आज मई महीने का पहला रविवार है और पूरी दुनिया इसे ‘विश्व हास्य दिवस‘ (World Laughter Day) के रूप में मना रही है। वैसे तो हंसी के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं होती, लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तनाव के बीच यह दिन हमें याद दिलाता है कि एक छोटी सी मुस्कान हमारे स्वास्थ्य और समाज के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। भारत में हंसी का जिक्र तब तक अधूरा है, जब तक हम अपने उन महान फिल्मी कलाकारों की बात न करें, जिन्होंने ब्लैक एंड व्हाइट के दौर से लेकर आज के डिजिटल युग तक करोड़ों चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है।
विश्व हास्य दिवस का जन्म भारत में हुआ था और इसे एक भारतीय डॉक्टर ने शुरू किया था। यह हम सबके लिए गर्व की बात है। इस खास दिन पर आज हम बात करेंगे — हँसी के विज्ञान की, इस दिन की शुरुआत की कहानी की और उन महान भारतीय हास्य कलाकारों की जिन्होंने बॉलीवुड की दुनिया में हँसी का एक अनोखा संसार बनाया।
विश्व हास्य दिवस की शुरुआत — एक भारतीय डॉक्टर की अनोखी पहल
विश्व हास्य दिवस की नींव रखी डॉ. मदन कटारिया ने, जो मुंबई के एक पारिवारिक डॉक्टर थे। उन्होंने 1995 में मुंबई के एक पार्क में सिर्फ पाँच लोगों के साथ मिलकर “लाफ्टर क्लब” शुरू किया था। उनका मानना था कि हँसना केवल किसी चुटकुले या मज़ेदार बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए — इंसान जानबूझकर भी हँस सकता है और उसके फायदे असली हँसी जैसे ही होते हैं। उन्होंने इसे “लाफ्टर योगा” का नाम दिया — यानी हँसी और साँस लेने के व्यायाम को मिलाकर एक नई पद्धति।
11 जनवरी 1998 को पहला विश्व हास्य दिवस मुंबई में मनाया गया जिसमें अंतरराष्ट्रीय लाफ्टर क्लबों के लगभग 12,000 सदस्य शामिल हुए। इसके बाद 9 जनवरी 2000 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में “Happy-demic” नाम से पहला विश्व हास्य दिवस भारत के बाहर मनाया गया जिसमें 10,000 लोगों ने हिस्सा लिया और यह आयोजन “गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स” में दर्ज हुआ। आज लाफ्टर योगा 65 से ज़्यादा देशों में 6,000 से अधिक क्लबों में फैल चुका है। हर साल मई के पहले रविवार को यह दिन मनाया जाता है।
हँसी का विज्ञान — सेहत का सबसे सस्ता नुस्खा

हँसी को हम अक्सर सिर्फ खुशी का इज़हार मानते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि हँसने से शरीर और मन दोनों को बड़े फायदे होते हैं। PLOS One में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार सिर्फ एक बार ज़ोर से हँसने से शरीर में तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर 37% तक घट सकता है। लोमा लिंडा विश्वविद्यालय के एक शोध में पाया गया कि हँसने की उम्मीद भर से ही कोर्टिसोल 39% और एपिनेफ्रीन 70% तक कम हो जाता है।
हँसने से दिमाग में एंडोर्फिन निकलते हैं — जो कि शरीर के प्राकृतिक “खुशी के रसायन” हैं। इससे मूड अच्छा होता है, दर्द में राहत मिलती है और नींद बेहतर होती है। वेंडरबिल्ट विश्वविद्यालय के अनुसार 10 से 15 मिनट की जोरदार हँसी 40 कैलोरी तक जला सकती है। हँसने से दिल की धड़कन बढ़ती है, खून का बहाव बेहतर होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मज़बूत होती है। सामाजिक रूप से देखें तो हँसी रिश्तों को मज़बूत करती है, बात करने का माहौल बनाती है और लोगों के बीच भरोसा बढ़ाती है।
यही कारण है कि डॉ. कटारिया की लाफ्टर योगा पद्धति इतनी लोकप्रिय हुई। उनका कहना है कि शरीर असली और नकली हँसी में फर्क नहीं कर पाता — दोनों का असर एक जैसा होता है।
भारतीय सिनेमा और हँसी का रिश्ता
