Gautam Adani मामला अमेरिकी अदालत: अमेरिकी जज ने DOJ से पूछा- किस आधार पर वापस लिए आपराधिक आरोप? जानें पूरा विवाद और कॉर्पोरेट जगत पर इसका असर

Published on: 27-06-2026
अमेरिकी अदालत में गौतम अडानी मामले की सुनवाई का सांकेतिक चित्र

न्यूयॉर्क/नई दिल्ली – Gautam Adani मामला अमेरिकी अदालत में एक बार फिर चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है, जिसने वैश्विक कॉर्पोरेट और कानूनी जगत में हलचल तेज कर दी है। अमेरिका की एक संघीय अदालत ने बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice – DOJ) को आदेश दिया है कि वह भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को अचानक वापस लेने के अपने फैसले को सही साबित करे। न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित अमेरिकी जिला न्यायाधीश (US District Judge) निकोलस गराफिस ने अडानी के वकीलों की उस याचिका पर तुरंत फैसला सुनाने से इनकार कर दिया, जिसमें मामले को पूरी तरह और औपचारिक रूप से खारिज करने की मांग की गई थी। अदालत का यह कड़ा रुख ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग लगातार हाई-प्रोफाइल मामलों को बंद करने का प्रयास कर रहा है।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार द्वारा मामले को बंद करने के लिए दिया गया तर्क “अस्पष्ट, साधारण और बिना किसी ठोस निष्कर्ष वाला” है। जज गराफिस ने न्याय विभाग को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और प्रत्येक कारण का विस्तृत ब्यौरा देने के लिए 13 जुलाई 2026 तक का समय दिया है। इस न्यायिक हस्तक्षेप ने भारत और अमेरिका के बीच कॉर्पोरेट पारदर्शिता और द्विपक्षीय कानूनी संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

यह मामला केवल एक कारोबारी समूह तक सीमित नहीं है। इसके साथ अमेरिका की न्याय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय निवेश, कॉरपोरेट प्रशासन और सीमा पार कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। इसी कारण दुनिया भर के निवेशकों, कानूनी विशेषज्ञों और वित्तीय बाजारों की नजर इस मामले पर बनी हुई है।

अमेरिकी अदालत में क्या हुआ?

अमेरिकी न्याय विभाग और संघीय अदालत का प्रतीकात्मक चित्र

अमेरिका के संघीय न्यायालय में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने अमेरिकी न्याय विभाग से कहा कि यदि सरकार इस मामले को वापस लेना चाहती है तो उसे अदालत के सामने इसका स्पष्ट आधार रखना होगा। अदालत ने तत्काल मामले को समाप्त करने से इनकार करते हुए DOJ को विस्तृत स्पष्टीकरण दाखिल करने का निर्देश दिया।

अदालत का कहना था कि किसी भी आपराधिक मुकदमे को वापस लेने के लिए केवल प्रशासनिक निर्णय पर्याप्त नहीं माना जा सकता। न्यायालय को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि मामला वापस लेने का निर्णय कानून के अनुरूप और न्यायहित में है।

इसी कारण न्यायाधीश ने DOJ से अतिरिक्त जानकारी मांगी और मामले पर आगे की सुनवाई तय की।

जज निकोलस गराफिस का कड़ा रुख: “सिर्फ प्रशासनिक इच्छा काफी नहीं”

अमेरिकी जिला अदालत के जज निकोलस गराफिस ने शुक्रवार, 26 जून 2026 को दिए अपने आदेश में साफ किया कि न्याय विभाग केवल अपनी मर्जी से इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी के मुकदमे को बंद नहीं कर सकता। संघीय आपराधिक प्रक्रिया के नियम 48(ए) (Rule 48(a) of the Federal Rules of Criminal Procedure) का हवाला देते हुए जज ने कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह किसी भी आरोपपत्र (Indictment) को वापस लेने के पीछे के ठोस कानूनी और तथ्यात्मक कारणों को अदालत के सामने रखे।

जज ने अपने आदेश में लिखा:

“यहाँ सरकार का संक्षिप्त और बिना ठोस आधार वाला बयान अदालत को न तो किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का पर्याप्त आधार देता है, और न ही अदालत को सरकार के इस अनुरोध का विश्लेषण करने का अवसर देता है।”

न्यायाधीश ने आगे कहा कि अतिरिक्त जानकारी के बिना अदालत स्वतंत्र रूप से अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकती। इसलिए, जब तक न्याय विभाग 13 जुलाई तक अपनी लिखित दलीलें पेश नहीं करता, तब तक गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और विनीत जैन समेत सभी आठ आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामले आधिकारिक रूप से लंबित (Pending) रहेंगे।

