Organic Food? कल्पना कीजिए, आप व्यस्त सुबह में सुपरमार्केट पहुँचते हैं। फल-सब्जियों की शेल्फ पर चमकदार पैकेजिंग – “100% ऑर्गेनिक”, “केमिकल-फ्री” और “हेल्थ बूस्टर” के लेबल। आप सोचते हैं, यह तो सुपरफूड है – पेस्टीसाइड्स से मुक्त, न्यूट्रिशन से भरपूर। कार्ट में डालकर घर लौटते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह लेबल अक्सर मार्केटिंग का जाल होता है? जी हां, ऑर्गेनिक फूड का फर्जी लेबल आजकल हेल्थ कॉन्शस कंज्यूमर्स को फंसाने का बड़ा ट्रिक बन गया है।
2025 में, जब हेल्थ ट्रेंड्स चरम पर हैं और लोग डेली डाइट में ऑर्गेनिक को प्राथमिकता दे रहे हैं, तब भी फेक क्लेम्स की बाढ़ आ गई है। नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन (NPOP) सर्टिफिकेशन के तहत 2024 में 25% ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स फेक पाए गए। वहीं, IMARC ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का ऑर्गेनिक फूड मार्केट 2024 में USD 1.917 बिलियन का था, जो 2025 में 20.13% CAGR से बढ़कर लगभग USD 2.3 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। यह ग्रोथ हेल्थ अवेयरनेस से आ रही है, लेकिन फर्जी लेबल्स से उपभोक्ता धोखे का शिकार हो रहे हैं।
यह लेख इसी फर्जीवाड़े की परतें उधेड़ेगा – सुपरमार्केट क्लेम्स vs टेस्टिंग, न्यूट्रिशनिस्ट व्यूज, फार्मर इंटरव्यूज और FSSAI रूल्स के जरिए। हम देखेंगे कि ऑर्गेनिक हेल्थ फूड है या महँगा मार्केटिंग गिमिक। यह टॉपिक फूड लवर्स को हुक करेगा क्योंकि यह डेली लाइफ से जुड़ा है – आपकी प्लेट पर असर डालने वाला। आइए, सच्चाई का स्वाद चखें।
ऑर्गेनिक क्लेम्स: सुपरमार्केट का जादू या धोखा?
सुपरमार्केट्स में ऑर्गेनिक सेक्शन अब स्टार आकर्षण है। रिलायंस, बिग बाजार या अमेजन फ्रेश पर टमाटर से लेकर दालें तक “सर्टिफाइड ऑर्गेनिक” लेबल वाली। लेकिन ये क्लेम्स अक्सर बिना सख्त वेरिफिकेशन के होते हैं। NPOP के तहत सर्टिफिकेशन जरूरी है, लेकिन छोटे ब्रांड्स या लोकल वेंडर्स इसे बायपास कर लेते हैं। एक स्टडी में पाया गया कि 30% प्रोडक्ट्स पर लेबल फर्जी थे – अंदर पेस्टीसाइड्स के ट्रेसिस मिले।
यह मार्केटिंग ट्रिक है। ब्रांड्स हेल्थ कॉन्शस मिलेनियल्स को टारगेट करते हैं, जो 40% ज्यादा प्रीमियम पे करने को तैयार। लेकिन रीयलिटी? ऑर्गेनिक का मतलब सिर्फ केमिकल-फ्री नहीं, बल्कि सस्टेनेबल फार्मिंग भी। फिर भी, 2025 में ई-कॉमर्स पर 40% “ऑर्गेनिक” प्रोडक्ट्स अनसर्टिफाइड बिक रहे हैं। उपभोक्ता सोचते हैं कि हरा लेबल = हेल्थ बेनिफिट्स, लेकिन यह अक्सर प्रॉफिट का खेल होता है।
टेस्टिंग Vs क्लेम्स: लैब की सच्चाई
