Rajasthan की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर विश्व प्रसिद्ध है, और जब बात खजुराहो की आती है, तो मध्य प्रदेश के भव्य मंदिरों की छवि तुरंत मन में उभरती है। लेकिन राजस्थान में भी एक ‘खजुराहो’ मौजूद है, जिसे ‘मेवाड़ का खजुराहो‘ कहा जाता है – उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर जगत गांव में स्थित अंबिका मंदिर। यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट मूर्तिकला, कामुक नक्काशी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। हालांकि, इसकी खस्ताहाल स्थिति और लंबे समय तक उपेक्षा ने इसकी महत्ता को कुछ हद तक प्रभावित किया है। इस लेख में हम मंदिर के इतिहास, खासियतों, उपेक्षा के कारणों, वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा करेंगे। जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राजस्थान पर्यटन विभाग और ऐतिहासिक स्रोतों जैसे जेम्स टॉड की ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ पर आधारित है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अंबिका मंदिर 10वीं-11वीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिल वंश (बाद में सिसोदिया वंश) के शासकों द्वारा बनवाया गया। कुछ इतिहासकार इसे 646 ईस्वी से जोड़ते हैं, लेकिन ASI इसे 10वीं शताब्दी का मानता है। मंदिर देवी अंबिका (दुर्गा का एक रूप) को समर्पित है और मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा के निकट है। गुहिल राजा महिपाल या उनके समकालीन शासक ने इसका निर्माण कराया। मेवाड़ का इतिहास राजपूतों की वीरता और सांस्कृतिक उत्कर्ष से भरा है, और यह मंदिर उस युग की स्थापत्य कला का प्रतीक है। शिलालेखों से पता चलता है कि यह तीर्थयात्रा का केंद्र था। राणा कुम्भा जैसे बाद के शासकों ने इसका संरक्षण किया। ब्रिटिश काल में उपेक्षा के कारण मंदिर की स्थिति बिगड़ी, लेकिन स्वतंत्र भारत में ASI ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया।
मंदिर की खासियतें: मेवाड़ का खजुराहो क्यों?
अंबिका मंदिर को ‘मेवाड़ का खजुराहो’ इसकी कामुक और जटिल नक्काशी के कारण कहा जाता है, जो मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिरों की याद दिलाती है। सोलंकी और चालुक्य शैली में निर्मित इस मंदिर में गर्भगृह, मंडप और अर्ध-मंडप हैं। गर्भगृह में 8 फीट ऊंची अंबिका देवी की काले पत्थर की मूर्ति है, जो सिंह पर सवार है। बाहरी दीवारों पर अप्सराओं, गणेश, शिव-पार्वती और दैनिक जीवन के दृश्यों की 100 से अधिक नक्काशियां हैं। कुछ नक्काशियां तंत्र साधना को दर्शाती हैं, जो खजुराहो से भिन्न धार्मिक संदर्भ में हैं। राजस्थानी लोक जीवन, जैसे ऊंट, घोड़े और योद्धा, इनमें झलकते हैं। मंदिर का ग्रामीण परिवेश, आसपास की पहाड़ियां और झीलें इसे प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करती हैं। नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा में स्थानीय जनजातियां भाग लेती हैं।
खस्ताहाल और उपेक्षा: महत्ता पर प्रभाव

अंबिका मंदिर की महत्ता इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य में है, लेकिन उपेक्षा ने इसे प्रभावित किया। ब्रिटिश काल (19वीं शताब्दी) में मेवाड़ की रियासतों का पतन हुआ, और मंदिर की देखभाल बंद हो गई। स्थानीय समुदाय के पास संसाधन नहीं थे, जिससे दीवारें जर्जर हुईं। ASI की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के दशक तक मंदिर खंडहर बन चुका था। कई नक्काशियां क्षतिग्रस्त हुईं, और कुछ मूर्तियां चोरी हुईं। अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षरण ने स्थिति बिगाड़ी। उदयपुर के मुख्य पर्यटन सर्किट से बाहर होने और प्रचार की कमी के कारण यह कम जाना गया। खजुराहो जैसे बड़े मंदिर समूहों की तुलना में इसका महत्व छिपा रहा, और यह केवल स्थानीय धार्मिक स्थल तक सीमित रहा। इससे इसकी पुरातत्वीय और सांस्कृतिक महत्ता को समझने वाले पर्यटकों की संख्या कम रही।
पर्यटन: एक उभरता हुआ डेस्टिनेशन
अंबिका मंदिर उदयपुर से 50 किमी दूर है, जो इसे उदयपुर सर्किट का हिस्सा बनाता है। राजस्थान पर्यटन विभाग ने इसे ‘हिडन जेम्स ऑफ राजस्थान’ के तहत प्रचारित किया है। पर्यटक सिटी पैलेस, फतेहसागर झील या सज्जनगढ़ पैलेस के बाद यहां आ सकते हैं। जगत गांव में होमस्टे, लोकल गाइड और हस्तशिल्प की दुकानें उपलब्ध हैं। आसपास ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग और नागदा के प्राचीन मंदिरों की यात्रा संभव है। 2024-25 में डिजिटल कैंपेन से पर्यटकों की संख्या में 20% वृद्धि हुई, जैसा कि राजस्थान पर्यटन विभाग की रिपोर्ट में है। यह मुख्यधारा से दूर शांत अनुभव देता है। ASI की गाइड बुक उपयोगी है।
घूमने का सबसे अच्छा समय
अगर आप अंबिका मंदिर घूमने का प्लान कर रहे हैं तो यहाँ घूमने का सबसे अच्छा समय सर्दियों (अक्टूबर से मार्च) का है, जब तापमान 10-25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, और मौसम सुहावना होता है। इस दौरान नक्काशी और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना आसान है। नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर) में विशेष पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जो स्थानीय संस्कृति को अनुभव करने का अवसर देते हैं। गर्मी (अप्रैल-जून) में तापमान 40 डिग्री तक पहुंचता है, और मानसून (जुलाई-सितंबर) में सड़कें कीचड़मय हो सकती हैं, इसलिए ये मौसम कम उपयुक्त हैं।
कैसे पहुंचें?