भारतीय सिनेमा की शुरुआत से ही हास्य का उसमें अहम स्थान रहा है। दशकों से बॉलीवुड के कॉमेडियन दर्शकों की ज़िंदगी में खुशी और राहत लेकर आते रहे हैं। ये वो कलाकार थे जो एक चुटकी में, एक मुँह बनाने से या एक खास अंदाज़ के बोलने से ही पूरा सिनेमाघर हँसा देते थे। उनकी कला कोई छोटी बात नहीं थी — असल में अच्छा कॉमेडी करना उतना ही मुश्किल है जितना कि अच्छा दुखद दृश्य करना, बल्कि कई बार उससे भी ज़्यादा।
विश्व हास्य दिवस के इस खास मौके पर आइए याद करें उन लाजवाब हास्य कलाकारों को जिन्होंने भारतीय सिनेमा की हँसी को एक अलग ऊँचाई दी।
मेहमूद — बॉलीवुड के “किंग ऑफ कॉमेडी”
29 सितंबर 1932 को जन्मे मेहमूद अली, जिन्हें सभी बस “मेहमूद” के नाम से जानते थे, हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े हास्य कलाकार माने जाते हैं। उनके पिता मुमताज़ अली 1940-50 के दशक के मशहूर अभिनेता और नर्तक थे। मेहमूद ने अपने शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया — उन्होंने मुर्गे बेचने से लेकर फिल्म डायरेक्टर पी.एल. संतोषी के ड्राइवर के तौर पर काम तक किया।
मेहमूद ने 300 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया। उनकी सबसे यादगार फिल्म 1968 की “पड़ोसन” है जिसमें उन्होंने मास्टर पिल्लई का किरदार निभाया — एक दक्षिण भारतीय संगीत शिक्षक जिसकी अदाकारी आज भी दर्शकों को गुदगुदाती है। “एक चतुर नार” गाना आज भी घर-घर में गाया जाता है। मेहमूद ने अमिताभ बच्चन को उनके करियर के मुश्किल दौर में “बॉम्बे टू गोआ” (1972) में मौका दिया। अमिताभ बच्चन ने खुद कहा है कि मेहमूद उनके “गॉडफादर” थे। इतना ही नहीं, उन्होंने संगीतकार आर. डी. बर्मन को भी पहला मौका दिया।
23 जुलाई 2004 को अमेरिका के पेंसिलवेनिया में दिल की बीमारी की वजह से उनका निधन हो गया। उनकी याद में 2013 में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया।
कादर खान — लेखक भी, कलाकार भी, उस्ताद भी
कादर खान का नाम लेते ही दिमाग में एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभरती है जो अपनी एक मुस्कान से, एक आवाज़ के उतार-चढ़ाव से या एक मज़ेदार डायलॉग से पूरे पर्दे पर छा जाते थे। 22 अक्टूबर 1937 को अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान का परिवार 1942 में मुंबई आ गया। उन्होंने मुंबई में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और एम. एच. सैबू सिद्दीक इंजीनियरिंग कॉलेज में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी रहे।
थिएटर में एक नाटक के दौरान दिलीप कुमार की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने फिल्मों में काम करने का न्यौता दिया। फिर क्या था — 1973 में “दाग” से अभिनय की शुरुआत के बाद कादर खान ने 300 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया और 250 से अधिक फिल्मों के संवाद लिखे। “शोले”, “अमर अकबर एंथनी”, “मुकद्दर का सिकंदर”, “लावारिस”, “नसीब”, “कूली” जैसी दर्जनों सुपरहिट फिल्मों के संवाद उन्होंने लिखे।
गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी डेविड धवन की फिल्मों में अत्यंत लोकप्रिय हुई। “बाप नंबरी बेटा दस नंबरी”, “राजा बाबू”, “कूली नंबर वन”, “साजन चले ससुराल” जैसी फिल्मों में उनकी कॉमेडी अद्वितीय थी। उन्होंने Filmfare Best Comedian Award जीता और “मेरी आवाज़ सुनो” और “अंगार” के लिए दो बार Filmfare Best Dialogue Award भी जीता।
31 दिसंबर 2018 को कनाडा में सुप्रा-न्यूक्लियर पाल्सी नामक बीमारी की वजह से उनका निधन हो गया। 26 जनवरी 2019 को भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया।
असरानी — “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं!”

