श्रीकालहस्ती | यहाँ नहीं किए दर्शन तो अधूरी है तिरुपति यात्रा! जानिए भारत का एकमात्र मंदिर जहां होती है राहु-केतु की पूजा, कहलाता है…

Published on: 18-08-2025
श्रीकालहस्ती मंदिर

श्रीकालहस्ती मंदिर (Srikalahasti) आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित एक प्राचीन और शक्तिशाली शिव मंदिर है, जो अपनी अनोखी ज्योतिषीय पूजाओं और आध्यात्मिक महत्व के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह मंदिर तिरुपति से मात्र 36 किलोमीटर की दूरी पर स्वर्णमुखी नदी के तट पर बसा हुआ है और पंच भूत स्थलों में से एक माना जाता है, जहां भगवान शिव को वायु लिंगम के रूप में पूजा जाता है। मंदिर की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि यहां हर साल खासकर राहु-केतु दोष निवारण के लिए लाखों श्रद्धालु आते हैं। बॉलीवुड की कई मशहूर हस्तियां, नेता और क्रिकेटर्स तक यहां आकर पूजा-अर्चना करटे हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि इस मंदिर की पूजा से उनके जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सफलता मिलती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर भी है, जो दक्षिण भारत की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। हाल के वर्षों में, जैसे 2024 में आदी अमावस्या पर, यहां राहु-केतु पूजा का रिकॉर्ड संख्या में आयोजन हुआ, जो इसकी बढ़ती हुई आस्था को दर्शाता है। मंदिर की प्राचीनता और शक्ति ऐसी है कि इसे ‘दक्षिण का कैलाश’ कहा जाता है, जहां भगवान शिव की उपस्थिति हर कण में महसूस की जाती है। यह भी मान्यता है तिरुपति दर्शन का पूर्ण लाभ भक्तजनों को तब प्राप्त होता है जब वे तिरुपति से सीधे आकर श्री कालहस्ती में भगवान के दर्शन करते हैं।

रोचक है मंदिर का पौराणिक महत्व

मंदिर की पौराणिक महत्ता अत्यंत गहन और रोचक है। मान्यता है कि यह मंदिर ब्रह्मा जी द्वारा चारों युगों में पूजित रहा है और यहां की कथाएं महाभारत तथा पुराणों से जुड़ी हुई हैं। एक प्रमुख कथा के अनुसार, एक मकड़ी (श्री), सर्प (काला) और हाथी (हस्ती) ने भगवान शिव की पूजा की थी। मकड़ी ने शिव लिंग पर जाला बुनकर धूप और वर्षा से बचाया, सर्प ने लिंग पर रत्न चढ़ाया और हाथी ने जल से अभिषेक किया। जब इन तीनों के बीच संघर्ष हुआ, तो भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें मोक्ष प्रदान किया, जिससे मंदिर का नाम श्रीकालहस्ती पड़ा। एक अन्य कथा में वायु देव ने यहां हजारों वर्षों तक तपस्या की, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे हर जगह वायु के रूप में विद्यमान रहेंगे और लिंग को वायु लिंगम नाम दिया गया। पार्वती जी को शिव जी ने श्राप दिया था कि वे मानव रूप धारण करेंगी, क्योंकि उन्होंने शिव पंचाक्षरी मंत्र सीखने पर जोर दिया था। पार्वती जी ने यहां तपस्या की और अपना दिव्य रूप प्राप्त किया, साथ ही ज्ञान प्रसुनांबिका देवी के रूप में पूजित हुईं। इसके अलावा, घनकाला नामक एक महिला को भूत बनने का श्राप मिला था, जिसने यहां 15 वर्षों तक पूजा की और भगवान शिव ने उसे मूल रूप वापस दिया। मयूर, चंद्र और इंद्र को क्रमशः मकड़ी, सर्प और हाथी बनने का श्राप मिला था, जिन्होंने स्वर्णमुखी नदी में स्नान कर यहां पूजा की और मुक्ति पाई। एक और प्रसिद्ध कथा कन्नप्पा की है, जो एक शिकारी था और उसने शिव लिंग से बहते रक्त को रोकने के लिए अपनी आंखें चढ़ा दीं। भगवान शिव ने उसे रोका और मोक्ष प्रदान किया। मार्कंडेय ऋषि को यहां भगवान शिव ने गुरु के महत्व की शिक्षा दी, जहां गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और शिव का रूप बताया गया। यह मंदिर सैव संतों के तेवारम में वर्णित पदल पेत्र स्थलम है, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। इन कथाओं से स्पष्ट है कि श्रीकालहस्ती मंदिर न केवल शिव भक्ति का केंद्र है, बल्कि पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक भी है।