1. सड़क मार्ग:
- उदयपुर से: मंदिर उदयपुर से 50 किमी दूर NH-48 और फिर जगत रोड पर है। टैक्सी या निजी कार से 1-1.5 घंटे लगते हैं। किराए की लागत 1500-2500 रुपये है। स्थानीय बसें भी उपलब्ध हैं, जो उदयपुर बस स्टैंड से चलती हैं (लागत: 50-100 रुपये, 2 घंटे)।
- जयपुर से: जयपुर से 350 किमी की दूरी है, और NH-48 के माध्यम से कार या बस से 6-7 घंटे लगते हैं। राजस्थान रोडवेज की बसें (200-400 रुपये) और प्राइवेट टूर ऑपरेटर उपलब्ध हैं।
- अहमदाबाद से: 260 किमी दूर, NH-48 से 5-6 घंटे की ड्राइव। बस और टैक्सी आसानी से मिलती हैं।
2. रेल मार्ग:
- निकटतम रेलवे स्टेशन उदयपुर रेलवे स्टेशन (50 किमी) है। जयपुर, दिल्ली, और मुंबई से नियमित ट्रेनें आती हैं। स्टेशन से टैक्सी या बस से मंदिर पहुंचा जा सकता है।
3. हवाई मार्ग:
- निकटतम हवाई अड्डा महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, उदयपुर (45 किमी) है, जहां दिल्ली, मुंबई, जयपुर और अन्य शहरों से उड़ानें हैं। हवाई अड्डे से टैक्सी (1000-2000 रुपये) उपलब्ध है।
टिप्स: सड़क मार्ग सबसे सुविधाजनक है। अपने साथ पानी, सनस्क्रीन और टोपी रखें। स्थानीय गाइड किराए पर लेना उपयोगी है।
वर्तमान स्थिति और अन्य पहलू

उपेक्षा ने मंदिर की महत्ता को दबाया, लेकिन ASI और पर्यटन विभाग के प्रयासों से यह फिर से उभर रहा है। यह मेवाड़ की मध्यकालीन कला, राजपूतों की धार्मिक भक्ति और लोक संस्कृति का प्रतीक है। डिजिटल प्रचार और संरक्षण ने इसे पर्यटकों के बीच लोकप्रिय बनाया। यह धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ पुरातत्व और इतिहास का केंद्र है। हालांकि, पार्किंग और रेस्टोरम जैसी सुविधाएं सीमित हैं। जलवायु परिवर्तन और अवैध खनन ने हरियाली को प्रभावित किया, जिसके लिए एनजीओ वृक्षारोपण कर रहे हैं। राजस्थान सरकार ने 2025 बजट में इसके विकास के लिए 5 करोड़ रुपये आवंटित किए। मंदिर में दैनिक पूजा होती है, और नवरात्रि में सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। स्थानीय कारीगर मूर्तियों से प्रेरित हस्तशिल्प बेचते हैं। यह मंदिर महिलाओं की सशक्तिकरण का प्रतीक है, क्योंकि अंबिका शक्ति की देवी हैं। क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है।
जगत का अंबिका मंदिर, या ‘मेवाड़ का खजुराहो‘, अपनी नक्काशी, इतिहास और शांत वातावरण के लिए अवश्य देखा जाना चाहिए। उपेक्षा के बाद भी, यह पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए एक उभरता गंतव्य है। सर्दियों में उदयपुर यात्रा के दौरान इसे अपनी सूची में शामिल करें। यह मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है।
