सरकार की मंशा पर उठ रहे सवाल
राजस्थान- केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए 8वें वेतन आयोग की घोषणा के बावजूद प्रक्रिया में हो रही देरी से नाराज़गी बढ़ती जा रही है। आयोग के गठन की अधिसूचना जारी होने के बाद भी चेयरमैन, सदस्यों और Terms of Reference (ToR) का अभी तक फैसला नहीं हो पाया है, जिससे कर्मचारी संगठनों में आशंका पैदा हो गई है कि वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी का लाभ समय पर नहीं मिल पाएगा।
राजस्थान शिक्षक संघ सियाराम के प्रदेश शैक्षिक प्रकोष्ठ सह सचिव अरुण व्यास ने बताया कि पिछले हर दशक में वेतन आयोग गठित कर कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखा गया, लेकिन इस बार सरकार ने केवल अधिसूचना जारी करके ही कामकाजी प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। उन्होंने कहा, “कर्मचारियों के संगठनों से वार्ता, ज्ञापन प्रक्रिया और नियमित बैठकें अभी तक शुरू नहीं हुई हैं। इस अनावश्यक देरी से कर्मचारियों में आशंकाएं बढ़ रही हैं, जिसका फायदा विपक्षी दल उठा सकते हैं।”
क्या होगा फिटमेंट फैक्टर का आंकड़ा?
वेतन बढ़ोतरी में सबसे अहम भूमिका फिटमेंट फैक्टर की होती है, जो एक मल्टीप्लायर के तौर पर बेसिक पे को गुणा कर नया वेतन तय करता है। 7वें वेतन आयोग में यह 2.57 था, जिससे न्यूनतम वेतन 7,000 रुपये से बढ़कर 18,000 रुपये हो गया था। इस बार फिटमेंट फैक्टर 1.83 से 2.57 के बीच रहने की संभावना है। अगर यह 2.57 हुआ, तो कर्मचारियों और पेंशनर्स को 30-34% तक की बढ़ोतरी मिल सकती है।
सरकारी पेंशनर्स की संख्या कर्मचारियों से भी अधिक है, लेकिन उन्हें एचआरए और ट्रैवल अलाउंस जैसे लाभ नहीं मिलते। हालांकि, अप्रैल 2025 से लागू नए Unified Pension Scheme के तहत रिटायरमेंट के बाद कम से कम 50% बेसिक वेतन की गारंटी दी गई है। अरुण व्यास ने मांग की कि पेंशनर्स को भी महंगाई भत्ता और एचआरए दिया जाए, ताकि उनका जीवन स्तर सुधर सके।
क्या 2026 की जगह 2027 तक खिंचेगा इंतजार?
आयोग के कामकाज में देरी से अंदेशा जताया जा रहा है कि कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन और एरियर 2026 के बजाय 2027 में मिल पाएगा। सरकार चुनावी वादों, कल्याण योजनाओं और राजकोषीय घाटे को संतुलित करने में व्यस्त है, जिससे वेतन बढ़ोतरी की प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
केंद्र सरकार के विपरीत, राजस्थान सरकार अक्सर वेतन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू नहीं करती। अरुण व्यास ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार बजटीय कमी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के वेतन में अनावश्यक कटौती करती है, जिससे केंद्रीय और राज्य कर्मचारियों के बीच सुविधाओं का अंतर बढ़ता जा रहा है।
केंद्रीय कर्मचारी संगठन सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। राजस्थान के कर्मचारी भी पेंशनर्स को लाभ दिलाने और कटौतियों को रोकने के लिए एकजुट हो रहे हैं। अगर सरकार ने जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो यह आक्रोश और बढ़ सकता है।
8वें वेतन आयोग से कर्मचारियों और पेंशनर्स की उम्मीदें बहुत अधिक हैं, लेकिन प्रक्रिया में हो रही देरी और सरकार के रवैये से उनकी नाराज़गी बढ़ती जा रही है। अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेगी या फिर कर्मचारी संगठनों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा?