क्या है पूरा मामला? 250 मिलियन डॉलर की कथित रिश्वतखोरी का विवाद

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2024 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल के आखिरी महीनों में हुई थी। अमेरिकी अभियोजकों ने न्यूयॉर्क की अदालत में गौतम अडानी और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए थे।

  • मुख्य आरोप: आरोप था कि अडानी समूह की सहायक कंपनी ‘अडाणी ग्रीन एनर्जी’ को भारत में एक विशाल 12-गीगावाट सौर ऊर्जा परियोजना (Solar Energy Project) के लिए सरकारी मंजूरी दिलाने के उद्देश्य से भारतीय अधिकारियों को लगभग 250 मिलियन डॉलर (करीब 2,100 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने की योजना बनाई गई थी।
  • निवेशकों को गुमराह करने का दावा: अमेरिकी कानून के तहत आरोप लगाया गया कि अडाणी समूह ने अमेरिकी निवेशकों से पूंजी (फंड) जुटाने के दौरान अपनी कंपनी की भ्रष्टाचार-विरोधी नीतियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और इस कथित रिश्वतखोरी की बात को छुपाया, जो कि सिक्योरिटीज और वायर फ्रॉड (Securities and Wire Fraud) के दायरे में आता है।
  • अडानी समूह का पक्ष: शुरुआत से ही अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है और किसी भी तरह की गलत गतिविधि या रिश्वतखोरी में शामिल होने से इनकार किया है।

ट्रंप प्रशासन का कदम और वकीलों की दलीलें

डोनाल्ड ट्रंप सरकार के आने के बाद, 18 मई 2026 को अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत में एक संक्षिप्त अर्जी दाखिल की थी। इसमें वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा था कि विभाग अपने “अभियोगात्मक विवेक” (Prosecutorial Discretion) का इस्तेमाल करते हुए इस व्यक्तिगत आपराधिक मामले में और अधिक सरकारी संसाधन या समय खर्च नहीं करना चाहता। हालांकि, इस अर्जी पर उन करियर प्रॉसिक्यूटर्स (मूल जांच अधिकारियों) के हस्ताक्षर नहीं थे जिन्होंने मामले की शुरुआत की थी।

इसके बाद, 24 जून 2026 को गौतम अडानी के मुख्य वकील रॉबर्ट गिउफ्रा (Robert Giuffra) ने जज को पत्र लिखकर मामले को तुरंत बंद करने की अपील की। वकीलों का तर्क था कि:

  1. कथित घटनाक्रम भारतीय जमीन पर हुआ था, इसलिए यह अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर है।
  2. अमेरिकी अभियोजक भारत में किसी भी प्रकार की रिश्वतखोरी को साबित करने में असमर्थ रहेंगे।
  3. अडानी समूह की टीम ने DOJ के अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें कीं और लगभग 500 पन्नों के दस्तावेज सौंपकर यह साबित किया कि इस चार्जशीट में गंभीर कानूनी और तथ्यात्मक कमियां हैं।

सिविल मामलों में समझौते: SEC और ट्रेजरी विभाग के साथ डील

भले ही आपराधिक मामले पर अदालत ने रोक लगा दी हो, लेकिन इसी विवाद से जुड़े अन्य दीवानी (Civil) मामलों में अडानी समूह ने अमेरिकी नियामकों के साथ समझौते कर लिए हैं:

विभाग / नियामकसमझौते का प्रकारभुगतान की गई / तय राशिकारण
US SEC (Securities & Exchange Commission)दीवानी समझौता (Proposed Civil Settlement)गौतम अडानी: $6 मिलियन (~₹51 करोड़)
सागर अडानी: $12 मिलियन (~₹102 करोड़)
सोलर प्रोजेक्ट से जुड़े निवेशकों को गुमराह करने के दीवानी आरोप।
US Treasury Department (अमेरिकी ट्रेजरी)दीवानी निपटाराअडाणी एंटरप्राइजेज: $275 मिलियन (~₹2,656 करोड़)ईरानी मूल के लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) आयात से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन का आरोप।

(नोट: SEC के साथ हुए इस प्रस्तावित दीवानी समझौते को भी अभी अदालत की अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है।)

भारत-अमेरिका कॉर्पोरेट और कानूनी संबंधों पर असर

भारत और अमेरिका के झंडों के साथ व्यापार का सांकेतिक चित्र

इस मामले में अमेरिकी अदालत के हालिया रुख का असर भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक और राजनयिक स्तर पर भी देखा जा रहा है:

  • कॉर्पोरेट पारदर्शिता और गवर्नेंस: अमेरिकी अदालतों द्वारा दिखाई जा रही यह सख्ती यह संदेश देती है कि अमेरिकी वित्तीय बाजारों (Wall Street) से फंड जुटाने वाली विदेशी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों और पारदर्शिता का कड़ाई से पालन करना होगा।
  • निवेशकों का भरोसा: अडानी समूह के शेयरों में पिछले दिनों अमेरिकी न्याय विभाग के पीछे हटने की खबरों से जो बड़ी तेजी आई थी, वह इस न्यायिक आदेश के बाद थोड़ी सतर्कता में बदल सकती है। भारतीय और विदेशी निवेशक अब 13 जुलाई की समयसीमा पर नजरें गड़ाए हुए हैं।
  • न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका: यह मामला अमेरिका के भीतर इस बात का भी उदाहरण बन गया है कि सरकार (ट्रंप प्रशासन) भले ही केस बंद करना चाहे, लेकिन अमेरिकी न्यायपालिका (Judiciary) स्वतंत्र रूप से काम करते हुए हर कदम का पूरा हिसाब मांग सकती है।

अमेरिकी कानून में केस वापस लेने की प्रक्रिया कैसे होती है?

अमेरिका में किसी संघीय आपराधिक मामले को वापस लेने के लिए केवल अभियोजन एजेंसी की इच्छा पर्याप्त नहीं होती। यदि DOJ अदालत के समक्ष अभियोग हटाने या मामला समाप्त करने का अनुरोध करता है, तो न्यायालय उस अनुरोध की समीक्षा करता है।

न्यायाधीश यह देखते हैं कि अभियोजन वापस लेने का निर्णय न्यायहित में है या नहीं। अदालत यह भी सुनिश्चित करती है कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनी रहे।

इसी कारण इस मामले में भी अदालत ने कहा कि वह केवल औपचारिक अनुरोध के आधार पर आदेश पारित नहीं करेगी।

DOJ को अब क्या करना होगा?

अमेरिकी न्याय विभाग को अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि—

  • मामला वापस लेने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।
  • उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी स्थिति का मूल्यांकन किस प्रकार किया गया।
  • सार्वजनिक हित को किस प्रकार ध्यान में रखा गया।
  • अभियोजन समाप्त करने का निर्णय किन कानूनी प्रावधानों के आधार पर लिया गया।

इसके बाद अदालत सभी दस्तावेजों और तर्कों का अध्ययन करेगी और फिर अगला आदेश पारित करेगी।

अडानी समूह का आधिकारिक रुख

भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी का फाइल फोटो

अडानी समूह पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुका है कि वह अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से सहमत नहीं है और उन्हें निराधार मानता है।

समूह का यह भी कहना रहा है कि वह सभी लागू कानूनों का पालन करता है और किसी भी कानूनी प्रक्रिया में पूरा सहयोग देगा। कंपनी ने समय-समय पर अपने निवेशकों को जारी आधिकारिक बयानों में भी यही रुख दोहराया है।

अब इस मामले में आगे जो भी आधिकारिक प्रतिक्रिया आएगी, वह अदालत में दाखिल दस्तावेजों और कंपनी के अधिकृत बयानों के माध्यम से सामने आएगी।

आगे की कानूनी प्रक्रिया

अब अगला महत्वपूर्ण कदम अमेरिकी न्याय विभाग का विस्तृत जवाब होगा।

उसके बाद अदालत—

  • DOJ द्वारा दिए गए कारणों की समीक्षा करेगी।
  • यदि आवश्यक हुआ तो अतिरिक्त सुनवाई भी कर सकती है।
  • सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अंतिम आदेश पारित करेगी।

जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक यह कहना सही नहीं होगा कि मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है।

विशेषज्ञों की सामान्य राय

कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि संघीय अदालतों द्वारा अभियोजन एजेंसी से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगना अमेरिकी न्याय व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, विशेषकर तब जब मामला सार्वजनिक महत्व का हो।

वहीं बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को अफवाहों की बजाय केवल आधिकारिक अदालती आदेश, नियामकीय फाइलिंग और कंपनी के अधिकृत बयानों पर भरोसा करना चाहिए।

अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं सभी की नजर

गौतम अडानी से जुड़े इस मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अमेरिकी संघीय अदालत ने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत ने केवल अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वह आपराधिक मामला वापस लेने की अनुमति क्यों चाहता है। इसलिए इस समय यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है या किसी भी पक्ष को कानूनी राहत मिल चुकी है।

