कोलकाता – TMC का आंतरिक संकट आज पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा विषय बन चुका है। पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। राज्य की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने अस्तित्व की सबसे गंभीर आंतरिक लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से शुरू हुआ TMC का आंतरिक संकट अब पूरी तरह से खुलकर सामने आ गया है। स्थिति इतनी संवेदनशील हो चुकी है कि बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए पश्चिम बंगाल की अपनी सभी सांगठनिक कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।
राजनीतिक गलियारों में इस कदम को पार्टी के भीतर मचे आंतरिक विद्रोह को दबाने और असंतुष्ट विधायकों पर फिर से नियंत्रण पाने की ममता बनर्जी की एक अंतिम कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी तरफ, बागी गुट ने विधानसभा अध्यक्ष के सामने दो-तिहाई बहुमत होने का दावा पेश कर दिया है, जिससे राज्य में ‘महाराष्ट्र मॉडल’ जैसी बगावत की आहट तेज हो गई है।
चुनावी हार के बाद बगावत की आग: क्यों बिखरी तृणमूल कांग्रेस?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की चिंगारी सुलग रही थी। दशक भर से अधिक समय तक राज्य की सत्ता संभालने के बाद इस चुनावी शिकस्त ने पार्टी के भीतर संगठनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया। पूर्व मंत्रियों, मौजूदा विधायकों, प्रवक्ताओं और यहां तक कि सेलिब्रिटी नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से पार्टी के निर्णय लेने की प्रक्रिया और कूटनीति पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
पूर्व क्रिकेटर मनोज तिवारी ने जहां पार्टी के भीतर गुटीय राजनीति के कारण विकास कार्य रुकने के आरोप लगाए, वहीं बैरकपुर के पूर्व विधायक और फिल्म निर्देशक राज चक्रवर्ती ने सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले लिया। संकट तब और गहरा गया जब हुगली के कई पूर्व पदाधिकारियों ने पार्टी फंड के संग्रह को लेकर शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए। इस पराजय ने तृणमूल कांग्रेस को दो स्पष्ट खेमों में बांट दिया—एक खेमा जो ममता बनर्जी के पुराने और वफादार नेताओं का है और दूसरा खेमा जो अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले युवा संगठनात्मक ढांचे से जुड़ा हुआ है। चुनावी विफलता का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ने की इस होड़ ने TMC का आंतरिक संकट को और अधिक हवा दी।
नेता प्रतिपक्ष के चयन पर रार और ‘फर्जी हस्ताक्षर’ का बड़ा विवाद

इस पूरे संकट ने उस समय एक बेहद गंभीर कानूनी और राजनीतिक रूप ले लिया, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) के चयन को लेकर विवाद खड़ा हुआ। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव द्वारा विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथिन बोस को एक पत्र सौंपा गया था, जिसमें शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता, नयना बंद्योपाध्याय और अशिमा पात्रा को उपनेता और फिरहाद हाकिम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) मनोनीत करने का प्रस्ताव था। पार्टी का दावा था कि इस प्रस्ताव पर 70 विधायकों के हस्ताक्षर मौजूद हैं।
परंतु, इस प्रक्रिया में मोड़ तब आया जब दो प्रमुख विधायकों—रितब्रत बनर्जी (उलुबेरिया पुरबा) और संदीपान साहा (एंटली)—ने विधानसभा सचिवालय में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने ऐसे किसी भी प्रस्ताव या बैठक में हिस्सा नहीं लिया था और उनके हस्ताक्षर पूरी तरह से ‘फर्जी’ हैं। इस शिकायत के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ तौर पर चेतावनी दी कि “भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कानून अपना काम करेगा और फर्जी हस्ताक्षर करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।” विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसकी जांच अब राज्य की अपराध जांच एजेंसी (CID) कर रही है। CID ने इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के नंबर दो नेता अभिषेक बनर्जी को भी पूछताछ के लिए तलब किया है, जिससे पार्टी की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं।
59 विधायकों का विद्रोह: क्या बचने जा रहा है ‘महाराष्ट्र मॉडल’?