वेतन आयोग का महत्व
वेतन आयोग का मुख्य उद्देश्य केंद्रीय कर्मचारियों के वेतनमानों, भत्तों और पेंशन में बदलाव की सिफारिश करना है. इन सिफारिशों के लागू होने से कर्मचारियों के वेतन में समय-समय पर वृद्धि होती है। वेतन आयोग मुद्रास्फीति (महंगाई) को ध्यान में रखकर कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में संशोधन की सिफारिश करता है, ताकि उनकी क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) बनी रहे। वेतन आयोग की सिफारिशें सभी केंद्रीय कर्मचारियों के लिए समान रूप से लागू होती हैं, जिससे वेतन संरचना में समानता और पारदर्शिता आती है।
भारत के वेतन आयोगों का इतिहास: पहले से सातवें आयोग तक की पूरी कहानी
भारत में वेतन आयोगों की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद हुई थी।
पहला वेतन आयोग (मई 1946 – मई 1947) की अध्यक्षता श्रीनिवास वरदाचारिया ने की थी। इस आयोग का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद के भारत में वेतन संरचना को तर्कसंगत बनाना था। इसने “जीवनयापन मजदूरी” (लिविंग वेज) की अवधारणा पेश की और न्यूनतम वेतन 55 रुपये प्रति माह तथा अधिकतम वेतन 2,000 रुपये प्रति माह तय किया। इससे लगभग 1.5 मिलियन कर्मचारियों को लाभ हुआ।
दूसरा वेतन आयोग (अगस्त 1957 – अगस्त 1959) जगन्नाथ दास की अध्यक्षता में गठित किया गया। इस आयोग ने अर्थव्यवस्था और जीवनयापन लागत के बीच संतुलन बनाने पर ध्यान दिया। इसने न्यूनतम वेतन 80 रुपये प्रति माह की सिफारिश की और ‘समाजवादी पैटर्न ऑफ सोसाइटी’ की अवधारणा को बढ़ावा दिया। इस आयोग से लगभग 2.5 मिलियन कर्मचारियों को फायदा हुआ।
तीसरा वेतन आयोग (अप्रैल 1970 – मार्च 1973) की अध्यक्षता रघुबीर दयाल ने की। इस आयोग ने न्यूनतम वेतन 185 रुपये प्रति माह की सिफारिश की और सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के बीच वेतन समानता पर जोर दिया। इसने वेतन संरचना में असमानताओं को दूर करने का प्रयास किया और लगभग 3 मिलियन कर्मचारियों को लाभ पहुंचाया।
चौथा वेतन आयोग (सितंबर 1983 – दिसंबर 1986) पी.एन. सिंघल की अध्यक्षता में गठित हुआ। इसने न्यूनतम वेतन 750 रुपये प्रति माह की सिफारिश की और विभिन्न पदों के बीच वेतन असमानताओं को कम करने पर ध्यान दिया। इस आयोग ने प्रदर्शन-आधारित वेतन संरचना को भी पेश किया, जिससे 3.5 मिलियन से अधिक कर्मचारियों को लाभ मिला।
पांचवां वेतन आयोग (अप्रैल 1994 – जनवरी 1997) न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन की अध्यक्षता में गठित किया गया। इसने न्यूनतम वेतन 2,550 रुपये प्रति माह की सिफारिश की और वेतन स्केल की संख्या को कम करने का सुझाव दिया। साथ ही, इसने सरकारी कार्यालयों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया। इस आयोग से लगभग 4 मिलियन कर्मचारियों को फायदा हुआ।
छठा वेतन आयोग (अक्टूबर 2006 – मार्च 2008) न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में गठित किया गया। इस आयोग ने पे बैंड और ग्रेड पे की अवधारणा को पेश किया। न्यूनतम वेतन 7,000 रुपये प्रति माह और अधिकतम वेतन 80,000 रुपये प्रति माह तय किया गया। इसने प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन पर भी जोर दिया और लगभग 6 मिलियन कर्मचारियों को लाभ पहुंचाया।
सातवां वेतन आयोग (फरवरी 2014 – नवंबर 2016) न्यायमूर्ति ए.के. माथुर की अध्यक्षता में गठित हुआ। इसने न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह और अधिकतम वेतन 2,50,000 रुपये प्रति माह की सिफारिश की। इस आयोग ने ग्रेड पे सिस्टम के बजाय एक नई पे मैट्रिक्स प्रणाली को पेश किया और भत्तों तथा कार्य-जीवन संतुलन पर ध्यान दिया। इससे 10 मिलियन से अधिक कर्मचारियों और पेंशनधारकों को लाभ हुआ।
8वें वेतन आयोग की घोषणा 16 जनवरी 2025 को की गई। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह आयोग कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए कितनी बड़ी राहत लेकर आएगा।
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