1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान में जन्मे गोवर्धन कुमार असरानी ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक यादगार किरदार दिए। FTII, पुणे से अभिनय की पढ़ाई करने वाले असरानी ने 350 से ज़्यादा हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया। उनका नाम लेते ही “शोले” (1975) का वो दृश्य आँखों के सामने आ जाता है जब वे जेलर की वर्दी पहने, हिटलर की मूँछों के साथ चिल्लाते हैं — “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं!” यह एक ऐसा किरदार था जो महज़ एक दृश्य में था लेकिन आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार कॉमेडी का हिस्सा है।
असरानी ने 1970 और 1980 के दशकों में प्रत्येक दशक में 100 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया — यह हिंदी सिनेमा में एक रिकॉर्ड है। उन्होंने राजेश खन्ना के साथ 25 फिल्मों में काम किया जिनमें “बावर्ची”, “नमक हराम”, “महबूबा” शामिल हैं। “चुपके चुपके”, “छोटी सी बात”, “हम तुम्हारे हैं”, “हेरा फेरी”, “भूल भुलैया” — उनकी लिस्ट बेशुमार है। उन्होंने दो बार Filmfare Best Comedian Award जीता।
20 अक्टूबर 2025 को दीपावली के दिन मुंबई के अरोग्य निधि अस्पताल में फेफड़ों में पानी भरने की बीमारी से उनका निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे। उस दिन उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर दीपावली की शुभकामनाएँ भी दी थीं। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “एक प्रतिभाशाली मनोरंजक और सच्चे बहुमुखी कलाकार” बताया।
जगदीप — 400 फिल्में और “सूरमा भोपाली” की अमर पहचान
29 मार्च 1939 को मध्यप्रदेश के दतिया में जन्मे सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी, जिन्हें दुनिया “जगदीप” के नाम से जानती है, ने 400 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया। वे “शोले” (1975) में “सूरमा भोपाली” के किरदार के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। बचपन में पिता का साया उठ जाने के बाद वे माँ के साथ मुंबई आ गए जहाँ बहुत कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अपना रास्ता बनाया।
उनकी कॉमेडी में एक अलग ही माटी की खुशबू थी — एकदम देसी, एकदम ज़मीनी। “पुराना मंदिर” में “मच्छर” का किरदार हो या “अंदाज़ अपना अपना” में सलमान खान के पिता की भूमिका — जगदीप ने हर किरदार में जान फूँक दी। उन्होंने “सूरमा भोपाली” नाम की एक फिल्म भी खुद बनाई जिसमें यही किरदार था। उनके बेटे जावेद जाफरी आज भी बॉलीवुड में सक्रिय हैं।
8 जुलाई 2020 को मुंबई में 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
शक्ति कपूर — खलनायक से कॉमेडियन तक का सफर
3 सितंबर 1952 को जन्मे शक्ति कपूर हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में से हैं जिन्होंने विलेन और कॉमेडियन दोनों भूमिकाएँ बखूबी निभाईं। उनका असली नाम सुनील कपूर था। अभिनेता सुनील दत्त ने उन्हें फिल्म “राॅकी” (1981) में खलनायक की भूमिका के लिए चुना था और उसी समय उन्हें “शक्ति कपूर” नाम दिया।
700 से ज़्यादा फिल्मों में काम करने वाले शक्ति कपूर ने 1980 और 1990 के दशक में कादर खान और असरानी के साथ मिलकर 100 से ज़्यादा फिल्मों में कॉमेडी की जुगलबंदी की। “बाप नंबरी बेटा दस नंबरी”, “बोल राधा बोल”, “राजा बाबू”, “अंदाज़ अपना अपना”, “जुड़वा”, “हंगामा”, “भागम भाग” — उनकी कॉमेडी फिल्मों की सूची बहुत लंबी है। “Crime Master Gogo” का किरदार उनकी पहचान बन गया।
केश्टो मुखर्जी — बॉलीवुड का “असली नशेड़ी” जो असल ज़िंदगी में नहीं पीता था!
