Environment – कल्पना कीजिए, आप सुपरमार्केट में खरीदारी कर रहे हैं। शेल्फ पर चमचमाती पैकेजिंग वाली एक बोतल पकड़ते हैं – लेबल पर लिखा है “प्लास्टिक-फ्री”, “इको-फ्रेंडली” और “सस्टेनेबल”। हरा-भरा लोगो, पेड़ों की तस्वीरें और वादा कि यह उत्पाद पर्यावरण को बचाएगा। आप खुश होकर इसे कार्ट में डाल लेते हैं, सोचते हुए कि आप क्लाइमेट चेंज के खिलाफ एक कदम बढ़ा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह पैकेजिंग अंदर से प्लास्टिक से भरी हो सकती है? जी हां, यह “ग्रीनवॉशिंग” का जाल है – जहां ब्रांड्स पर्यावरणीय दावों के जरिए उपभोक्ताओं को धोखा देते हैं।
2025 में, जब क्लाइमेट अवेयरनेस चरम पर है और युवा एक्टिविस्ट सड़कों पर उतर रहे हैं, तब भी ब्रांड्स के ये झूठे वादे जारी हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक हालिया स्टडी के अनुसार, 2024 में भारत में बिकने वाले 60% “इको-फ्रेंडली” उत्पादों में औसतन 40% छिपा हुआ प्लास्टिक पाया गया। वहीं, मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज (MoEFCC) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत हर साल लगभग 41.36 लाख टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा करता है, जो नदियों, समुद्रों और मिट्टी को जहर बना रहा है। यह आंकड़ा 2022 के 1.5 करोड़ टन के अनुमान से भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि रिसाइक्लिंग की दर मात्र 9% है।
यह लेख इसी धोखे की परतें उधेड़ेगा – एनजीओ रिपोर्ट्स, कंज्यूमर टेस्ट्स और सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स के जरिए। हम देखेंगे कि कैसे ब्रांड्स “ग्रीन” पैकेजिंग के पीछे प्लास्टिक छिपा रहे हैं, और युवा एक्टिविज्म के दौर में हम इसे कैसे रोक सकते हैं। यह ट्रेंडिंग टॉपिक इसलिए कामयाब होगा क्योंकि आज की जनरेशन प्लास्टिक पॉल्यूशन को नजरअंदाज नहीं कर सकती। आइए, सच्चाई का सामना करें।

ग्रीनवॉशिंग: पर्यावरण का बाजारू चालबाजी
ग्रीनवॉशिंग कोई नई चीज नहीं है, लेकिन प्लास्टिक-फ्री प्रॉमिस के संदर्भ में यह घातक हो गया है। ग्रीनवॉशिंग का मतलब है पर्यावरणीय लाभों का झूठा दावा करना, बिना किसी वास्तविक बदलाव के। ब्रांड्स पैकेजिंग पर “बायोडिग्रेडेबल”, “रिक्लेमेबल” या “प्लास्टिक-फ्री” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अंदर की हकीकत कुछ और होती है। उदाहरण के लिए, बायो-प्लास्टिक्स जो पेट्रोलियम-बेस्ड होते हैं और सही कंडीशंस में ही डिग्रेड होते हैं – जो घरेलू कचरा डंप में उपलब्ध नहीं।
चेंजिंग मार्केट्स फाउंडेशन की 2022 रिपोर्ट “ग्रीनवॉश.कॉम” में 20 से ज्यादा ब्रांड्स को एक्सपोज किया गया, जहां पैकेजिंग क्लेम्स “मिसलीडिंग एंड मेंडेशियस” पाई गईं। रिपोर्ट कहती है कि ब्रांड्स रिसाइक्लिंग को प्रमोट करते हैं, लेकिन वास्तव में मात्र 15% कंपनियां अपने रिसाइक्लेबिलिटी गोल्स को पूरा कर पा रही हैं। भारत में, ई-कॉमर्स के उदय से पैकेजिंग प्लास्टिक वेस्ट 2024 में दोगुना हो गया, जैसा कि साइंसडायरेक्ट की एक स्टडी में उल्लेख है।