श्रीकालहस्ती मंदिर का इतिहास भी उतना ही समृद्ध है। यह मंदिर 5वीं शताब्दी में पल्लव राजाओं द्वारा स्थापित किया गया था, जबकि मुख्य संरचना का नवीनीकरण 11वीं शताब्दी में राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा किया गया। चोल वंश, रेड्डी साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1516 ईस्वी में कृष्णदेवराय ने 120 फीट ऊंचे मुख्य गोपुरम और सौ स्तंभों वाले हॉल का निर्माण करवाया, जिसमें जटिल नक्काशी है। मंदिर पर राजादित्य चोल, राजाराजा चोल प्रथम, राजाधिराजा चोल प्रथम, कुलोत्तुंग चोल प्रथम और कुलोत्तुंग चोल तृतीय के शिलालेख मिलते हैं। 26 मई 2010 को मुख्य गोपुरम गिर गया था, जिसकी वजह उथली नींव और दरार थी, लेकिन इसे 45 करोड़ रुपये की लागत से पुनर्निर्मित किया गया और 18 जनवरी 2017 को पुनः समर्पित किया गया। मंदिर को दक्षिण भारत के प्राचीन तमिल स्रोतों में दो हजार वर्षों से अधिक समय से ‘दक्षिण का कैलाश’ कहा जाता है और स्वर्णमुखी नदी को ‘दक्षिण की गंगा’ माना जाता है। विजयनगर काल में यहां शिव और विष्णु मंदिरों का निर्माण हुआ, जो स्थानीय वास्तुकला को प्रभावित करता है। मंदिर की प्राचीनता से जुड़े प्रमाण ट्राइबल लोगों की पूजा से भी मिलते हैं, जो बाद में मुख्यधारा की भक्ति में शामिल हुए। कुल मिलाकर, यह मंदिर इतिहास की कई परतों को समेटे हुए है, जो पल्लव से लेकर आधुनिक काल तक फैला हुआ है।

कुंडली में है राहू और केतु का दोष तो यहाँ करवाईये निवारण

राहु-केतु पूजा इस मंदिर की सबसे प्रमुख विशेषता है, जो ज्योतिषीय दोषों जैसे राहु दोष, केतु दोष, सर्प दोष और कालसर्प दोष को दूर करने के लिए की जाती है। यह पूजा रोजाना सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक होती है, जिसमें मंत्र जाप, दीप प्रज्वलन और विशेष अनुष्ठान शामिल होते हैं। टिकट की कीमतें 500 रुपये से 5000 रुपये तक हैं, और ऑनलाइन बुकिंग उपलब्ध है। मान्यता है कि राहु और केतु, जो ग्रहण के देवता हैं, यहां की पूजा से प्रसन्न होते हैं और श्रद्धालुओं को बुरे प्रभावों से मुक्ति मिलती है। मंदिर भारत का ऐसा स्थान है जहां सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान भी खुला रहता है। अन्य पूजाएं जैसे अभिषेकम, दर्शनम, सुप्रभात सेवा और गोपूजा भी होती हैं, जिनके समय शनिवार से सोमवार और मंगलवार से शुक्रवार के अनुसार अलग-अलग हैं। मंदिर के दर्शन समय सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक हैं। यहां की पूजा से वैवाहिक समस्याएं, संतान प्राप्ति और करियर की बाधाएं दूर होने की मान्यता है।

ऑनलाइन बुकिंग से दर्शन-पूजा आसान

मंदिर का प्रबंधन श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर प्रशासन द्वारा किया जाता है, जो आंध्र प्रदेश सरकार के अंतर्गत आता है। यह आंध्र प्रदेश एंडोमेंट्स विभाग के अधीन है, और ऑनलाइन बुकिंग aptemples.ap.gov.in के माध्यम से होती है। हालांकि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) से निकटता के कारण कभी-कभी जुड़ाव लगता है, लेकिन यह अलग देवस्थानम है और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित है। प्रशासनिक भवन का उद्घाटन 1959 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीलम संजीवा रेड्डी द्वारा किया गया था। मंदिर की देखभाल और विकास राज्य स्तर पर होता है, जो श्रद्धालुओं की सुविधाओं को सुनिश्चित करता है।

मंदिर से जुड़ी मान्यताएं अटूट विश्वास पर आधारित हैं। यहां का वायु लिंगम कैम्फर से बना माना जाता है, जो कभी आग नहीं पकड़ता। श्रद्धालु मानते हैं कि राहु-केतु पूजा से जीवन में शांति, समृद्धि और दोषों से मुक्ति मिलती है। मंदिर कलमकारी कला, पारंपरिक लकड़ी की नक्काशी और तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों से घिरा है। पर्यटक यहां पहुंचने के लिए तिरुपति अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (26 किमी) या श्रीकालहस्ती रेलवे स्टेशन का उपयोग कर सकते हैं। मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि आधुनिक समय में भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां सेलिब्रिटी से लेकर साधारण श्रद्धालु तक आते हैं। कुल मिलाकर श्रीकालहस्ती मंदिर एक ऐसा स्थान है जो इतिहास, वास्तुकला, आस्था और ज्योतिष का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है, और यह दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है।

डिस्क्लेमर: इस खबर का उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। यह लेख केवल श्रीकालहस्ती मंदिर के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को जानकारी के रूप में प्रस्तुत करता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने विवेक और तार्किक दृष्टिकोण के आधार पर इस जानकारी का मूल्यांकन करें।

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