टेस्टिंग ही फर्जी लेबल्स का आईना है। CSE और FSSAI की जॉइंट स्टडीज में 2024 में दिल्ली-मुंबई के सुपरमार्केट्स से सैंपल्स टेस्ट किए गए। नतीजा? 25% “ऑर्गेनिक” सब्जियों में कार्सिनोजेनिक पेस्टीसाइड्स जैसे ग्लाइफोसेट पाए गए। NPOP सर्टिफिकेशन, जो APEDA द्वारा मॉनिटर होता है, में 1016 प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं, लेकिन फील्ड टेस्टिंग कमजोर है।

एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि फेक सर्टिफिकेट्स के जरिए चाइनीज इंपोर्ट्स को “मेड इन इंडिया ऑर्गेनिक” बता दिया जाता है। लैब टेस्ट्स दिखाते हैं कि ऑर्गेनिक और कन्वेंशनल फूड में न्यूट्रिशनल वैल्यू में मामूली फर्क है – विटामिन C में सिर्फ 10-15% ज्यादा। लेकिन कीमत? ऑर्गेनिक 50-100% महँगा। यह ट्रिक उपभोक्ताओं को “ग्रीन” फील देती है, लेकिन हेल्थ रिस्क्स नहीं कम करती। टेस्टिंग से साफ है – क्लेम्स हवा-हवाई हैं।
न्यूट्रिशनिस्ट व्यूज: मिथ्स का पर्दाफाश
न्यूट्रिशनिस्ट्स ऑर्गेनिक को ओवरहाइप्ड मानते हैं। डॉ. शिखा शर्मा, एक प्रमुख डायटीशियन, कहती हैं, “ऑर्गेनिक फूड हेल्थियर नहीं, बल्कि सेफर हो सकता है अगर सर्टिफाइड हो। लेकिन मिथ कि यह सुपर न्यूट्रिशस है, गलत है।” हार्वर्ड के गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. पस्रीचा की स्टडी से पुष्टि होती है कि ऑर्गेनिक और रेगुलर प्रोड्यूस में न्यूट्रिशन लगभग समान है।
भारत में, TGHC क्लिनिक की रिपोर्ट “डिबंकिंग न्यूट्रिशन मिथ्स” में कहा गया कि ऑर्गेनिक हमेशा हेल्थियर नहीं – बैक्टीरियल रिस्क समान रहता है। इंडिया टुडे के एक्सपर्ट्स ने 10 मिथ्स बस्ट किए, जिसमें ऑर्गेनिक का “मैजिक” भी शामिल। डॉ. रुचि मेहरा कहती हैं, “फोकस बैलेंस्ड डाइट पर हो, न कि महँगे लेबल्स पर।” ये व्यूज बताते हैं कि ऑर्गेनिक मार्केटिंग ट्रिक ज्यादा है, हेल्थ सॉल्यूशन कम।
फार्मर इंटरव्यूज: ग्राउंड लेवल की सच्चाई

फार्मर्स की आवाज फर्जी लेबल्स को एक्सपोज करती है। उत्तर प्रदेश के एक ऑर्गेनिक फार्मर, राम सिंह, कहते हैं, “हम NPOP सर्टिफिकेशन के लिए साल भर स्ट्रगल करते हैं – सॉइल टेस्ट, रिकॉर्ड्स – लेकिन मार्केट में फेक प्रोडक्ट्स सस्ते बिकते हैं। हमारा माल 20% कम दाम पर जाता है।” सिक्किम के ऑर्गेनिक एक्सपेरिमेंट में फार्मर्स ने बताया कि हाई प्राइस प्रॉमिस के बावजूद, यील्ड 30% कम हो जाती है।
वंदना शिवा, एनवायरनमेंटल एक्टिविस्ट, इंटरव्यू में कहती हैं, “भारत में 1 मिलियन से ज्यादा ऑर्गेनिक फार्मर्स हैं, लेकिन पॉइजन कार्टेल फेक लेबल्स से मार्केट कंट्रोल करता है।” एक पैनल रिपोर्ट में फार्मर्स ने कमजोर सर्टिफिकेशन सिस्टम की शिकायत की – फाइनल पनिशमेंट्स कम, फ्रॉड ज्यादा। ये इंटरव्यूज दिखाते हैं कि फार्मर्स सच्चे ऑर्गेनिक के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें नीचा दिखा रहा है।