यह धोखा उपभोक्ताओं को गुमराह करता है। एक सर्वे में पाया गया कि 70% कंज्यूमर्स “पेपर-रैप्ड” पैकेजिंग को प्लास्टिक से ज्यादा इको-फ्रेंडली मानते हैं, भले ही अंदर प्लास्टिक लेयर हो। यह मनोवैज्ञानिक ट्रिक है – हरा रंग और प्रकृति के इमेजेस ब्रेन को कन्विंस कर देते हैं। लेकिन परिणाम? बढ़ता प्लास्टिक पॉल्यूशन, जो माइक्रोप्लास्टिक्स के रूप में फूड चेन में घुस जाता है।
एनजीओ रिपोर्ट्स: सच्चाई की आवाज
एनजीओज ब्रांड्स के इन झूठों को बेनकाब करने में अग्रणी हैं। ब्रेक फ्री फ्रॉम प्लास्टिक की 2022 ब्रांड ऑडिट रिपोर्ट में नेस्ले, कोका-कोला और पेप्सी को टॉप प्लास्टिक पॉल्यूटर्स में नामित किया गया। भारत में 14,760 वॉलंटियर्स ने 30 देशों से 4,149 प्लास्टिक आइटम्स कलेक्ट किए, जिनमें नेस्ले का शेयर सबसे ज्यादा था। रिपोर्ट कहती है कि ये ब्रांड्स “सस्टेनेबल पैकेजिंग” का दावा करते हैं, लेकिन रीयलिटी में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर निर्भर हैं।

CSE की “अनपैकिंग ईपीआर फॉर प्लास्टिक पैकेजिंग इन इंडिया” रिपोर्ट (2024) में कहा गया कि भारत के प्लास्टिक पॉलिसीज रिसाइक्लेबल मटेरियल्स को प्रमोट करते हैं, लेकिन एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) के तहत कंपनियां जिम्मेदारी से बच रही हैं। रिपोर्ट अनुमान लगाती है कि 2024 में 220 मिलियन टन प्लास्टिक वेस्ट जेनरेट होगा, जिसमें से 70 मिलियन टन पर्यावरण में पहुंचेगा। हालांकि, यह ग्लोबल फिगर लगता है; भारत के लिए CSE ने 3.5 मिलियन टन का आंकड़ा दिया है।
ग्रीनपीस की रिपोर्ट्स भी ब्रांड्स को निशाना बनाती हैं। 2022 में, ग्रीनपीस ने नेस्ले को प्लास्टिक वेस्ट रिटर्न करके ग्रीनवॉशिंग का आरोप लगाया। रिपोर्ट में पाया गया कि नेस्ले की “प्लास्टिक-फ्री” क्लेम्स 60% मामलों में फेल हो जाती हैं, क्योंकि पैकेजिंग में हिडन पॉलीथीन लेयर्स होती हैं। ये रिपोर्ट्स साबित करती हैं कि ब्रांड्स प्रॉफिट के लिए पर्यावरण को बलि चढ़ा रहे हैं।
कंज्यूमर टेस्ट्स: छिपे प्लास्टिक का खुलासा
कंज्यूमर टेस्ट्स ग्रीनवॉशिंग की सच्चाई सामने लाते हैं। कंज्यूमर रिपोर्ट्स (CR) की 2024 स्टडी में 85 सुपरमार्केट फूड्स टेस्ट किए गए, जिनमें 84 में प्लास्टिकाइजर्स जैसे बिस्फेनॉल्स और फ्थैलेट्स पाए गए। ये केमिकल्स पैकेजिंग से फूड में लीक हो जाते हैं, जो हेल्थ रिस्क्स जैसे लिवर डैमेज और मेटाबॉलिक इश्यूज पैदा करते हैं। रिपोर्ट कहती है कि “इको-फ्रेंडली” लेबल वाले प्रोडक्ट्स में भी ये छिपे खतरे मौजूद हैं।
