपक्ष का हमला — कांग्रेस ने क्या कहा?
कांग्रेस ने आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर सरकार पर जमकर निशाना साधा। पार्टी ने अपने आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से लिखा, “स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र की आवाज़ है, लेकिन आज वह आवाज़ खतरे में है। भारत विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में 157वें स्थान पर है, जो इसे ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में रखता है।” पार्टी ने यह भी कहा कि वह हर उस साहसी आवाज़ के साथ खड़ी है जो सत्ता से सवाल पूछती है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने X पर लिखा, “आज के दिन देश को एक कड़वी और अटल सच्चाई का सामना करना होगा। 2014 के बाद से भारत का स्थान विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में लगातार गिरता रहा है और अब BJP शासन में यह 157वें स्थान पर पहुँच गया है।” उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र में सत्ता और जनता के बीच की कड़ी है और पत्रकार सार्वजनिक सच्चाई के रखवाले हैं।
दुनियाभर में भी हालात खराब — 25 साल में सबसे कम स्कोर
RSF के इस सूचकांक की एक बड़ी बात यह है कि इस साल का वैश्विक चित्र 25 वर्षों में सबसे खराब है। 2002 में जब RSF ने यह इंडेक्स शुरू किया था, तब केवल 13.7% देश “कठिन” या “बेहद गंभीर” श्रेणी में थे। अब यह आँकड़ा 52.2% तक पहुँच गया है। दुनिया की 1% से भी कम आबादी ऐसे देश में रहती है जहाँ प्रेस स्वतंत्रता “अच्छी” (Good) स्थिति में हो।
सूचकांक में शीर्ष पर नॉर्वे दसवीं बार लगातार पहले स्थान पर काबिज़ है। उसके बाद नीदरलैंड, एस्टोनिया, डेनमार्क और स्वीडन हैं। सबसे नीचे इरिट्रिया है, जो तीसरी बार अंतिम पायदान पर है। उत्तर कोरिया, चीन और ईरान भी निचले पायदानों पर हैं। इस साल सबसे बड़ी छलांग सीरिया ने लगाई है जो 36 स्थान ऊपर आकर 141वें पायदान पर पहुँच गया है। यह बदलाव दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के शासन के पतन के बाद के राजनीतिक परिवर्तन की वजह से है।
अमेरिका भी इस बार सात स्थान नीचे खिसककर 64वें पायदान पर आ गया है। 2022 के बाद से अमेरिका 14 अंक गिर चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका में पत्रकारों को राष्ट्रपति ट्रम्प के कार्यकाल में सरकारी संस्थाओं के दुरुपयोग का सामना करना पड़ रहा है।
न्यूज़रूम में विविधता का अभाव — महिलाओं और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी कम
RSF की रिपोर्ट में भारतीय मीडिया की एक और बड़ी खामी उजागर की गई है — न्यूज़रूम में विविधता की कमी। रिपोर्ट के मुताबिक पत्रकारिता में प्रबंधन पदों पर ऊँची जाति के हिंदू पुरुषों का वर्चस्व है। बड़े शाम के टॉक शो में महिलाएँ महज 15% से भी कम मेहमान होती हैं। अल्पसंख्यक और असहमत आवाज़ों को मुख्यधारा मीडिया में बहुत कम जगह मिलती है। हिंदी के अधिकांश टीवी चैनल अपने प्रसारण में धार्मिक सामग्री को बड़ा हिस्सा देते हैं।
RSF ने यह भी नोट किया है कि भारत में हर साल औसतन दो से तीन पत्रकारों की हत्या उनके काम से जुड़े कारणों की वजह से होती है। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने कई पत्रकारों का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि वे भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए — उत्तर प्रदेश में राघवेंद्र बाजपेई, छत्तीसगढ़ में मुकेश चंद्राकर, उत्तराखंड में राजीव प्रताप सिंह और हरियाणा में धर्मेंद्र सिंह चौहान।
UNESCO का थीम और वैश्विक सम्मेलन
इस साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का थीम है — “Shaping a Future of Peace” यानी “शांति के भविष्य को आकार देना।” इस दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में की थी। UNESCO हर साल 3 मई को इस दिन का आयोजन करती है। इस बार मुख्य सम्मेलन 4 मई को ज़ाम्बिया की राजधानी लुसाका में आयोजित हो रहा है। इस सम्मेलन में पत्रकारिता, तकनीक, मानवाधिकार और नागरिक समाज के प्रतिनिधि मिलकर भविष्य की रणनीति पर विचार करेंगे।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया
भारत सरकार की ओर से RSF की रैंकिंग पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सरकार आमतौर पर RSF की रिपोर्ट को लेकर कहती रही है कि यह एकतरफा है और भारत की विविध और जीवंत मीडिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती। हालांकि, इस बार की रिपोर्ट में जो आँकड़े और उदाहरण दिए गए हैं, वे पत्रकारिता जगत में एक बड़ी बहस को जन्म दे रहे हैं।
क्या रहा भारत के पाँचों संकेतकों में?