FSSAI रूल्स: नियमों की कमजोरी
FSSAI के ऑर्गेनिक फूड रेगुलेशंस 2017 से हैं, लेकिन 2025 में रिवैंप हो रहा है। सितंबर 2025 में FSSAI ने एक पैनल बनाया, जो इंटरनेशनल गाइडलाइंस से मैच करने के लिए रूल्स अपडेट करेगा। वर्तमान में, “जैविक” लेबल के लिए NPOP या PGS सर्टिफिकेशन जरूरी, लेकिन एनफोर्समेंट वीक है। FSSAI डेफिनिशन: हॉलिस्टिक एग्रीकल्चर, बायो-डाइवर्सिटी पर फोकस।
लेकिन चुनौतियां? प्रोसेसिंग यूनिट्स 1016 हैं, लेकिन लोकल मार्केट्स में चेकिंग जीरो। APEDA की 2024 रिपोर्ट में कहा गया कि एक्सपोर्ट्स USD 2 बिलियन टारगेट के लिए रिविजन हो रहा है। FSSAI अब ट्रेसेबिलिटी पर जोर देगा – QR कोड्स से फार्म ट्रैकिंग। लेकिन फिलहाल, रूल्स पेपर पर हैं, प्रैक्टिस में नहीं।

मार्केट ग्रोथ: बिलियन डॉलर का धोखा
भारत का ऑर्गेनिक मार्केट 2025 में USD 2.3 बिलियन का होने का अनुमान है, CAGR 20.13% से। IMARC रिपोर्ट कहती है कि बीवरेजेस, सीरियल्स और मांस सेगमेंट लीड कर रहे। लेकिन यह ग्रोथ फर्जी क्लेम्स से फूली है। 25% फेक प्रोडक्ट्स से कंज्यूमर्स को नुकसान – हेल्थ रिस्क्स और पैसे की बर्बादी।
हेल्थ कॉन्शस ट्रेंड्स जैसे इंटरमिटेंट फास्टिंग और क्लीन ईटिंग इसे बूस्ट दे रहे। लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं: ट्रू ऑर्गेनिक चुनें, न कि हाइप।
सच्चे ऑर्गेनिक के टिप्स: हेल्थ फूड चुनें
फर्जी लेबल्स से बचने के लिए: NPOP/FSSAI लोगो चेक करें, लोकल फार्मर्स से डायरेक्ट खरीदें। PGS सर्टिफिकेशन कमर्शियल नहीं, कम्युनिटी-बेस्ड है। न्यूट्रिशनिस्ट सलाह: डाइवर्स डाइट पर फोकस, ऑर्गेनिक को सप्लीमेंट की तरह यूज करें।

प्लेट पर सच्चाई लाएँ
ऑर्गेनिक फूड का फर्जी लेबल हेल्थ फूड कम, मार्केटिंग ट्रिक ज्यादा साबित हो रहा है। टेस्टिंग, न्यूट्रिशनिस्ट व्यूज, फार्मर स्टोरीज और FSSAI रूल्स साफ कहते हैं – जागरूकता जरूरी। 2025 में हेल्थ ट्रेंड्स को हाईजैक न होने दें। आज से शुरू करें: लेबल्स पढ़ें, सर्टिफाइड चुनें, फार्मर्स सपोर्ट करें। आपकी प्लेट, आपकी हेल्थ – इसे फर्जी न बनने दें।
FAQs
Q: ऑर्गेनिक फूड क्या है और इसका फर्जी लेबल क्यों समस्या है?
A: ऑर्गेनिक फूड वह है जो सिंथेटिक पेस्टीसाइड्स, फर्टिलाइजर्स या GMOs के बिना उगाया जाता है, NPOP स्टैंडर्ड्स के तहत। फर्जी लेबल समस्या इसलिए क्योंकि 2024 में 25% प्रोडक्ट्स अनसर्टिफाइड बिक रहे हैं, जो उपभोक्ताओं को हेल्थ रिस्क्स और पैसे की बर्बादी का शिकार बनाते हैं। FSSAI और CSE स्टडीज में पाया गया कि कई सैंपल्स में पेस्टीसाइड्स मिले
Q: भारत में ऑर्गेनिक फूड मार्केट का साइज क्या है?