भारत में, एक रिसर्चगेट स्टडी (2023) ने सस्टेनेबल पैकेजिंग के एस्थेटिक्स पर फोकस किया। टेस्ट में पाया गया कि उपभोक्ता पेपर-बेस्ड पैकेजिंग को प्रेफर करते हैं, लेकिन 50% मामलों में अंदर रिसाइक्ल्ड प्लास्टिक होता है, जो 100 से ज्यादा टॉक्सिक केमिकल्स छिपाए रखता है। एक अन्य स्टडी में जर्मनी के कंपोस्ट सैंपल्स में 900 माइक्रोप्लास्टिक पीसेज पाए गए, जो सुपरमार्केट वेस्ट से आते हैं। भारत के संदर्भ में, ई-कॉमर्स पैकेजिंग में प्लास्टिक की समस्या बढ़ गई है – 2024 में यह सेक्टर प्लास्टिक वेस्ट का 20% हिस्सा बन गया।

ये टेस्ट्स बताते हैं कि “प्लास्टिक-फ्री” क्लेम अक्सर बायो-प्लास्टिक्स पर टिका होता है, जो गट माइक्रोबायोम को डिस्टर्ब करते हैं। उपभोक्ताओं को सलाह: लेबल्स पढ़ें, थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन्स जैसे FSC या GRS चेक करें।
भारत का प्लास्टिक संकट: आंकड़ों की मार
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा प्लास्टिक कंज्यूमर है। MoEFCC के 2024 एनुअल रिपोर्ट के अनुसार, देश 41.36 लाख टन प्लास्टिक वेस्ट जेनरेट करता है, जिसमें तमिलनाडु सबसे बड़ा पॉल्यूटर है। यह वेस्ट नदियों में बहकर गंगा-यमुना को प्रदूषित करता है, जहां मछलियां और मनुष्य दोनों प्रभावित होते हैं। 2024 तक, रिसाइक्लिंग रेट मात्र 9% है, बाकी लैंडफिल्स या ओपन बर्निंग में जाता है।
CSE की स्टडीज से पता चलता है कि “इको-फ्रेंडली” प्रोडक्ट्स में छिपा प्लास्टिक वेस्ट को 40% बढ़ा रहा है। नतीजा? माइक्रोप्लास्टिक्स फूड चेन में घुसकर कैंसर और हार्मोनल डिसरप्शन का खतरा बढ़ा रहे हैं। युवा एक्टिविस्ट्स जैसे फ्राइडेज फॉर फ्यूचर इंडिया इस मुद्दे पर कैंपेन चला रहे हैं, लेकिन ब्रांड्स की लॉबी मजबूत है।
ब्रांड्स के उदाहरण: धोखे के चेहरे
नेस्ले, H&M और कोका-कोला जैसे ब्रांड्स प्रमुख आरोपी हैं। ब्रेक फ्री फ्रॉम प्लास्टिक की रिपोर्ट में नेस्ले चौथे नंबर पर है, जहां “प्लास्टिक-फ्री बाय 2025” का वादा किया गया, लेकिन 2024 में भी सिंगल-यूज पैकेजिंग जारी है। H&M पर चेंजिंग मार्केट्स ने आरोप लगाया कि 60% सस्टेनेबल क्लेम्स झूठे हैं – उनके “ग्रीन” बैग्स में प्लास्टिक लाइनिंग होती है।
भारतीय ब्रांड्स जैसे अमूल और पतंजलि भी पीछे नहीं। CSE की रिपोर्ट में पाया गया कि उनके “नेचुरल” प्रोडक्ट्स में रिसाइक्ल्ड प्लास्टिक यूज होता है, जो टॉक्सिन्स छिपाता है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि ग्रीनवॉशिंग ग्लोबल समस्या है।
सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स: सच्चा रास्ता
प्लास्टिक के विकल्प मौजूद हैं। पेपर-बेस्ड पैकेजिंग, ग्लास कंटेनर्स और बांस से बने प्रोडक्ट्स पॉपुलर हो रहे हैं। पैकेजिंग यूरोप की 2025 रिपोर्ट में कहा गया कि कंपोस्टेबल पैकेजिंग और रिसाइक्ल्ड ग्लास भारत में ट्रैक्शन गेन कर रहे हैं। उदाहरण: सोय वैक्स पेपर, जो बायोडिग्रेडेबल है।