RSF हर देश का मूल्यांकन पाँच संकेतकों पर करती है। भारत के मामले में इस बार राजनीतिक संकेतक रैंकिंग 155 से गिरकर 160 पर आ गई। आर्थिक परिवेश संकेतक रैंकिंग 144 पर है जो सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव दर्शाता है। कानूनी संकेतक में गिरावट सबसे ज़्यादा दर्ज की गई है। सुरक्षा संकेतक में भी भारत की स्थिति चिंताजनक है क्योंकि पत्रकारों को शारीरिक हमले, ऑनलाइन उत्पीड़न और कानूनी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सामाजिक-सांस्कृतिक संकेतक में न्यूज़रूम में विविधता की कमी और हाशिये पर रहने वाले समुदायों की आवाज़ दबाने की प्रवृत्ति उजागर हुई है।
आगे क्या — पत्रकारिता के भविष्य पर सवाल

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ हज़ारों अखबार, सैकड़ों टीवी चैनल और लाखों डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं। मीडिया की मात्रा के हिसाब से भारत दुनिया के सबसे विशाल देशों में गिना जाता है। लेकिन RSF की रिपोर्ट यह सवाल उठाती है कि मात्रा और गुणवत्ता अलग-अलग होती है। अगर मीडिया पर आर्थिक दबाव है, मालिकाने का संकेंद्रण है, कानूनी धमकियाँ हैं और पत्रकारों को सुरक्षा नहीं है — तो भले ही चैनलों की संख्या कितनी भी हो, स्वतंत्र पत्रकारिता की जगह सिकुड़ती रहेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का हल केवल रैंकिंग सुधारने से नहीं बल्कि असल ज़मीनी बदलावों से होगा — पत्रकारों के लिए कानूनी सुरक्षा, मीडिया स्वामित्व में पारदर्शिता, सरकारी विज्ञापन में निष्पक्षता और न्यूज़रूम में विविधता। तभी भारत की पत्रकारिता वो रोल अदा कर पाएगी जो लोकतंत्र में उसे करना चाहिए।
FAQ‘s
प्रश्न 1: विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत किस स्थान पर है?
उत्तर: भारत 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में से 157वें स्थान पर है। यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने 30 अप्रैल 2026 को जारी किया था। 2025 में भारत 151वें स्थान पर था, इस तरह एक साल में छह पायदान की गिरावट आई है। भारत को “बेहद गंभीर” (Very Serious) श्रेणी में रखा गया है।
प्रश्न 2: RSF का विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक कैसे बनता है?
उत्तर: रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) हर साल 180 देशों में पत्रकारिता की स्थिति का मूल्यांकन पाँच आधारों पर करती है — राजनीतिक परिवेश, कानूनी परिवेश, आर्थिक परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और पत्रकारों की सुरक्षा। इन पहलुओं के आधार पर प्रत्येक देश को एक अंक और रैंकिंग दी जाती है। कम अंक का मतलब है पत्रकारों के लिए ज़्यादा मुश्किल। RSF यह इंडेक्स 2002 से जारी कर रही है।
प्रश्न 3: भारत अपने पड़ोसी देशों की तुलना में कहाँ है?
उत्तर: भारत अपने लगभग सभी पड़ोसी देशों से पीछे है। नेपाल 87वें, मालदीव 108वें, श्रीलंका 134वें, भूटान 150वें, बांग्लादेश 152वें और पाकिस्तान 153वें स्थान पर है — सभी भारत (157वें) से ऊपर। केवल चीन (178वें) और अफगानिस्तान (175वें) भारत से पीछे हैं। यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत खुद को इस क्षेत्र का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है।
प्रश्न 4: RSF ने भारत में प्रेस स्वतंत्रता की गिरावट के लिए क्या कारण बताए हैं?
उत्तर: RSF ने कई कारण गिनाए हैं। पहला, पत्रकारों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न में बढ़ोतरी। दूसरा, मीडिया स्वामित्व कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों में सिमटना, जिनका सरकार से निकट संबंध है। तीसरा, राजद्रोह, मानहानि, राष्ट्रीय सुरक्षा और UAPA जैसे कानूनों का पत्रकारों के खिलाफ बढ़ता इस्तेमाल। चौथा, सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता के कारण मीडिया की स्वतंत्रता पर आँच। पाँचवाँ, न्यूज़रूम में विविधता की कमी — महिलाओं, अल्पसंख्यकों और निचली जातियों की हिस्सेदारी बहुत कम।
प्रश्न 5: IWPC क्या है और इसने आज क्या किया?
उत्तर: इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC) 1994 में स्थापित महिला पत्रकारों का एक प्रतिष्ठित संगठन है जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। यह संगठन महिला पत्रकारों के हितों की रक्षा करता है और मीडिया से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से आवाज़ उठाता है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर IWPC हर साल एक पैनल चर्चा आयोजित करती है। आज 3 मई 2026 को IWPC ने नई दिल्ली में पत्रकारों की सुरक्षा और संस्थागत सुरक्षा उपायों पर एक पैनल चर्चा आयोजित की।
प्रश्न 6: विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
उत्तर: विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर साल 3 मई को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में इसे घोषित किया था। इसकी जड़ें 1991 के विंडहोक घोषणापत्र में हैं जो अफ्रीकी पत्रकारों ने तैयार किया था। यह दिन सरकारों को याद दिलाता है कि वे प्रेस स्वतंत्रता की अपनी प्रतिबद्धता का पालन करें। यह उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है जो अपनी जान देकर पत्रकारिता करते हैं। इस साल UNESCO ने इसका थीम “Shaping a Future of Peace” रखा है।
प्रश्न 7: दुनिया में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति कैसी है?
उत्तर: RSF के 2026 इंडेक्स के मुताबिक 25 साल में यह पहली बार है जब दुनिया के 52.2% देश “कठिन” या “बेहद गंभीर” श्रेणी में हैं। 180 में से 100 से ज़्यादा देशों में प्रेस स्वतंत्रता का स्कोर गिरा है। 110 देशों में कानूनी संकेतक बिगड़ा है। नॉर्वे लगातार दसवीं बार शीर्ष पर है। इरिट्रिया, उत्तर कोरिया और चीन सबसे नीचे हैं। गाज़ा में 220 से ज़्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं।