आने वाले दिनों में DOJ अपना विस्तृत जवाब अदालत में दाखिल करेगा। इसके बाद न्यायाधीश उस जवाब, उपलब्ध रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों का अध्ययन करेंगे। यदि आवश्यक हुआ तो आगे की सुनवाई भी हो सकती है। इसके बाद ही अदालत यह तय करेगी कि अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी जाए या नहीं।

यह मामला केवल एक उद्योगपति या एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया, अभियोजन एजेंसियों की भूमिका, अदालत की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय निवेश से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को भी सामने लाता है। यही कारण है कि भारत सहित दुनिया के कई देशों के निवेशक, कानूनी विशेषज्ञ और वित्तीय बाजार इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

जब तक अदालत का अंतिम आदेश सामने नहीं आता, तब तक केवल आधिकारिक न्यायिक दस्तावेजों, नियामकीय सूचनाओं और अधिकृत बयानों को ही तथ्य माना जाना चाहिए। किसी भी अपुष्ट दावे या सोशल मीडिया पर प्रसारित जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: गौतम अडानी मामला क्या है?

उत्तर: यह अमेरिका में चल रही एक कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा मामला है, जिसमें अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने अदालत से आपराधिक मामला वापस लेने की अनुमति मांगी है। फिलहाल अदालत ने DOJ से इस निर्णय का विस्तृत आधार बताने को कहा है। अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।

प्रश्न 2: अमेरिकी अदालत ने DOJ से क्या पूछा है?

उत्तर: अदालत ने पूछा है कि यदि सरकार मामला वापस लेना चाहती है, तो उसके पीछे कानूनी और तथ्यात्मक आधार क्या हैं। अदालत ने कहा है कि केवल आवेदन देना पर्याप्त नहीं है और उसे संतोषजनक कारण भी प्रस्तुत करने होंगे।

प्रश्न 3: अमेरिकी जज ने गौतम अडानी के आपराधिक मामले को तुरंत खारिज क्यों नहीं किया?

उत्तर: न्यायाधीश निकोलस गराफिस का मानना है कि अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने मामले को बंद करने के लिए जो आवेदन दिया था, उसमें ठोस कानूनी कारण और तथ्य नहीं लिखे थे। अमेरिकी कानून के नियम 48(ए) के तहत, किसी भी चल रहे आपराधिक मामले को वापस लेने के लिए अदालत की संतुष्टि आवश्यक है। सिर्फ यह कह देना कि “हम संसाधन खर्च नहीं करना चाहते”, अदालत की नजर में पर्याप्त नहीं है।

प्रश्न 4: अब इस मामले में अगली महत्वपूर्ण तारीख कौन सी है?

उत्तर: अमेरिकी अदालत ने न्याय विभाग (DOJ) को 13 जुलाई 2026 तक का समय दिया है। इस तारीख तक अभियोजकों को लिखित में यह बताना होगा कि वे किस ठोस आधार पर गौतम अडानी और अन्य के खिलाफ मामले को छोड़ना चाहते हैं।

प्रश्न 5: क्या गौतम अडानी पर लगे सिविल (दीवानी) मामले भी बंद हो गए हैं?

उत्तर: नहीं, दीवानी मामलों में समझौते की प्रक्रिया चल रही है। अमेरिकी बाजार नियामक SEC के साथ एक प्रस्तावित समझौता हुआ है जिसके तहत गौतम अडानी $6 मिलियन और सागर अडानी $12 मिलियन का भुगतान करने पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा, अडाणी एंटरप्राइजेज ईरान प्रतिबंधों के उल्लंघन से जुड़े मामले को सुलझाने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी को $275 मिलियन देने पर सहमत हुई है।

प्रश्न 6: इस कानूनी विवाद का अडानी समूह के बिजनेस पर क्या प्रभाव पड़ा है?

उत्तर: साल 2024 में जब ये आरोप लगे थे, तब समूह की कंपनियों के मार्केट कैप में भारी गिरावट आई थी और विदेशी फंडिंग जुटाने में दिक्कतें आई थीं। हालांकि, मई 2026 में न्याय विभाग द्वारा केस वापस लेने की अर्जी के बाद शेयरों में भारी सुधार देखा गया था। मौजूदा अदालती आदेश से अस्थाई रूप से बाजार में थोड़ी सतर्कता आ सकती है, लेकिन अंतिम फैसला आने तक व्यापारिक परिचालन सामान्य रहने की उम्मीद है।

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