सोमवार को तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने कड़ा रुख अपनाते हुए बागी रुख अख्तियार करने वाले विधायक रितब्रत बनर्जी और संदीपान साहा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया। लेकिन पार्टी की यह दंडात्मक कार्रवाई असंतोष को दबाने में नाकाम रही, बल्कि इसने आग में घी का काम किया। बुधवार, 3 जून 2026 को यह संकट पूरी तरह से विस्फोट के रूप में सामने आया जब निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में कुल 59 विधायक कोलकाता स्थित विधानसभा परिसर पहुंचे।
दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कड़े कानूनी प्रावधानों से बचने के लिए बागी गुट को सदन में तृणमूल कांग्रेस के कुल विधायकों की संख्या का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था। दो विधायकों के निष्कासन के बाद सदन में पार्टी के कुल विधायकों की संख्या 78 रह गई थी, जिसके अनुसार कानूनी विभाजन के लिए कम से कम 52 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता थी। बागी गुट ने 59 विधायकों के हस्ताक्षरों के साथ विधानसभा अध्यक्ष रथindra बोस से मुलाकात कर खुद को विधानसभा में “असली विपक्ष” और एक अलग विधायी दल के रूप में मान्यता देने की मांग की।
बागी गुट के नेताओं में जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, चंद्रनाथ सिन्हा और सबीना यास्मिन जैसे बड़े और कद्दावर नाम शामिल हैं, जो ममता बनर्जी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। एंटली से विधायक संदीपान साहा ने विधानसभा में प्रवेश करने से पहले मीडिया से बात करते हुए आत्मविश्वास के साथ कहा, “हमें अपनी बैठक करने दीजिए। हमारे पास विधानसभा के दो-तिहाई से अधिक सदस्यों का स्पष्ट समर्थन है।”
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए रितब्रत बनर्जी ने कहा:
“हमारे पास तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई से अधिक विधायकों का लिखित और प्रमाणित समर्थन है। संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुसार, हम ही विधानसभा में वास्तविक विपक्ष हैं। हम 18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा में एक बेहद जिम्मेदार विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका निभाएंगे। हम सरकार की नीतियों की रचनात्मक आलोचना करेंगे, लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध की राजनीति हम नहीं करने वाले।”
डैमेज कंट्रोल में जुटा शीर्ष नेतृत्व: सभी कमेटियां तुरंत भंग
विधायकों के इस बड़े विद्रोह और दो-तिहाई संख्या बल के साथ अलग गुट बनाने के दावे से तृणमूल कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह से बैकफुट पर आ गया है। इस अभूतपूर्व सांगठनिक संकट को थामने और डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) पर एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा की। पार्टी ने पश्चिम बंगाल की अपनी सभी जिला कमेटियों, ब्लॉक कमेटियों और छात्र व युवा विंग समेत सभी फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया।
तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार:
“गहन विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की पश्चिम बंगाल की सभी कमेटियां और इसके सभी फ्रंटल संगठन तत्काल प्रभाव से भंग किए जाते हैं। पार्टी अब हर स्तर पर आत्मनिरीक्षण, प्रदर्शन समीक्षा और व्यापक संगठनात्मक मूल्यांकन की एक विस्तृत प्रक्रिया शुरू करेगी। इस समीक्षा से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर मूल संगठन और सभी सहयोगी विंग्स के नए ढांचे का पुनर्गठन किया जाएगा, जिसकी घोषणा आने वाले समय में होगी। पार्टी नए संकल्प और ऊर्जा के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने संगठन को मजबूत करने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सांगठनिक ढांचे को पूरी तरह से भंग करना पार्टी आलाकमान की एक सोची-समझी रणनीति है ताकि जमीन पर मौजूद जिला अध्यक्षों और अन्य पदाधिकारियों को विद्रोहियों के पाले में जाने से रोका जा सके। यह कदम पार्टी के भीतर पूरी कमान को फिर से सीधे ममता बनर्जी के हाथों में केंद्रित करने का एक प्रयास है।
ममता बनर्जी का तीखा पलटवार: “यह पैसे और डर की राजनीति है”
इस बीच, कोलकाता के एस्प्लेनेड में आयोजित एक विशाल विरोध प्रदर्शन के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी में मची इस उथल-पुथल पर बेहद कड़ा और भावुक बयान दिया। उन्होंने विद्रोह करने वाले नेताओं की तुलना इतिहास के बदनाम पात्र ‘मीर जाफर’ से की, जिन्होंने बंगाल के साथ विश्वासघात किया था।
ममता बनर्जी ने केंद्र और राज्य की सत्ताधारी भाजपा पर सीधा हमला बोलते हुए कहा:
“हमारे पार्टी के विधायकों को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया जा रहा है। उनके घरों को घेरा जा रहा है और पुलिस प्रशासन के माध्यम से उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे तृणमूल कांग्रेस का साथ छोड़ दें। उन्हें एक नई तृणमूल बनाने के लिए डराया-धमकाया जा रहा है। मैं पूछना चाहती हूं कि नई पार्टी कौन बनाएगा? वे लोग जो स्थापना के समय से पार्टी के साथ सुख-दुख में खड़े रहे, या वे लोग जो सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से जीतकर आए हैं? बंगाल में इस समय पूरी तरह से बुलडोजर और डराने-धमकाने की राजनीति की जा रही है, लेकिन हम झुकने वाले नहीं हैं।”
हालांकि, इस विरोध प्रदर्शन के दौरान एक और चिंताजनक बात सामने आई। ममता बनर्जी के इस धरने में पार्टी के कुल 78 विधायकों में से केवल 8 विधायक और 42 सांसदों में से केवल 4 सांसद ही शामिल हुए, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि जमीन पर ममता बनर्जी की पकड़ को उनके अपने ही विधायक कमजोर कर रहे हैं। दूसरी ओर, नवनिर्वाचित भाजपा सरकार के मंत्री तापस रॉय, जो मार्च 2024 तक स्वयं टीएमसी का हिस्सा थे, ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह बिखर चुकी है और स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसी महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ हुई थी।
कानूनी पेच और आगे की राह: क्या होगी आईटी एक्ट और नियमों के तहत भूमिका?