A: IMARC रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत का ऑर्गेनिक फूड मार्केट USD 1,917.4 मिलियन का था, जो 2025-2033 में 20.13% CAGR से बढ़कर USD 10,807.9 मिलियन तक पहुँचेगा। लेकिन यह ग्रोथ फर्जी क्लेम्स से प्रभावित है, जहां 60% प्रोडक्ट्स फेक हो सकते हैं।
Q: सुपरमार्केट में ऑर्गेनिक क्लेम्स कितने भरोसेमंद हैं?
A: ज्यादातर क्लेम्स मार्केटिंग ट्रिक हैं। CSE और FSSAI की 2024 स्टडी में दिल्ली-मुंबई सुपरमार्केट्स से 25% “ऑर्गेनिक” सैंपल्स में पेस्टीसाइड्स पाए गए। हमेशा NPOP या Jaivik Bharat लोगो चेक करें; बिना सर्टिफिकेशन के प्रोडक्ट्स अवॉइड करें।
Q: न्यूट्रिशनिस्ट्स ऑर्गेनिक फूड के मिथ्स पर क्या कहते हैं?
: न्यूट्रिशनिस्ट्स जैसे डॉ. वंदना वर्मा (Sir Ganga Ram Hospital) कहती हैं कि ऑर्गेनिक फूड सेफर हो सकता है लेकिन हमेशा हेल्थियर नहीं – न्यूट्रिशनल वैल्यू में मामूली फर्क (10-15% ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट्स)। मिथ: यह मैजिक क्योर है; रीयलिटी: बैलेंस्ड डाइट ज्यादा महत्वपूर्ण। India Today की रिपोर्ट में 10 मिथ्स डिबंक किए गए।
Q: फार्मर्स फर्जी ऑर्गेनिक लेबल्स पर क्या कहते हैं?
A: कई फार्मर्स, जैसे पंजाब के एक किसान ने इंटरव्यू में स्वीकार किया: “रात को पेस्टीसाइड्स स्प्रे करते हैं और सुबह ऑर्गेनिक बेचते हैं।” TOI पैनल रिपोर्ट में कमजोर सर्टिफिकेशन सिस्टम की शिकायत – केवल 25 लैब्स पूरे देश के लिए। फार्मर्स सच्चे ऑर्गेनिक के लिए स्ट्रगल करते हैं लेकिन फेक प्रोडक्ट्स सस्ते बिकते हैं।
Q: FSSAI के ऑर्गेनिक रूल्स में 2025 अपडेट्स क्या हैं?
A: सितंबर 2025 में FSSAI ने पैनल बनाया जो इंटरनेशनल गाइडलाइंस से मैच करने के लिए रूल्स रिवैंप करेगा, NPOP 2014 को अपडेट करेगा। ट्रेसेबिलिटी पर जोर – QR कोड्स से फार्म ट्रैकिंग। वर्तमान में, Jaivik Bharat लोगो अनिवार्य, लेकिन एनफोर्समेंट वीक।
Q: फर्जी ऑर्गेनिक फूड से हेल्थ रिस्क्स क्या हैं?
A: फर्जी प्रोडक्ट्स में छिपे पेस्टीसाइड्स जैसे ग्लाइफोसेट कैंसर, हार्मोनल डिसरप्शन और न्यूरोलॉजिकल इश्यूज का खतरा बढ़ाते हैं। CSE स्टडी में 32% सैंपल्स में GMOs पाए गए, जो लंबे समय में हेल्थ को नुकसान पहुँचाते हैं। सच्चा ऑर्गेनिक चुनें ताकि रिस्क कम हो।
Q: सच्चा ऑर्गेनिक फूड कैसे चुनें?
A: NPOP/FSSAI सर्टिफिकेशन चेक करें, लोकल फार्मर्स से डायरेक्ट खरीदें, PGS (कम्युनिटी-बेस्ड) चुनें। ऐप्स जैसे Jaivik Bharat यूज करें। न्यूट्रिशनिस्ट सलाह: डाइवर्स डाइट फोकस करें, ऑर्गेनिक को सप्लीमेंट की तरह। फर्जी से बचने के लिए लेबल्स पढ़ें और थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन देखें।