केश्टो मुखर्जी बॉलीवुड के उन अनोखे कलाकारों में थे जिन्हें पर्दे पर हमेशा नशे में धुत दिखाया गया लेकिन असल ज़िंदगी में वे पूर्ण रूप से शराब न छूने वाले यानी “टीटोटलर” थे। इसके बावजूद उनकी शराब पीने की अदाकारी इतनी लाजवाब थी कि अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे दिग्गज अभिनेता भी उनकी तारीफ करते थे।
“ज़ंजीर” (1973), “आप की कसम” (1974), “शोले” (1975), “चुपके चुपके” (1975), “गोल माल” (1979), “खूबसूरत” (1980) — इन सभी फिल्मों में केश्टो मुखर्जी ने अपने अनोखे अंदाज़ से हँसी बिखेरी। वे पुरी तरह बंगाली पृष्ठभूमि से थे और हिंदी फिल्मों में भी उनकी अपनी एक खास स्टाइल थी। हृषिकेश मुखर्जी ने उन्हें कई फिल्मों में लिया और वे उनके “लकी मास्कॉट” बन गए।
3 मार्च 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया। दुखद बात यह है कि उस समय न मीडिया ने और न ही फिल्म उद्योग ने उन्हें उचित श्रद्धांजलि दी। लेकिन उनके चाहने वाले आज भी उन्हें याद करते हैं।
राजेंद्र नाथ — 60 के दशक के हीरो के सबसे चहेते दोस्त
राजेंद्र नाथ मशहूर अभिनेता प्रेम नाथ के छोटे भाई थे और बॉलीवुड में उन्होंने हीरो के खास दोस्त का किरदार खूब जँचाया। नासिर हुसैन की फिल्मों में शम्मी कपूर और आशा पारेख के साथ उनकी तिकड़ी बेहद लोकप्रिय हुई। “दिल दे के देखो” (1959), “फिर वही दिल लाया हूँ”, “जब प्यार किसी से होता है”, “बहारों के सपने”, “प्यार का मौसम” — इन सभी फिल्मों में उनकी कॉमेडी एकदम स्वाभाविक और हल्की-फुल्की थी। उन्होंने अपने करियर में 187 से ज़्यादा फिल्में कीं।
जॉनी लीवर: हंसी के आधुनिक सम्राट
जॉनी लीवर ने मिमिक्री और स्टैंड-अप कॉमेडी को फिल्मों में एक नया रूप दिया। उनकी बॉडी लैंग्वेज इतनी लचीली है कि वे बिना बोले भी लोगों को हंसा सकते हैं। ‘बाजीगर’ से लेकर ‘गोलमाल’ तक, उनका योगदान अतुलनीय है।
बॉलीवुड के अन्य अमर हास्य कलाकार
हिंदी सिनेमा की हास्य परंपरा सिर्फ ऊपर गिनाए नामों तक नहीं रुकती। देव आनंद की फिल्मों के जॉनी वॉकर, जिनकी “चरित्र भूमिकाएँ” बेहद मज़ेदार होती थीं और जिन्होंने “सी.आई.डी.” और “प्यासा” जैसी फिल्मों में काम किया — वे भी उस दौर के अहम कॉमेडियन थे। मुकरी ने अपनी आवाज़ और अंदाज़ से कई फिल्मों में रंग भरा। दीवेन वर्मा ने “अंगूर” (1982) जैसी फिल्मों में अपनी शानदार कॉमेडी दिखाई। ओम प्रकाश ने दशकों तक पिता और चाचा के किरदारों में हास्य का तड़का लगाया। महमूद की विरासत को आगे बढ़ाते हुए जॉनी लीवर ने 90 के दशक और उसके बाद बॉलीवुड में हास्य की नई लहर लाई। परेश रावल की कॉमेडी भी किसी से कम नहीं रही।