एडिबल पैकेजिंग – खाने योग्य फिल्म्स – एक क्रांति है। पबमेड स्टडी (2024) कहती है कि ये फूड वेस्ट कम करते हैं। भारत में स्टार्टअप्स जैसे अवेनेस्ट बांस और कोकोनट शेल्स से पैकेजिंग बना रहे हैं। गाय के गोबर से बने प्रोडक्ट्स भी इको-फ्रेंडली हैं। लेकिन चुनौतियां हैं – कॉस्ट हाई और स्केलिंग मुश्किल। नीति सपोर्ट से ये अल्टरनेटिव्स मेनस्ट्रीम हो सकते हैं।
युवा एक्टिविज्म: बदलाव की लहर
क्लाइमेट अवेयरनेस के दौर में युवा ब्रांड्स को चैलेंज कर रहे हैं। फ्राइडेज फॉर फ्यूचर और #BanPlastic कैंपेन सोशल मीडिया पर वायरल हैं। उपभोक्ता बॉयकॉट और पेटिशन्स ब्रांड्स को मजबूर कर रहे हैं। टिप्स: ऐप्स जैसे “बीट द माइक्रोप्लास्टिक” यूज करें, लोकल प्रोडक्ट्स चुनें।
जागरूकता ही हथियार
प्लास्टिक-फ्री प्रॉमिस का झूठ अब बेनकाब हो चुका है। एनजीओ रिपोर्ट्स, टेस्ट्स और आंकड़े साफ कहते हैं – ब्रांड्स धोखा दे रहे हैं। लेकिन सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स और युवा पावर से हम बदलाव ला सकते हैं। आज से शुरू करें: लेबल्स पढ़ें, बॉयकॉट करें, वोट दें। पर्यावरण हमारा है – इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी।
FAQs
Q: ग्रीनवॉशिंग क्या है?
A: ग्रीनवॉशिंग वह प्रथा है जहां ब्रांड्स झूठे पर्यावरणीय दावे करते हैं, जैसे ‘प्लास्टिक-फ्री’ क्लेम लेकिन अंदर प्लास्टिक लेयर। भारत में ASCI ने 2025 में 79% ग्रीन क्लेम्स को मिसलीडिंग पाया।
Q: भारत में प्लास्टिक वेस्ट कितना है?
A: 2025 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्लास्टिक पॉल्यूटर है, 9.3 मिलियन टन वार्षिक उत्सर्जन। CSE स्टडी के अनुसार, 60% इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स में 40% छिपा प्लास्टिक।
Q: ब्रांड्स कैसे धोखा देते हैं?
A: नेस्ले और कोका-कोला जैसे ब्रांड्स ‘100% रिसाइक्लेबल’ क्लेम करते हैं, लेकिन मात्र 9% प्लास्टिक रिसाइकल होता है। ग्रीनपीस ने 2025 में इन्हें एक्सपोज किया।
Q: सस्टेनेबल पैकेजिंग के विकल्प क्या हैं?
A: बांस, कंपोस्टेबल पेपर, और रिसाइक्ल्ड ग्लास। 2025 में भारत का इको-पैकेजिंग मार्केट ₹25,000 करोड़ का है, 7-8% CAGR। कंपनियां जैसे The Mend और BioPak लीड कर रही हैं।
Q: ग्रीनवॉशिंग से कैसे बचें?
A: थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन्स (FSC, GRS) चेक करें, लेबल्स पढ़ें, और #PlasticFree कैंपेन जॉइन करें। CCPA की 2025 गाइडलाइन्स कंपनियों को सबूत मांगती हैं।
Q: युवा एक्टिविज्म प्लास्टिक पॉल्यूशन में कैसे मदद कर रहा है?
A: फ्राइडेज फॉर फ्यूचर जैसे ग्रुप्स बॉयकॉट और पेटिशन्स चला रहे हैं। 2025 में सोशल मीडिया पर #BanPlastic वायरल है, ब्रांड्स को चैलेंज कर रहा।