यह पूरा मामला अब केवल राजनीतिक नहीं रह गया है, बल्कि तकनीकी और कानूनी मोर्चे पर भी काफी जटिल हो चुका है। विधायकों के हस्ताक्षरों की सत्यता की जांच के लिए डिजिटल फॉरेंसिक और आधिकारिक संचार के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। नए IT Act (Information Technology Act) और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियमों के अनुसार, किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम या व्यक्तिगत जांच से जुड़ी जानकारियों को बिना सत्यापित स्रोतों के प्रसारित करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। इस रिपोर्ट में शामिल सभी तथ्य विभिन्न आधिकारिक बयानों, पुलिस शिकायतों (FIR) और विधानसभा रिकॉर्ड्स पर आधारित हैं।
आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर टिकी होगी:
- विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय: क्या स्पीकर रथिन बोस बागी गुट के 59 विधायकों के हस्ताक्षरों को वैध मानते हुए उन्हें अलग विधायी दल की मान्यता देंगे?
- CID की जांच का रुख: फर्जी हस्ताक्षर मामले में अभिषेक बनर्जी से होने वाली पूछताछ और फॉरेंसिक रिपोर्ट इस संकट की कानूनी दिशा तय करेगी।
- ममता बनर्जी का जनसंपर्क: क्या सांगठनिक कमेटियों को भंग करने के बाद ममता बनर्जी एक बार फिर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट कर इस बड़े विद्रोह को परास्त कर पाएंगी?
निश्चित रूप से, 4 जून 2026 की स्थिति के अनुसार, TMC का आंतरिक संकट भारतीय राजनीति के इस दशक के सबसे बड़े घटनाक्रमों में से एक बन चुका है, जिसका असर न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक गठबंधनों पर भी पड़ना तय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मौजूदा आंतरिक संकट मुख्य रूप से किस कारण से शुरू हुआ?
उत्तर: इस संकट की मुख्य शुरुआत हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद हुई। हार के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व, निर्णय लेने की प्रक्रिया और फंड कलेक्शन को लेकर गंभीर असंतोष पैदा हुआ, जिसने बाद में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान ‘फर्जी हस्ताक्षर विवाद’ का रूप ले लिया और पार्टी दो धड़ों में बंट गई।
प्रश्न 2: बागी गुट का नेतृत्व कौन कर रहा है और उनके पास कितने विधायकों का समर्थन है?
उत्तर: बागी गुट का मुख्य रूप से नेतृत्व उलुबेरिया पुरबा से विधायक रितब्रत बनर्जी और एंटली से विधायक संदीपान साहा कर रहे हैं। इस गुट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष के सामने कुल 59 विधायकों के लिखित समर्थन का दावा पेश किया है, जो टीएमसी की कुल विधायी संख्या (78) का दो-तिहाई से अधिक है।
प्रश्न 3: क्या बागी विधायकों पर दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू होगा?
उत्तर: भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अनुसार, यदि किसी पार्टी के कुल विधायकों के दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ अलग गुट बनाते हैं या किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द नहीं होती। टीएमसी के मामले में वर्तमान संख्या के अनुसार 52 विधायकों की आवश्यकता थी, जबकि बागी गुट ने 59 विधायकों का समर्थन जुटाने का दावा किया है, इसलिए वे इस कानून के दायरे से बच सकते हैं।
प्रश्न 4: टीएमसी नेतृत्व ने अपनी सभी राज्य कमेटियों को क्यों भंग कर दिया है?
उत्तर: पार्टी आलाकमान ने यह कदम डैमेज कंट्रोल और जमीनी स्तर पर बगावत को रोकने के लिए उठाया है। कमेटियों को भंग करके नेतृत्व असंतुष्ट जिला और ब्लॉक स्तर के नेताओं की शक्तियों को सीमित करना चाहता है ताकि पूरी कमान सीधे केंद्रीय नेतृत्व के पास रहे और नए सिरे से वफादार नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जा सके।