आज का बॉलीवुड और हँसी की परंपरा
आज हिंदी सिनेमा में कॉमेडी का रूप बदल गया है। अब हीरो खुद ही कॉमेडी करता है और अलग कॉमेडियन की भूमिका कम हो गई है। लेकिन आज भी जब कोई पुरानी फिल्म टीवी पर आती है और मेहमूद, कादर खान, असरानी या जगदीप का कोई दृश्य आता है — लोग हँसना बंद नहीं कर पाते। यह उनकी कला की असली जीत है।
विश्व हास्य दिवस पर यह सोचना ज़रूरी है कि हँसी सिर्फ मनोरंजन नहीं — यह ज़िंदगी की एक ज़रूरत है। और इन महान कलाकारों ने करोड़ों ज़िंदगियों में वह ज़रूरत पूरी की।
बदलते समय के साथ कॉमेडी का स्वरूप
आज 2026 में कॉमेडी फिल्मों से निकलकर यूट्यूब और रील तक पहुंच गई है। लेकिन जो सादगी और गहराई पुराने दौर के कलाकारों में थी, उसकी कमी आज भी महसूस की जाती है। पहले की कॉमेडी में फूहड़ता कम और कला ज्यादा होती थी। आज के इस विशेष दिन पर सोशल मीडिया पर इन महान कलाकारों के वीडियो क्लिप्स खूब शेयर किए जा रहे हैं, जो साबित करते हैं कि हंसी कभी पुरानी नहीं होती।
आप कैसे मनाएँ विश्व हास्य दिवस?
विश्व हास्य दिवस मनाने के लिए किसी बड़े आयोजन की ज़रूरत नहीं है। अपने परिवार या दोस्तों के साथ पुरानी कॉमेडी फिल्म देखें — शायद “पड़ोसन”, “चुपके चुपके”, “अंगूर” या “अंदाज़ अपना अपना”। पास के पार्क में लाफ्टर क्लब हो तो वहाँ जाएँ। किसी अपने को फोन करें जो हमेशा हँसाता हो। कोई पुरानी मज़ेदार याद साझा करें। बच्चों के साथ थोड़ी देर खेलें — उनकी हँसी सबसे खालिस होती है। और सबसे ज़रूरी — कादर खान, मेहमूद और असरानी जैसे उन महान कलाकारों को याद करें जिनकी वजह से आपके घर में हँसी के ये पल आए।
एक महान विचार

मार्क ट्वेन ने कहा था — “मानव जाति के पास केवल एक ही असली हथियार है और वह है हँसी।” विक्टर ह्यूगो के शब्दों में — “हँसी वह धूप है जो मानव के चेहरे से सर्दी को दूर करती है।” और अपने भारत में ही कहा गया है — “हँसी खुशी का राजमार्ग है।” ये सिर्फ कहावतें नहीं, जीवन के तजुर्बे हैं।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: विश्व हास्य दिवस 2026 कब मनाया जा रहा है और इसकी थीम क्या है?
उत्तर: विश्व हास्य दिवस 2026 आज 3 मई 2026 (रविवार) को मनाया जा रहा है। यह हर साल मई के पहले रविवार को मनाया जाता है। 2026 की थीम है — “World Peace through Laughter” यानी “हँसी के ज़रिए विश्व शांति।” यह थीम यह बताती है कि हँसी भाषा, धर्म और संस्कृति की सीमाओं को पार करके लोगों को जोड़ सकती है और दुनिया में शांति का माहौल बना सकती है।
प्रश्न 2: विश्व हास्य दिवस की शुरुआत किसने और कब की?
उत्तर: विश्व हास्य दिवस की शुरुआत भारतीय डॉक्टर डॉ. मदन कटारिया ने की। उन्होंने 1995 में मुंबई के एक पार्क में सिर्फ पाँच लोगों के साथ “लाफ्टर योगा क्लब” की शुरुआत की थी। 11 जनवरी 1998 को पहला आधिकारिक विश्व हास्य दिवस मुंबई में मनाया गया जिसमें 12,000 लोग शामिल हुए। आज यह आंदोलन 65 से ज़्यादा देशों और 6,000 से ज़्यादा क्लबों में फैल चुका है। डॉ. कटारिया का मानना था कि शरीर असली और नकली हँसी में फर्क नहीं कर पाता, इसलिए जानबूझकर हँसना भी उतना ही फायदेमंद है।
प्रश्न 3: हँसने के क्या-क्या स्वास्थ्य लाभ हैं?
उत्तर: हँसने के कई वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित लाभ हैं। तनाव के हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर 37% तक घट सकता है। दिमाग से एंडोर्फिन निकलते हैं जो खुशी और दर्द-राहत देते हैं। दिल का खून बहाव बेहतर होता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। मांसपेशियाँ रिलैक्स होती हैं। 10-15 मिनट की हँसी 40 कैलोरी तक जला सकती है। नींद बेहतर होती है। रिश्ते मज़बूत होते हैं और सामाजिक संबंध बनते हैं। आसान भाषा में कहें — हँसना शरीर की मुफ्त दवाई है।
प्रश्न 4: कादर खान कौन थे और उनकी विरासत क्या है?
उत्तर: कादर खान 22 अक्टूबर 1937 को काबुल, अफगानिस्तान में जन्मे थे और उनका परिवार मुंबई में बस गया था। वे एक सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे जो फिल्मों में आए। उन्होंने 300 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया और 250 से अधिक फिल्मों के संवाद लिखे। “अमर अकबर एंथनी”, “मुकद्दर का सिकंदर”, “लावारिस”, “शोले” जैसी बड़ी फिल्मों के डायलॉग उनके थे। अमिताभ बच्चन, गोविंदा, राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी बेहद पसंद की जाती थी। 31 दिसंबर 2018 को कनाडा में उनका निधन हुआ। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया।
प्रश्न 5: मेहमूद को भारतीय सिनेमा का “किंग ऑफ कॉमेडी” क्यों कहा जाता है?
उत्तर: मेहमूद को यह उपाधि इसलिए मिली क्योंकि 1960 और 70 के दशकों में हिंदी सिनेमा में उनसे बड़ा कोई कॉमेडियन नहीं था। 300 से ज़्यादा फिल्में, 25 फिल्मफेयर नामांकन, अमिताभ बच्चन और आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गजों को पहला मौका देना — सब मिलाकर उनकी हस्ती बनती है। “पड़ोसन” में मास्टर पिल्लई का किरदार उनकी उत्कृष्ट कॉमेडी का सबसे बड़ा उदाहरण है। 2013 में भारत सरकार ने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया।
प्रश्न 6: असरानी का निधन कब हुआ और उनकी सबसे यादगार भूमिका कौन सी थी?
गोवर्धन कुमार असरानी का निधन 20 अक्टूबर 2025 को दीपावली के दिन मुंबई में 84 वर्ष की उम्र में हुआ। उनकी सबसे यादगार भूमिका “शोले” (1975) में जेलर की है जिसमें उन्होंने “हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं!” जैसा अमर डायलॉग बोला। 350 से ज़्यादा फिल्मों में काम करने वाले असरानी ने 1970 और 1980 के दशकों में प्रत्येक में 100 से ज़्यादा फिल्में कीं — यह हिंदी सिनेमा में एक रिकॉर्ड है।
प्रश्न 7: जगदीप के बारे में बताइए — वे किस किरदार के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं?
उत्तर: जगदीप यानी सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी (29 मार्च 1939 – 8 जुलाई 2020) 400 से ज़्यादा फिल्मों के अभिनेता थे। वे “शोले” (1975) में “सूरमा भोपाली” के किरदार के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं। “पुराना मंदिर” में “मच्छर” और “अंदाज़ अपना अपना” (1994) में सलमान खान के पिता का किरदार भी बेहद लोकप्रिय था। 8 जुलाई 2020 को मुंबई में उनका निधन हुआ। उनके बेटे जावेद जाफरी और नावेद जाफरी आज भी बॉलीवुड में काम कर रहे हैं।
